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“पढ़ने लिखने में क्या रखा है ..!” : डॉ कमलजीत सिंह

Poems of

Dr Kamal Jeet Singh

“पढ़ने लिखने में क्या रखा है?”

अखबारों में नया क्या रखा है
अच्छा है अपने को बेख़बर रखिए।

गांव देश में क्या रखा है
अच्छा है अपने को बेघर रखिए।

पढ़ने लिखने में क्या रखा है
अच्छा है अपने को बेअक्षर रखिए।

दुनिया देखने में क्या रखा है
अच्छा है अपने को बेनज़र रखिए।

समय बदलने से न बदलेगा
क्या बुरा है अपने को बेअसर रखिए ।।

 

“कई लोग”

इस मकां में साथ रहते हैं कई लोग

आपस में कम ही मुलाकातें करते हैं।

 

सुबह उठते हैं तेयार हो निकल जाते हैं 

चाय बिस्तर पे औ नाश्ता भागते- दौड़ते करते है।

 

शाम को थक के जो साथ बैठते हैं 

मोबाइल ताकते उसी से बातें करते रहते हैं। 

 

रातों में चांद सितारों की बातें नहीं करते 

लैप-टाप गोदी में रख यूं ही सो जाते हैं।। 

इस मकां में साथ रहते है कई लोग…

“दबे हुए वोट”

वह उसी हवा में सांसें गिन रहा था

जहां वायुमंडल में सुधार

हो रहा था वर्षों से।

वह वहीं विद्या अर्जन कर रहा था

जहां अध्यापक

आते थे कभी-कभी।

वह वहीं दरवाजे खटखटा रहा था

जहां न्याय हेतु

वर्षों तक

प्रतीक्षा करते रहते हैं लोग।

वह नोट की थैलियां गिन रहा था

जिसके नीचे

दबे रहते हैं वोट।।

 

दोपहरी

 ये गर्मी की दुपहरी यों ही तपाए जाती है

धरती आंसू नही बहाती

बस जली जाती है।

सूरज की तपिश को चीरते

सफेद पंछी कतारों में

मंज़िल को उड़े जाते हैं।

सूखे हुए फूल डालियों से

ज़मीं को चूमने झुके जाते हैं

आकाश में बादल

काले से सफेद हुए जाते हैं।

मजदूर भरी दोपहरी सड़कों पर

फावड़े चलाए जाते हैं

न गर्मी कि फिकर न लू से शिकायत

बच्चे इस तपिश में नाचते दौड़ते जाते हैं।

और हम

मिट्टी के बरतन से

शीतल जल पिलाए जाते हैं

ईश्वर की दया से सर पर छत है

पंखों के नीचे भी हम

हाय हाय किए जाते हैं

हाय हाय किए जाते हैं।।

 

*कुम्हलाए फूल* 

अजीब बदरंग था बगीचा वह

थे उसमें कुछ सूखे कुछ कुम्हलाए फूल 

आंधी आए या आए तूफान 

ज़मीं पे गिरते न थे कुम्हलाए फूल

नज़र छुपा निकल जाता था माली

देख कुम्हलाए फूल ।

 

जुल्फों में सजाने को महबूब 

तोड़ते न थे कुम्हलाए फूल

पतझड़ आया आकर चला गया 

गिरे नहीं सूखे पत्ते और कुम्हलाए फूल 

बहकते थे इधर उधर सुर्ख़ फूल 

देख ये हरकत मुस्कराते थे कुम्हलाए फूल।

 

तलाशते हैं बाग़ मे खुश्क हाथ 

शाखों में लगे पीले कुम्हलाए फूल

कैंची लिए माली जब आए

कलियों के कवच बन जाते कुम्हलाए फूल 

अजीब बदरंग था बगीचा वह

थे उसमें कुछ सूखे कुछ

कुम्हलाए फूल।।

 

विक्रम भैय्या जब पहुंचेगे

चंदा मामा के घर जाना है

चंदामामा के घर पहुंचेगे 

उड़न खटोले में पुआ ले जाएंगे

विक्रम भैय्या गए वहां

प्याली में खीर भर लौटेंगे

धरती मां पर हम ठुमकेंगे

दम भर तालियां बजाएंगे 

विक्रम भैय्या जब पहुंचेगे

चंदामामा उजाला रखना

अंधेरे में छुप जाना ना

बादलों को उड़ा देना 

भैय्या को ढेर बल्लए देना

अम्मा के पास से हम देखेंगे

विक्रम भैय्या जब पहुंचेगे.

नया वर्ष

ये साल भी आया पिछले साल की तरह
कुछ लोग जाम उड़ाते रहे कुछ बनाते रहे।

ठंडी हवा नीला आकाश सब होगा
चलें तो लोग कदम साथ बढ़ाते रहे।

गीत भी हों संगीत भी होगा
राग सजे ऐसा झनकार बजाते रहे।

महफिल में नए पुराने सभी हों
कहानी किस्से सुनते सुनाते रहें।

आंखें नम हों बिछड़ने का ग़म हो
जिन्दगी के सफ़र में गले मिलते मिलाते रहें।।

रात भर दिया और मोम जले
सुबह का वार्तालाप

मेरा पूछो मैं जला
जल जल के हुआ काला मैं
रहा ताप से पीड़ित
रौशनी बुझी जब
तब जाकर हुआ ठंडा मैं।

मेरा तो सोच दिये
बोली मोम
मैं भी जली
जल जल के पिघली मैं
रूप स्वरुप हुआ नष्ट मेरा।

देना है दुनिया को प्रकाश गर
कर सर्वस्व न्योछावर
जलना ही होगा,
जलना ही होगा ।।

“आज के दौर में”

बिकाऊ है हर शय आज के दौर में
कुछ भी नाजायज नहीं आज के दौर में।

हुनर आजमाइये ऐब का फिर देखिए
खुल जाएगी किस्मत आज के दौर में।

दिल लगाइए किसी से कही भी लेकिन
हाथ बढाइए तो हमसे मिलाइए आज के दौर में।

लुटेरों ने लुटेरों से कहा कुछ भी नहीं मेरे पास
कहां से लूट लाए तुम माल इतना आज के दौर में।

चोरों के घर में हो गई चोरी चिल्लाया चोर
गैरकानूनी काम हो रहा आज के दौर में।

खड़ा होता हूं तो लगता है छत सर पे
आलीशान मकान बनवाया मैंने आज के दौर में।

खेलते थे फुटबाल जिन गलियों में
संकरी हो गई है वो गलियां आज के दौर में।।

“दिन रात एंकर मुर्गे लड़ाते हैं”

सर कटा लूं शमसीर हरगिज़ न उठाऊंगा
अपनो से हो जंग हरगिज़ न जाऊंगा।

मय-कदे के कायदों के कायल थे हम
वहां भी दीनधरम के झगड़े हरगिज़ न जाऊंगा।

चाकू छुरी बम गोली बरसती हो जहां
इल्म हासिल करने ऐसी जगह हरगिज़ न जाऊंगा।

दिन रात एंकर मुर्गे लड़ाते हों जहां
ख़बरें सुनने को ऐसे चैनल हरगिज़ न लगाऊंगा।

हाशियों में लिखने के महकमे में रहा हरदम
अपनी कोई कहानी हरगिज़ न सुनाऊंगा।

कदमताल करने में ही बेहतरी हो गर
आगे क़दम हरगिज़ न बढ़ाऊंगा।

जिन सीढ़ियों पर चढ़ लौटना न मुमकिन हो
उन ऊंचाइयों पर हरगिज़ न जाऊंगा।

हरा दरख़्त

उस हरे दरख़्त को सूख ही जाना था
मौक़ा देख बंजर छोड़ चले जाना था।

ऊंचा हरा दरख़्त जगह बदल रहा था,
शाखाओं को भी साथ चले जाना था।

हरे पेड़ को ज़मीं से जब पानी न मिले,
शाखाओं को झूमना भूल जाना था।

लोग आए हरे दरख़्त की शाखाएं मोल ले गए,
गर होता वह मज़बूत सावन आ जाना था।

बंजर में उस हरे दरख़्त का ही साया था
तेल मिला वहीं अब उसको काटा ही जाना था।

झड़ गई सारी बौर आंधी में फल माली ने तोड़े
शदीद धूप में हरे दरख़्त को सूख ही जाना था।।

हे सूर्यदेव

सूर्योदय प्रदान करते रहो

हम सूर्योपासना करतें रहें,

क्योंकि

जिधर आप दृष्टि करते हैं

प्रकाश प्राप्त होता है

अन्यथा अंधेरा ही अंधेरा है।

“गुझिया चिप्स बनाते थे”

बचपने में
होली जब आती थी
मन ऊंचे ऊंचे उछलता था
होली आने की तैयारी होती थी
गुझिया चिप्स बनाते थे
पिचकारी की टेस्टिंग करते थे
गुब्बारों में रंग भरते थे
आसानी से रंग धुल जाए
शरीर पर तेल मलते थे
टोलियां कई बनाते थे
दौड़ के रंग लगाते थे।

समय बदला
तौर तरीके बदले
रंगीन बोतलों का इंतज़ाम होता है
बर्फ का फ्लास्क निकलता है
हल्दीराम का नमकीन आता है
महफ़िल लम्बी जमती है
जब दिल छक जाता है
तब मन को सुरुर आता है
बिन घुंघरू नाचते फिरते हैं
कीचड़ में कमल हो जाते हैं
तब होली ढंग से मनती है
जब उठा के कोई घर पहुंचाता है
होली त्योहार है मस्ती का
तौर तरीकों से क्या लेना
कैसे भी हो मस्ती छाती है
होली की बहारें जंचती हैं।

कुछ बनना है तो पगले झूठ बोला कर।
बहुत बड़ा बनना है तो और बड़ा झूठ बोला कर।।

तलवार देने को हर कोई राज़ी है
म्यान की बात कोई नहीं करता।।

A short love story

वह आया था क्या?
हां!
कुछ बोला?
नहीं!
आंख भी न मिलाई
सारे वक्त
चाय बनती देखता रहा।

“ठंड के मौसम की कुछ पेशकश”

दिसम्बर का महीना है ‘कमल’
धूप का सुबह से इन्तज़ार है।

रफ्ता रफ्ता यह भी साल बीता
जंग हार कइयों का दिल जीता।
कितने बचे दिन सोचने का मौक़ा न मिला
करने को अभी काम बहुत है बचा।

कोहरे की चादर में लिपटा हुआ सूरज
चांद की ठंडक लिए दुल्हन सा लगा।

ये मुस्कुराते चेहरे हंसते खिलखिलाते दोस्त
उतरेगा सुबो नशा तो मुरझा जायेंगे।

 खिड़कियों से धूप नहीं झांकती
सूरज निकला है पर अंधेरा है।

“चांद हो आसमां पे चढ़ा”

करेला हो और वो भी नीम चढ़ा
हकीम हो वो भी कम लिखा पढ़ा।

गन्ने का गुड़ हो आग पर चढ़ा
झूठ हो मीठा वो भी शीरे में कढ़ा।

आंगन में पलंग पे मैं रहूं पड़ा
ठंडक लिए चांद हो आसमां पे चढ़ा।

खुले बदन लेटे रहे सर्दियों की धूप में
तकिए के नीचे हो सर जब सूरज हो चढ़ा

आरजू

गुस्से से भर के आया सामने से निकल गया
भोली सूरत जो देखी मुस्करा के निकल गया।

आरज़ू थी कहें उससे दिल की बातें तमाम
घर तक गया उसके फिर सामने से निकल गया।।

 

“बचे तेल से
पकवान बन जाते हैं”

तेल से भरे दिये

गली में जो
रोशनी के लिए जलाते हो।

बुझ जायें तो
फेंक न देना इन्हें।

बहुतों के घरों में
चूल्हे की रोशनी हो जाती है।

बचे तेल से उनके यहां
पकवान बन जाते हैं।।
************************

अजीब तन्हाई है! 

घर में
सामान भरपूर है।

भरीं हैं अलमारियां
खोलो तो गिरती हैं
एक दो साड़ियां
करती हैं
एक-दूसरे से बातें
कैद कर रखा है हमें
अजीब तन्हाई है
चलो बाहर कूद चलें
ये मालकिन भी न!

पहले कभी घूम आते थे
सुगन्धित इत्र से नहाते थे
उकता गया है मन
न कहीं बाहर घूमने जाना
अलमारी में पड़े पड़े
हो गयी है जमा मैल
न ड्राई क्लीनिंग होती कभी
न साबुन पानी से ही नहलाती
ये मालकिन भी न!

पहले कभी घूम आते थे
सुगन्धित इत्र से नहाते थे
उकता गया है मन
न कहीं बाहर घूमने जाना
अलमारी में पड़े पड़े
हो गयी है जमा मैल
न ड्राई क्लीनिंग होती कभी
न साबुन पानी से ही नहलाती
ये मालकिन भी न!

कभी कभी
खोलती है अलमारी जब
रोशनी रोशनदान से
झांकती है तब
निहार के कर देती है
अंधेरों में हमें बन्द
जैसे नोट हों
तिजोरी में बंद
ये मालकिन भी न!

डॉ कमलजीत सिंह

 

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