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कार्तिक पूर्णिमा: “बहुत याद आ रहा है त्रिमुहानी का मेला”: रामधनी द्विवेदी

“मध्यांतर”

बहुत याद आ रहा है त्रिमुहानी का मेला: रामधनी द्विवेदी

आज कार्तिक पूर्णिमा है। आज मुझे अपने गांव के पास के त्रिमुहानी मेले की बहुत याद आ रही है। बचपन में इस मेले का हमें काफी शिद्दत से इंतजार होता था। तब गांवों में इतने बड़े मेले एकाध ही लगते थे। मुझे याद नहीं कि इससे बड़ा कोई मेला लगता भी था। मेरे गांव के पड़ोसी गांव मझगवां में दशहरा मेला लगता था लेकिन वह छोटा ही होता था। एक बगीचे में कुछ घंटे में यह संपन्‍न हो जाता था। रामलीला शाम के ही समय होती थी क्‍यों कि तब रोशनी की कोई व्‍यवस्‍था नहीं थी। बिजली गांवों में आई नहीं थी। रामलीला दो एक घंटे की होती और सूर्यास्‍त होते ही उसे बंद कर दिया जाता। आज भी दशहरा मेला सूर्यास्‍त के थोड़ी देर बाद तक ही लगता है। अब तो मझगवां और आसपास के गांव बिजली की रोशनी से जगमग रहते हैं और लोग तार खींच कर मेले में बल्‍ब लटका लेते हैं।

पहले तो दूकानदार छोटी ढिबरी या लालटेन से ही काम चलाते। जो बड़े दूकानदार खासतौर से हलवाई होते, जिनकी मिठाइयां देर तक बिकतीं,वे जरूर पेट्रोमैक्‍स जलाते जिसे उन दिनों गैस कहते थे। एक पेट्रोमैक्‍स उलटा लटकाया जाता था जिससे अधिक रौशनी होती। अब तो मझगवां का दशहरा बस नाम मात्र का रह गया है। आसपास के बाजारों में रामलीला,दशहरा और दुर्गापूजा न जाने कितनी जगह होती है। हर बाजार अपना अलग से आयोजन करता है। अब लोग अधिक धार्मिक नहीं हुए हैं बल्कि उनके पास पैसे हो गये हैं जिससे ऐसे आयोजनों में सुविधा हो गई है। अब तो कई साल से मेरे गांव चक्‍के में भी दो जगह दुर्गापूजा होती है। दोनों के आयेाजकों में एक दूसरे आगे निकलने की होड़ लगी रहती है। हमारे प्रमुख बाजार पराऊगंज की दुर्गापूजा अलग होती है।


बात तो त्रिमुहानी मेले की हो रही थी कि बीच में दशहरा और दुर्गापूजा आ गई। मेरे गांव के चार किमी पश्चिम कार्तिक पूर्णिमा को गोमती और सई के संगम पर लगने वाला यह मेला पूरे जिले मे मशहूर था। अब भी होगा ही। मुझे वहां गए कई साल हो गए। यहां जलालपुर इसे आती सई जौनपुर से आगे चलती गोमती में मिल जातीं और उनका अस्त्तित्‍व यहीं समाप्‍त हो जाता। आगे वह गोमती हो जातीं जो कुछ कोस और आगे जाने पर गंगा में मिल जातीं। नदियों का यह संगम भारत में आदि काल से पवित्र माना गया है और आस्‍था का केंद्र रहा है। जहां भी दो नदियों मिलती हैं,वहां अलग तरह की अलौकिकता रहती है,ऊर्जा का अदृश्‍य रूप वहां अनुभव होता है। इसी ऊर्जा के अवगाहन के लिए आदि काल से लोग ऐसे संगम पर जुटते रहे हैं। प्रयागराज का संगम तो विश्‍व प्रसिद्ध है ही।
यह त्रिमुहानी का मेला तब जिले के बड़े मेले में माना जाता था। आज भी एक वर्ग के लिए यह विशेष आयोजन के रूप में ही होता है। मेरे बचपन में दो दिन पहले से घरों में तैयारी शुरू हो जाती थी। घर में दो दिन पहले से ही कद्दू आदि खरीद कर रख लिया जाता था क्‍यों कि तब मेला देखने मेहमान भी आते थे। घर में दूध घी तो हेाता था लेकिन तब सब्‍जी आदि मिलना कठिन होता था। बारिश में घर के पिछवाड़े लौकी,कद्दू,सेम आदि बो दिए जाते। सूरन स्‍वत: पैदा हो जाते।उस समय गांव में यही सब सब्‍जी उपलब्‍ध रहती। घरों में उड़द की बड़ी अच्‍छी मात्रा में रहती। इन्‍हीं से काम चल जाता। जो अच्‍छे किसान थे और जिनमें यहां आलू आदि की खेती होती थी, वे थोड़ा सुविधा जनक स्थिति में होते क्‍यों कि दशहरे के आसपास लोग बोने के लिए आलू बाजार से लाते। उसी से कुछ सब्‍जी आदि का भी काम हो जाता। पूड़ी- तरकारी,खीर बनती यहा दही जम जाता और त्‍योहार के लिए क्‍या तैयारी की जरूरत थी। देवोत्‍थान एकादशी पर गनने की पूजा कर नेवान हो जाता था। एकाध कोल्‍हू भी गड़ जाते। उससे गन्‍ना पेर कर रस निकाल लेते और दही डालकर पीते और पिलाते। जिनके यहां अधिक मेहमान आते,वे अड़ोस पड़ोस से रजाई गद्दा भी मांग कर जुटाते। मेरे यहां बारीगांव से फुफेरे लोदर भैया, गुतवन से दूसरे फुफेरे दुखी भैया जरूर आते। मारकंडेय भैया की ननिहाल से दो एक मामा लोग, कभी मेरे ननिहाल पांडेपुर से कोई मामा, कभी कभी दशरथ के ननिहाल तेवर से कोई मामा लोग जरूर आते। देा चार मेहमान तो सबके घर आते ही।


दोपहर को पूड़ी सब्‍जी खाने के बाद तीसरे पहर मेला जाने की तैयारी होती। मेला लगना दो दिन पहले से ही शुरू हो जाता। दूकानदार अपनी दूकानों की तैयारी करते। जो समय से पहुंच जाता,उसे अच्‍छी जगह मिल जाती। मेलहरू भी एक दिन पहले से जाने लगते। दूर- दूर से यह मेला देखने लोग आते। आठ दस किलोमीटर से तो लोग तो आते ही। जो शाम को पहुंच जाते वे वहीं पेड़ों के नीचे बट्टी चोखा बनाते और वहीं बालू के बिस्‍तर पर गमछा आदि बिछा कर सो रहते।

मुझे मेले में पहली बार जाने की याद बहुत धुंधली है। तब मैं पांच छह साल का था और कानपुर पढ़ने नहीं गया था। उस साल मेले में मैं अपनी आजी के साथ गया था।साथ में फुआ और कुछ महिलाएं थीं। मेले में घर की बुजुर्ग महिलाएं, बच्‍चे और दो एक पुरुष जाते। मेरे घर से आजी, फुआ, कभी कभी बड़की माई, मारकंडेय भैया जो मुझसे सात आठ साल बड़े हैं, झारखंडेय भाई साथ रहते। मेरे दो ताऊ भी कभी जाते मेहमानों के साथ। मेला पैदल ही जाना होता। यदि कोई साइकिल आदि से जाता तो उसे भी उतर कर ही चलना होता क्‍यों कि पगडंडी पर लोगों की भीड़ बनी रहती और उस समय चकबंदी नहीं होने से चौड़े चकरोड नहीं थे। ये पगडंडियां खेत की मेड़ से होती हुई गांव बाहर बाहर चलती मेले तक पहुंचा ही देतीं। लोगों के पैर धूल से भर जाते। मेले तक जाना भी अपने में कम उल्‍लासमय नहीं होता था। मुझे याद है,पिता जी ने मुझे एक गेलिस वाला पैंट और कमीज कानपुर से लाकर दी थी। बद्धी वाला सैंडल भी था। मां ने मुझे पहले ही तेल- काजर लगा, ककई कर तैयार कर दिया था। मैं प्रफुल्लित था कि मेला जाना है।

मेला आने पर सबसे बड़ी खुशी मेला देखाई मिलने की होती। उस साल मुझे छह पैसे मिले थे। किसी ने एक पैसा तो किसी ने अधेला दिया। मैं परिवार का दुलरुआ था तो मुझे एकाध पैसे अधिक मिले थे। पैसे लेकर मैं मेला गया तो लेकिन खर्च एक भी नहीं हुआ। पाकेट में पैसों को ऊंगलियों से छूने और और अपने को विशिष्‍ट महसूस करने का अपना ही सुख होता है। बड़े होने पर भी पास में पैसा होने पर ऐसा ही सुख लोगों को मिलता है। ल लौटने पर सभी पैसे मां को दे दिया।

त्रिमुहानी का मेला तीन हिस्‍सों में लगता है आज भी। एक हम लोगों की ओर,सई और संगम के दाहिनी ओर, दूसरा दोनो नदियों के संगम के तिकोने में और तीसरा गोमती के बायें तट पर। मेरी तरफ का मेला सबसे बड़ा होता,भीड़ अधिक यहीं होती। मेला नदी तट पर बालू के मैदान पर लगता है।इसी पर दूकाने सजतीं हैं। मेरे बचपन में सबसे प्रमुख दूकान रेवड़ा (चीनी या गुड़ का बना गट्टा) की होती। मेरे गांव के तीन चार हलवाई और बनिया वहां रेवड़ा की दूकान लगाते। दस दिन पहले से ही उसे बनाना शुरू कर देते। एकाध कुंतल होने पर मेले में जाते,ऊंट पर लादकर। सुबह से ही दूकाने सज जातीं। हर मेलहरू अपनी जेब के अनुसार रेवड़ा जरूर खरीदता क्‍यों कि महीनों चलने वाली यह मिठाई बाद मे कम ही मिलती।मेले में चोटहिया जलेबी भी बिकती। काली काली लेकिन स्‍वाद में गजब। कम बजट के लोगों के लिए वह रसभोग से कम स्‍वादिष्‍ट नहीं होती। मेरी फुआ उसे जरूर खरीदतीं और स्‍वाद से खातीं। अब चोटहिया जलेबी मिलती भी कम हैं,लोग पसंद भी कम करते हैं। उसके विकल्‍प आसानी से मिलने लगे हैं जो। मेले में लोहार, बढ़ई भी अपना सामान लाते, बेचने के लिए। लकड़ी की कठवत, भंडरिया ( मिट्टी की दीवाल में बनी आलमारी का किवाड़) चौका-बेलन,तावा कलछुल, चिमटा, खुरपा-खुरपी,फावड़ा कुदाल आदि भी बिकता मेले में ।( मुंशी प्रेमचंद की कहानी ईदगाह याद कीजिए) चमड़े का सामान भी बिकता, हाथ से सिल कर बना कच्‍चे चमड़े का जूता, मोट (कुंएं से पानी निकालने के लिए चमड़े का बना बड़ा पात्र) भी बिकती। आजकल तो गांवों में पुरवट चलते ही नहीं, इसलिए लोग मोट को समझेगे ही नहीं, उसकी जरूरत भी कम ही पड़ती होगी। जिसे जो जरूरत होती, वह वही खरीदने के उद्देश्‍य से भी मेले जाता। सबसे प्रमुख चीज मेले की हेाती, भेडि़अहवा कंबल।भेड के खुरदुरे ऊन से बना यह कंबल मेले में सबसे अधिक बिकता। मेले से लौटती भीड़ में किसी न किसी के कंधे पर यह जरूर दिख जाता। अधिकतर यह काले रंग का होता और चार या पांच पटरों को जोड़कर बनता। एक कंबल यदि ठीक से संभाला जाए तो कई साल चल जाता। कंबल खरीद कर घर लाने पर लोग इसे फिनिश करते। इसका तरीका होता कि भैंस की पीठ पर खूब कड़ुआ तेल लगा कर उसी पर कंबल को दो लोग दो तरफ से पकड़कर आगे पीछे खींचते। इससे वह थोड़ा मुलायम हो जाता। लेकिन फिर भी ओढ़ने पर तो गड़ता ही। ये कंबल गाजीपुर के व्‍यापारी लाते। मेले के तीनो हिस्‍सों में इसकी खूब विक्री होती। 1985 में मेरे पिता जी ने तब एक कंबल मेले से ही डेढ़ सौ रुपये में खरीदा था जो अब तक चल रहा है। कुछ अच्‍छे कारीगर इसका स्‍वेटर भी बनाते और मफलर भी। लेकिन ऊन इतना कड़ा होता कि इसे पहनना सबके बस की बात नहीं होती।

मेले में मनोरंजन के भी साधन थे। बाहरी हिस्‍से में कहीं मुर्गो की लड़ाई होती तो कहीं भेड़ों की। अब यह शौक कम लोग पालते होंगे। इनकी लड़ाई के लिए साल भर तैयारी की जाती। अपने मुर्गों और भेड़ों को अच्‍छा गिजा ( खाने की खुराक) दिया जाता। उनको अच्‍छी तरह ट्रेंनिंग भी दी जाती तब जाकर मेले में लड़ाई लायक होते। मैने मुर्गो और भेड़ों की लड़ाई देखी है। यह काफी खूनी लड़ाई होती है। कुछ मुर्गे तो इतने घायल हो जाते कि उनकी जान ही निकल जाती। भेड़ों की भी या तो सींग टूट जाती या सिर फट जाता। भेड़ बहुत गुस्‍सैल जानवर होता है। इसे यदि एक बार मार दो तो वह बार- बार मारता है।इसका हमला करने का तरीका जंगली सुअर की तरह होता है।यह दुश्‍मन पर दौड़कर सिर से हमला करता है। इसे पालने वाले बहुत सावधान रहते हैं नहीं तो वह उन्‍हीं का टक्‍कर मार कर हाथ पैर तोड़ दे। मेले में दो भेड़ एक दूसरे के सिर पर टक्‍क्‍र मारते हैं। वे पहले पीछे हटते हैं और तेजी से आकर आपस में सिर टकराते हैं। उनके सिर की हड्डी इतनी मजबूत होती है कि कड़े- कड़े वार को झेल जाती है। इसे लड़ाई के लिए तैयार करने वाले लोग पहले लकड़ी के मोटे पटरे से इसे लड़ाते हैं फिर काफी अभ्‍यास के बाद यह मैदान में उतरता है। भेड़ पालने के शौकीन इसे दूध घी और अंडे आदि भी खिलाते हैं और मेले में लाते समय इसे खूब सजा कर,सीगों में कालिख और तेल पोत कर,पैरों में घुंघरू बांध कर और कभी कभी चारों पैरों में फुलेरा भी बांधते हैं। देखते ही बनता है सजा संवरा भेड़। इसे मोटे और मजबूत लाठी से खूब कस कर बांधा जाता है और पालने वाली लाठी और रस्‍सी को हाथ में मजबूती से पकड़ता है। अब पता नहीं यह सब मेले में होता है कि नहीं।
मेले में कहीं-कहीं नाच आदि भी होता। छोटे मोटे जादू दिखाने वाले भी दिख जाते। बांसुरी,पिपिहरी, चरखी और गुब्‍बारे तो बिकते ही। मेले से लोटते बच्‍चों के मुंह से पिपहरी की पीं पी की आवाज बात देती कि लोग मेले से लौट रहे हैं। गोधूलि में लौटते मेलहरू,उनका शोर,घर पहुंचने की आपा-धापी आज भी आंखों में उसी तरह जीवंत लगता है जब मैं 1972-73 में आख्रिरी बार झारखंडेय भाई के साथ मेले गया था। बहुत याद आ रहा है त्रिमुहानी का मेला।

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