सात सदस्यीय संविधान पीठ को सौंपा गया मामला
विधि विशेषज्ञ जे.पी. सिंह की कलम से
उच्चतम न्यायालय की 5 सदस्यीय संविधान पीठ ने 3:2 के बहुमत से मामले को इससे बड़ी यानी सात सदस्यीय संविधान पीठ को सौंपा है। उच्चतम न्यायालय ने सबरीमाला मंदिर ही नहीं, मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश तथा दाऊदी बोहरा समाज में स्त्रियों के खतना सहित विभिन्न धार्मिक मुद्दे नए सिरे से विचार के लिए सात सदस्यीय संविधान पीठ को सौंपा है। पांच जजों के पुराने फ़ैसले पर कोई रोक नहीं लगाई गई।मंदिर में हर उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर रोक नहीं है।
चीफ़ जस्टिस ने कहा कि याचिकाकर्ता इस बहस को पुनर्जीवित करना चाहते हैं कि धर्म का अभिन्न अंग क्या है? उच्चतम न्यायालय ने कहा कि पूजा स्थलों में महिलाओं का प्रवेश सिर्फ मंदिर तक सीमित नहीं है,मस्जिदों में भी महिलाओं का प्रवेश का मुद्दा शामिल है।5 जजों की पीठ में से चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस जे खानविलकर और जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने मामला बड़ी पीठ को सौंपे जाने की बात कही। जस्टिस नरीमन और जस्टिस चंद्रचूड़ ने इससे असहमति जताई।
सबरीमाला पर उच्चतम न्यायालय ने फ़िलहाल महिलाओं के प्रवेश पर फिलहाल रोक लगाने से इनकार कर दिया है।इसके साथ ही पुनर्विचार याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट ने सात जजों की संविधान पीठ को भेज दिया है।अब यह पीठ इस मामले में अपना फैसला सुनाएगी।उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इन सभी सवालों को हम बहुमत से (3 जज) बड़ी पीठ (7 जज) को सौंप रहे हैं, तब तक इस मामले में तय सवालों का जवाब लंबित माना जाए।सबरीमाला केस की सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इस केस का असर सिर्फ इस मंदिर नहीं बल्कि मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश, अग्यारी में पारसी महिलाओं के प्रवेश पर भी पड़ेगा।उच्चतम न्यायालय ने कहा कि परंपराएं धर्म के सर्वोच्च सर्वमान्य नियमों के मुताबिक होनी चाहिए।
गौरतलब है कि कुछ साल पहले तक केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की इजाजत नहीं थी। पिछले कुछ सालों में महिला संगठनों द्वारा सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे को उठाया गया था, जिसके बाद उच्चतम न्यायालय ने महिलाओं के पक्ष में फैसला सुनाया था।फैसले में महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने की इजाजत दी थी। परंपरा और धार्मिक मसला बताते हुए कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ चीफ जस्टिस गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने एक रिव्यू पिटीशन दायर की गई थी।
चीफ जस्टिस ने कहा कि याचिकाकर्ता इस बहस को पुनर्जीवित करना चाहते हैं कि धर्म का अभिन्न अंग क्या है? उच्चतम न्यायालय ने कहा कि पूजा स्थलों में महिलाओं का प्रवेश सिर्फ मंदिर तक सीमित नहीं है। मस्जिदों में भी महिलाओं का प्रवेश का मुद्दा शामिल है। 5 जजों की पीठ में से चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस जे खानविलकर और जस्टिस इंदु मल्होकत्रा ने मामला बड़ी बेंच को सौंपे जाने की बात कही।जस्टिस नरीमन और जस्टिस चंद्रचूड़ ने इससे असहमति जताई।
सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर रोक नहीं
उच्चतम न्यायालय के पुराने फ़ैसले के ख़िलाफ़ दलीलें दी गईं कि संविधान का अनुच्छेद-15 नागरिकों को तमाम सार्वजनिक संस्थानों में प्रवेश का अधिकार देता है लेकिन इस अनुच्छेद में धार्मिक संस्थानों को शामिल नहीं किया गया है। अनुच्छेद-15 (2) सार्वजनिक प्रतिष्ठामनों में प्रवेश में भेदभाव को रोकता है।ये संस्थान सेक्युलर कैटेगरी में आते हैं।धार्मिक संस्थान इसमें शामिल नहीं हैं।यह दलील भी दी गयी कि सांविधान पीठ के फैसले में दोबारा विचार की जरूरत है क्योंकि संविधान का अनुच्छेद समाज में छुआछूत को खत्म करने की बात करता है और उस प्रावधान का इस मामले में गलत इस्तेमाल हुआ है, क्योंकि किसी विशेष आयु की महिला के प्रवेश पर बैन जातिगत अवधारणा पर आधारित नहीं है।अनुच्छेद-17 छुआछूत के उन्मूलन की बात करता है।
सबरीमाला मंदिर में जो मूर्ति हैं उसके चरित्र को देखना होगा और इस पहलू पर विचार करना होगा। सभी देवताओं का अपना चरित्र है।सबरीमाला में देवता का चरित्र नैस्टिक ब्रह्मचारी का है।हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है कि वह मंदिर में पूजा करे लेकिन पूजा का तरीका जो तय है उसी हिसाब से पूजा अर्चना करनी होती है।मासिक धर्म की उम्र वाली महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से वर्चित करना अनैतिक नहीं है बल्कि ये धार्मिक परंपरा है।
पुनर्विचार याचिका के विरोध में दलील दी गई कि उच्चतम न्यायालय के फैसले के रिव्यू का कोई आधार नहीं है।इसमें कोई कानूनी पहलू नहीं उठाया गया है।वहीं विजय हंसारिया ने कहा कि रिव्यू अर्जी के जरिये दोबारा मामले को खोलने की कोशिश की जा रही है। एक तय उम्र की महिलाओं का प्रवेश वर्जित करना हिंदू धर्म का अभिन्न अंग नहीं है।रिव्यू पिटिशन का वह विरोध करते हैं।
अपने ऐतिहासिक फैसले में उच्चतम न्यायालय ने 28 सितंबर 2018 को कहा था कि केरल के सबरीमाला मंदिर में हर उम्र की महिलाओं के प्रवेश की इजाजत दी जाती है।उच्चतम न्यायालय ने 4 बनाम एक से दिए बहुमत के फैसले में कहा था कि 10 साल से लेकर 50 साल की उम्र की महिलाओं का मंदिर में प्रवेश पर प्रतिबन्ध लिंग के आधार पर भेदभाव वाली प्रथा है और ये हिंदू महिलाओं के मौलिक अधिकार का हनन करता है।
गौरतलब है कि केरल के पठनामथिट्टा जिले की पहाड़ियों के बीच भगवान अयप्पा का मंदिर है, जिसे सबरीमाला मंदिर के नाम से जानते हैं। इसी जिले में पेरियार टाइगर रिजर्व भी है, जिसकी 56.40 हेक्टेयर जमीन सबरीमाला को मिली हुई है। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए 18 पावन सीढ़ियों को पार करना पड़ता है, जिनके अलग-अलग अर्थ भी बताए गए हैं। इस मंदिर में हर साल नवंबर से जनवरी तक, श्रद्धालु अयप्पा भगवान के दर्शन के लिए आते हैं क्योंकि बाकी पूरे साल यह मंदिर आम भक्तों के लिए बंद रहता है। मकर संक्रांति के अलावा यहां 17 नवंबर को मंडलम मकर विलक्कू उत्सव मनाया जाता है। मलयालम महीनों के पहले पांच दिन भी मंदिर के कपाट खोले जाते हैं।
सबरीमाला मंदिर करीब 800 साल से अस्तित्व में है और इसमें महिलाओं के प्रवेश पर विवाद भी दशकों पुराना है। वजह यह है कि भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी माने जाते हैं, जिसकी वजह से उनके मंदिर में ऐसी महिलाओं का आना मना है, जो मां बन सकती हैं। ऐसी महिलाओं की उम्र 10 से 50 साल निर्धारित की है। माना गया कि इस उम्र की महिलाएं पीरियड्स होने की वजह से शुद्ध नहीं रह सकतीं और भगवान के पास बिना शुद्ध हुए नहीं आया जा सकता।