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“भारतीय जाति व्यवस्था का सनसनीखेज यह सच” : राम कृपाल सिंह

ब्रिटिश शासन काल में एक व्यवस्था थी कि कोई भी शासन की अनुमति से एक निश्चित राशि का भुगतान करके अपनी जाति बदल सकता था। इसके लिए सरकार की तरफ से एक रजिस्ट्रार नियुक्त किया जाता था। देश की जानी-मानी समाज विज्ञानी डॉक्टर इरावती कर्वे लिखती हैं कि ब्रिटिश सरकार की इस व्यवस्था का लाभ उठाकर बंगाल में बहुत बड़ी संख्या में दलित समुदाय के लोग बनर्जी, मुखर्जी, चटर्जी हो गए।

भारतीय जाति व्यवस्था का असली सच !!!


राम कृपाल सिंह

मंडल आयोग द्वारा पिछड़ी जातियों को दी गई सुविधाओं के कारण आज देश के विभिन्न प्रांतों में वहां की सबसे संपन्न और सक्षम जातियां भी अपने को पिछड़ी जाति की सूची में शामिल करने के लिए संघर्ष कर रही हैं और इसके लिए आंदोलन कर रही हैं। महाराष्ट्र में मराठा, गुजरात में पटेल, आंध्र में कापू, उत्तर प्रदेश में जाट आदि ऐसी ही जातियां हैं।
लेकिन मंडल आयोग के पहले और उससे भी पूर्व ब्रिटिश काल में विभिन्न जातियों द्वारा इससे भी अधिक सशक्त अभियान चलाया जा रहा था और उनकी मांग थी कि उनकी जाति को उच्चीकृत किया जाए और उन्हें स्वर्ण जातियों में शामिल किया जाए।

बात 1979 की है। अभी कुछ ही समय पहले मंडल आयोग ने अपना काम शुरू किया था। आयोग प्रारंभ में पिछड़ी जातियों की सूची बना रहा था। उन्हें किस प्रकार की सुविधा मिलेगी या लाभ मिलेगा, इसकी कोई जानकारी नहीं थी।

मंडल आयोग की उस पिछड़ी जातियों की सूची में जाट समुदाय का भी नाम था। अपनी जाति के पिछड़ी जाति की सूची में होने की जानकारी होते ही जाट चौधरी बिफर गए। जाट चौधरियों का एक समूह तुरंत दिल्ली पहुंचा और अपनी ही बिरादरी से जुड़े तत्कालीन प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह से कहा – “चौधरी, हम तुम्हें पिछड़े किधर से नजर आवे हैं?” और इस शिकायत के बाद जाटों का नाम पिछड़ों की सूची से बाहर कर दिया गया। लेकिन पिछड़ी जातियों को मिली सुविधाएं देखने के बाद अब वही जाट समुदाय अपने को पिछड़ी जाति में शामिल करने के लिए आंदोलन कर रहा है।

महाराष्ट्र में एक जाति है -कुनबी।

कृषि कार्य से जुड़ी वहां की यह एक बड़ी जनसंख्या वाली जाति है। किंतु धीरे-धीरे इस जाति के लोग अपने को मराठा घोषित करते गए और वहां कुनबी जाति करीब-करीब समाप्त हो गई।1931 की जातीय जनगणना के समय इनकी संख्या इतनी कम हो गई कि इनकी गिनती अलग न करके मराठा/ कुनबी के रूप में की गई।

मंडल आयोग की सिफारिशों में महाराष्ट्र की कुनबी जाति को पिछड़ी जाति में माना गया और वे आरक्षित जाति की श्रेणी में आ गए। परिणाम यह हुआ कि तमाम मराठों ने अपने को कुनबी घोषित कर दिया और आज महाराष्ट्र में कुनबी जनसंख्या फिर करोड़ के आसपास पहुंच गई है।

ब्रिटिश शासन काल में एक व्यवस्था थी कि कोई भी शासन की अनुमति से एक निश्चित राशि का भुगतान करके अपनी जाति बदल सकता था। इसके लिए सरकार की तरफ से एक रजिस्ट्रार नियुक्त किया जाता था। देश की जानी-मानी समाज विज्ञानी डॉक्टर इरावती कर्वे लिखती हैं कि ब्रिटिश सरकार की इस व्यवस्था का लाभ उठाकर बंगाल में बहुत बड़ी संख्या में दलित समुदाय के लोग बनर्जी, मुखर्जी, चटर्जी हो गए।
इसी व्यवस्था का लाभ उठाकर उस समय बंगाल में कायस्थ समुदाय ने अपने को छत्रिय घोषित करवा लिया किंतु यह मामला अदालत में चला गया और कोलकाता उच्च न्यायालय ने कायस्थों को शूद्र घोषित कर दिया लेकिन उसी समय के आसपास इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कायस्थों को क्षत्रिय स्वीकार किया। बंगाल में आज भी कायस्थ समुदाय से जुड़े बहुत बड़ी संख्या में घोष, बोस, या दत्ता समुदाय के लोग अपने को क्षत्रिय बताते हैं और सरकारी दस्तावेजों में भी क्षत्रिय ही दर्ज है।

तथाकथित तौर पर छोटी कही जाने वाली या उपेक्षित जातियों का बड़ी जातियों में शामिल होने का यह अभियान कमोबेश सारे देश में चल रहा था। जाति परिवर्तन करके अपने को उच्च जाति में शामिल किए जाने का सबसे बड़ा अभियान उत्तर प्रदेश और बिहार में चल रहा था। 1930 के सरकारी दस्तावेज के अनुसार उस समय ब्रिटिश सरकार के पास उत्तर प्रदेश की 63 जातियों के आवेदन पड़े हुए थे जो अपने को क्षत्रिय, ब्राह्मण या वैश्य घोषित किए जाने की मांग कर रही थी। सबसे अधिक आवेदन स्वयं को क्षत्रिय घोषित करने के लिए था फिर ब्राह्मण और कुछ जातियों ने अपने को वैश्य घोषित करने की मांग की थी। यहां तक की चर्मकार , धोबी दर्जी, कंहार, अहीर, लोध, लोनिया और ऐसी ही दर्जनों जातियों ने अपने को क्षत्रिय घोषित करने की मांग की थी। बढ़ई, लोहार,नाई, भूमिहार आदि जातियों ने अपने को ब्राह्मण जाति में शामिल करने का आवेदन किया था तो कोरी, तेली, कलवार, हलवाई आदि वैश्य समुदाय में शामिल होने के लिए प्रयत्नशील थे।

यह सूची बहुत लंबी है लेकिन उल्लेखनीय है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य के अतिरिक्त अन्य किसी जाति में शामिल होने का कोई आवेदन नहीं था। यहां तक कि जाटों ने भी अपने को यदुवंशी राजपूत घोषित करने के लिए आवेदन किया था।

उत्तर प्रदेश में उस समय सबसे चर्चित विवाद अहीर समुदाय द्वारा अपने को यादव या यदुवंशी क्षत्रिय घोषित करने की मांग पर था। यहां यह स्पष्ट करते चलें कि 1931 की जातिगत जनगणना में यादव नाम की किसी जाति का जिक्र नहीं है। अहीर समुदाय की इस मांग का विरोध बड़े पैमाने पर इसलिए हो रहा था कि इस जाति में नहीं बल्कि इस जाति – नाम से लोगों की धार्मिक भावनाएं जुड़ी थी । भगवान श्री कृष्ण के पिता वसुदेव यदुवंशी क्षत्रिय थे तो उनकी माता देवकी यादव क्षत्रिय थी । वसुदेव की बहन और पांडवों की मां कुंती भी यदुवंशी क्षत्रिय थी। लोगों का , विशेषकर मथुरा के पंडितों का कहना था कि वह भगवान कृष्ण की जाति परंपरा में किसी बाहरी को शामिल करके उसे प्रदूषित नहीं होने देंगे। वैसे आज भी मथुरा- आगरा से लेकर राजस्थान तक यादव और यदुवंशी गोत्र के राजपूतों की काफी बड़ी संख्या है।

विभिन्न जातियों द्वारा जाति परिवर्तन की मांग और सवर्ण जातियों द्वारा उनके विरोध पर अंग्रेज सरकार ने बीच का रास्ता निकाला। सरकार ने निर्णय दिया कि विभिन्न जातियों के लोग सरनेम तो लिख सकते हैं लेकिन उनकी जाति वही रहेगी। जैसे- बढ़ाई शर्मा तो लिख सकता है लेकिन वह ब्राह्मण नहीं होंगे, या लोध अपने नाम के बाद राजपूत तो लिख सकते हैं लेकिन रहेंगे लोध ही। ऐसा ही अहीर समुदाय के लिए भी था।

जिन जातियों के उच्च जातियों में शामिल किए जाने के आवेदन निरस्त हुए थे, उनके वंशज आज अंग्रेजी सरकार के प्रति अवश्य कृतज्ञ होंगे क्योंकि उस समय अगर वे उच्च जाति में शामिल हो गए होते तो आज उन्हें आरक्षण का लाभ न मिलता। लेकिन सही यह भी है कि उस समय यदि अंग्रेज सरकार ने उनकी मांग मान ली होती तो संभवत देश में जातिवाद का नासूर समाप्त हो गया होता।

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