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सचिवालय 3: “तीसरी आंख”: “तो आप हैं हरि कान्त त्रिपाठी….!”

दास्तान ए सचिवालय : 3
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हरिकांत त्रिपाठी, आईएएस

वर्ष 2009 का जुलाई महीना चल रहा था । मुझे ग़ाज़ियाबाद के मुख्य विकास अधिकारी के पद पर काम करते लगभग डेढ़ साल हो गया था । मेरी तैनाती ख़ासतौर पर मुख्यमंत्री मायावती जी की निर्विवाद और ईमानदार अधिकारी की माँग पर प्रमुख सचिव नियुक्ति जे एस दीपक साहब की पसंदगी पर हुई थी । शुरुआती संघर्षों के उपरान्त सब कुछ अनुकूल हो चला था और मैं सुस्थापित महसूस करता था । ज़िलाधिकारी के बाद सबसे वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर पब्लिक, नेता और साथी अधिकारियों का स्नेह , सम्मान मिल रहा था, गरज ये कि गाड़ी मज़े में चल रही थी ।

एक दिन दफ़्तर में बैठा था कि ज़िलाधिकारी कैम्प से एक पत्रावली मुझे मिली । पत्रावली वन विभाग की थी जिसमें किसी इंजीनियरिंग संस्थान के लिए रिज़र्व फ़ॉरेस्ट की ज़मीन में रास्ता देने के लिए ज़िलाधिकारी की संस्तुति शासन को जानी थी । ग़ाज़ियाबाद में इंजीनियरिंग कॉलेज कुकुरमुत्ते की तरह उगे हुए थे । मैंने बिना यह जाने कि विषयगत संस्थान किस तुर्रम खाँ का है डी एफ ओ अशोक दीक्षित से भारतीय वन अधिनियम मँगवाया और सुसंगत धाराओं का उल्लेख करते हुए स्पष्ट लिख दिया कि किसी निजी संस्थान के पहुँच मार्ग के लिए रिज़र्व फ़ॉरेस्ट से ज़मीन हस्तांतरण की कोई व्यवस्था नहीं है फिर भी ज़मीन का मामला है तो अपर ज़िलाधिकारी प्रशासन का भी मत ले लिया जाये । थोड़ी देर बाद यह पता चला कि ज़िलाधिकारी रमेश कुमार पत्रावली को परामर्श के लिए मुझे भेजने के साथ ही मुझे प्रभारी ज़िलाधिकारी बनाकर एक हफ़्ते की छुट्टी पर तमिलनाडु चले गये थे। पत्रावली मैंने कैम्प कार्यालय भिजवा दी और वहाँ से वो डी एफ ओ अशोक दीक्षित को भिजवा दी गई ।

अगले दिन सुबह से ज़िले में योगेश कुमार प्रमुख सचिव लघु सिंचाई का भ्रमण था , उनकी अपेक्षा थी कि गाँवों में विभागीय परियोजनाओं का निरीक्षण करते वक़्त मैं भी उनके साथ रहूँ । मैं उनके साथ साथ तमाम गाँवों में निरीक्षण करा रहा था कि मुझे कमिश्नर मेरठ राधा चौहान मैडम का फ़ोन आ गया । वे मुझसे पूछीं – त्रिपाठी जी आपने फ़ॉरेस्ट डिपार्टमेंट की किसी पत्रावली पर आपत्ति लगाई है ?

मैं उन्हें समझाने लगा कि ऐक्ट के प्राविधानों के विरुद्ध फ़ॉरेस्ट विभाग का प्रस्ताव था , तो मैंने अपना मत लिख दिया ।

वे आगबबूला हो गईं और बोलीं – आपसे क्या मतलब था , डी एफ ओ जानता और डी एम जानते ।

मैंने कहा कि मैंने तो डी एम साहब के निर्देश पर ही परीक्षण किया था ।

वे बोलीं –“डी एम अपने तो छुट्टी पर भाग गए, आपको अभी सब पता चल जायेगा! ऊपर से आ ही रहा होगा “.

उन्होंने ग़ुस्से में फ़ोन काट दिया । निरीक्षण पूरा कराकर मैं लोक निर्माण विभाग के विश्राम गृह में आया । प्रमुख सचिव के साथ मध्याह्न भोजन किया और उनको नमस्कार करके परेशान हाल अपने ऑफिस ‘विकास भवन’ मेंं आ गया ।

मायावती जी मुख्यमंत्री थीं, ऐसे में कमिश्नर साहिबा के कथन का अर्थ बहुत गहरा भी हो सकता था । मैंने स्टाफ़ से बात की तो पता चला कि वो प्रकरण तद्समय के कैबिनेट सेक्रेटरी शशांक शेखर के रिश्तेदार का था और डी एफ ओ दीक्षित जिसकी मुझसे पुरानी खुंदस थी , सब जगह कहता घूम रहा है कि सी डी ओ साहब शाम तक निबट जायेंगे । निबट जाने का अर्थ यदि ट्रांसफ़र होता तो मैं दुखी के बजाय ख़ुश ही होता, पर निलम्बन जो उस शासन में निराधार हो जाया करते थे, को सोचकर मैं बेहद परेशान था ।

थोड़ी देर बाद वही पत्रावली ए डी एम ई सतीश कुमार की संस्तुति के साथ कि संस्थान उतनी ज़मीन फ़ॉरेस्ट विभाग को हस्तांतरित कर देगा , मेरी मेज़ पर फिर बतौर प्रभारी ज़िलाधिकारी निर्णय के लिए आ गई । मेरा कभी सेवा में जवाब तक तलब नहीं हुआ था सो प्रस्ताव एक्ट के प्राविधानों के विरुद्ध होने पर भी मुझ पर निलम्बन का इतना दबाव था कि मैंने यह लिखते हुए कि ए डी एम ई की संस्तुति के आधार पर कार्यवाही हेतु प्रस्ताव शासन को अग्रसारित , वापस कर दिया। यह एक तरह का कमज़ोर सा डैमेज कन्ट्रोल था, सो मैं निलम्बन आदेश या स्थानान्तरण आदेश की प्रतीक्षा करता हुआ दिन काट रहा था ।

देखते देखते एक हफ़्ता गुज़र गया तो मैं निश्चिंत होने लगा और मुझे लगा कि मेरा “कमज़ोर” डैमेज कन्ट्रोल काम कर गया । तभी मेरे मित्र और गाँव के भतीजे राम जन्म पाण्डेय की बेटी के विवाह की तारीख़ आ गयी और मैं रात की ट्रेन से ग़ाज़ियाबाद से लखनऊ के लिए निकल पड़ा । रात में ट्रेन में ही मुझे मेरे वरिष्ठ चोब सिंह वर्मा साहब का फ़ोन आ गया कि मेरी जगह पर आई ए एस अधिकारी जुहैर बिन सग़ीर की तैनाती हो गई है । मैंने पूछा कि मेरी पोस्टिंग कहाँ हुई तो उन्होंने बताया कि ट्रान्सफर लिस्ट में आपका नाम ही नहीं है ।

मैं सोचने लगा कि यदि मुझे प्रतीक्षारत किया गया है तो मेरा नाम स्थानांतरण सूची में लिख कर आगे ‘प्रतीक्षारत’ लिखा जाना चाहिए था । किसी को प्रतीक्षारत तभी किया जाता है जब उसका वर्तमान पद से हटाया जाना तत्काल ज़रूरी हो और बाद में उसकी पोस्टिंग पर इत्मीनान से निर्णय लिया जाता है । मैं लखनऊ पहुँच गया और विवाह समारोह में शामिल होने के बाद जो थोड़ा मोड़ा सामान था, उसकी पैकिंग कराने और चार्ज छोड़ने के लिए ग़ाज़ियाबाद वापस पहुँच गया ।

ग़ाज़ियाबाद में पता चला कि दीक्षित डी एफ ओ ने मेरी नोटिंग की कॉपी पत्रावली पाते ही उसी समय शासन में तैनात आई एफ एस अधिकारी पवन कुमार को भेज कर नमक मिर्च लगाकर मेरी शिकायत कर दी थी । दरअसल दीक्षित ने लाखों रूपये का घोटाला मनरेगा की धनराशि में करा दी थी जिसे मैंने स्थल निरीक्षण में पकड़ा और उनके विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए डी एम से अनुमति माँगी थी । दीक्षित ने डी एम के समक्ष गिड़गिड़ाते हुए यह आदेश करा दिया कि वन विभाग घोटाले की धनराशि वापस करे और वन रेंजर के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की जाये । दीक्षित बहुत अपमानित महसूस कर रहे थे । पवन कुमार देखने में तो सीधे पर घुटे हए जुगाड़ू अधिकारी थे । सोनभद्र भूमि घोटाले में उनकी भूमिका पर जाँच प्रचलित थी पर रिज़ल्ट क्या रहा पता नहीं । पवन कुमार ने कैबिनेट सेक्रेटरी से मेरी शिकायत की थी जो कमिश्नर के माध्यम से मुझ तक पहुँच गई थी । मैं ट्रान्सफर होने से तो ख़ुश था पर तैनाती की अनिश्चितता से तनाव में था । दिन भर पैकिंग करवाकर और शाम तक सग़ीर को चार्ज देकर मैं लखनऊ वापस चला आया ।

लगभग एक हफ़्ता पोस्टिंग का इन्तज़ार करता रहा । एक हफ़्ते तक वेटिंग का कोई प्रतिकूल असर नहीं होता और वो ज्वाइनिंग टाइम मान लिया जाता है, एक हफ़्ते से अधिक होने पर गैप का औचित्य के साथ मर्षण कराने पर ही वेतन निकल पाता है । बतौर सजा मेरी गृह विभाग में विशेष सचिव की तैनाती का आदेश रविवार को आ गया और मैं ख़ुशी ख़ुशी सोमवार आठवें दिन सचिवालय के शास्त्री भवन में पहुँच गया ।

घुसते ही मुझे मेरे महराजगंज में डी एम रहे संजय प्रसाद मिल गये । वे हँसते हुए मुझसे पूछे कि आप यहाँ कैसे?

मैंने बताया कि गृह विभाग में विशेष सचिव के पद पर तैनाती हुई है सो ज्वाइन करने आया हूँ । उन्होंने ने बताया कि वे गृह विभाग में ही विशेष सचिव तैनात हैं और ट्रांसफ़र हो गया है चार्ज देने आये हैं । दोनों लोग प्रमुख सचिव कुँवर फतेहबहादुर के कक्ष में साथ साथ गए । मैंने प्रमुख सचिव को अपना परिचय दिया तो उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे तक कई बार देखा और बोले – तो आप हैं हरि कान्त त्रिपाठी…. खैर आ गये हैं तो ज्वाइन करिए ।

बाद में मुझे संजय प्रसाद की गाड़ी , ड्राइवर , चैम्बर और उनको आबंटित काम मिल गये और मैं विशेष सचिव गृह हो गया ।

बाद में पता चला कि वन विभाग के उस प्रस्ताव को तत्कालीन वन मंत्री फतेहबहादर सिंह ने अपने ही स्तर पर अस्वीकृत कर दिया ।

(क्रमश:)

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