
नौका यात्रा का रोमांच साथ में इतिहास- भूगोल और समाज भी
( सफर एक डोंगी में डगमग)
इस किताब की चर्चा वरिष्ठ पत्रकार शम्भु नाथ शुक्ल कई बार कर चुके हैं अपनी फेसबुक की पोस्ट में। वह अध्ययनशील पत्रकार हैं और जिस पुस्तक का उल्लेख अपने लेखों या पोस्ट में करते हैं,उसका अलग महत्व होता है। अर्थात उसमें कुछ अलग किस्म की सामग्री होती है। अभी कुछ दिन पहले जब उन्होंने इसकी फिर चर्चा की तो लगा पढकर देखना चाहिए। अमेजन ने आर्डर के दूसरे दिन पुस्तक उपलबध करा भी दी।
‘सफ़र एक डोंगी में डगमग’ उस नौका यात्रा का वृतांत है जो शुरू हुई 22 मार्च 1976 को और 62 दिन बाद 22 मई को पूरी हुई कलकत्ता (अब कोलकाता) में जाकर। लेकिन इसे अनुभव को पुस्तक का आकार लेने में 38 साल लग गए। इसे लिख तो लिया गया था 32 साल बाद ही लेकिन कुछ समय और लग गया प्रकाशित होने में और पहला संस्करण 2014 में आया। मैंने जिस पुस्तक को पढ़ा वह दूसरे संस्करण की है जो चार साल बाद 2018 में आया।
यात्रा करने के बाद, यह साहस करने वाले राकेश तिवारी इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि – ‘इस अभियान में जैसा सोचा गया था तकरीबन वैसा नहीं हुआ। कहां तो बनारस से डोंगी खरीदने की इच्छा थी और खरीदी गई कानपुर से। चलने वाले थे टोली बनाकर, अकेले ही सिर मारने निकले, जिनके साथ निकलना चाहा वे अटक गए, जिनसे इस विषय पर बात भी नहीं हुई थी वे साथी बन गए। नहर और चंबल में चलने की कोई योजना नहीं थी लेकिन चलना पड़ा। परिस्थितियां ही रास्ता दिखाती रहीं। सोचा था दो – तीन लोग बारी-बारी एक-एक घंटा नाव चलाएंगे, लेकिन बनारस तक अकेले ही डांड खींचने के बाद आकस्मिक निर्णय लिया कि क्यों न आखीर तक अकेले ही आजमाया जाए और आखिर में डोगी मंजिल तक पहुंच ही गई।‘
इस यात्रा के बाद वह इस निष्कर्ष पर भी पहुंचे कि जितनी जरूरी है अभियान पर निकलने से पहले की तैयारी,उतना ही जरूरी है तैयारियों के चक्कर में ज्यादा पड़े बिना एक बार निकल पड़ना।फिर तो रास्ता बनता ही जाता है।
राकेश तिवारी पुरातत्वविद हैं। वह बीएचयू से पढ़े हैं इसलिए पूरी यात्रा को वह अपनी पुरातात्विक दृष्टि से भी देखते हैं। मुझे तो इसे पढ़ते समय उनके साथ यात्रा करने जैसा आनंद आया जो शायद उनके यात्रा के अंतिम साथी अभय को भी नहीं आया होगा लेकिन सबसे अधिक सुखद अनुभूति हुई यात्रा में पड़ने वाले ऐतिहासिक स्थलों की जानकारी के साथ उनके नाम की व्युत्पत्ति जानने में ।
क्या आप यह जानते हैं कि नदियों में चलने वाली छोटी नावों को डोंगी कहा जाता है। यह डोंगी शब्द संस्कृत का है जिससे अंग्रेजी का डिंगी और अरबी का दोनींज बना है। वास्तव में संस्कृत का मूल शब्द डोंगी नहीं द्रोण है। द्रोण दोने को कहते हैं जो पत्तियों का बना होता है जिसमें रख कर कुछ खाया या पिया जाता है। यह पानी में तैरता भी है। इसमें दीप रखकर नदियों में प्रवाहित करते देखा जा सकता है। वैदिक काल में लकड़ी का बना गोल पात्र जिसमें कलश आदि यज्ञ सामग्री रखी जाती थी। (इसे नाद के रूप में भी समझा जा सकता है जिसमे जानवर चारा खाते हैं ) इसे यदि पानी में प्रवाहित किया जाए तो यह डूबता नहीं। पहले पेड़ के बड़े तनों को गोल खोखला काट कर नाव का काम लिया जाता था। बाद में पूरे लठ्ठे को बीच से खाली कर नाव का काम लिया जाने लगा। इसकी आकृति लंबी दोनो ओर नुकीली होती थी। नाव का यह सबसे प्राचीन रूप है। लकड़ी की गोल आकृति-द्रोण से ही डोंगी बना। यह तत्सम न हो कर तद्भव है। आदिवासी इलाकों में समुद्र अथवा नदियों में ऐसी डोंगी अब भी देखी जा सकती है।
इस यात्रा का सबसे बड़ा आनंद है भाषा के बदलते रूप को देखना। जब आगरा नहर से दो लोग अनोखी डोंगी पर निकलते हैं तो कौतुहल भरे लोगों का पहला प्रश्न था- कहां से आय रए, कहां कू जाए रए। यह प्रश्न हुबली तक पूछा गया बस भाषा बदलती गई- ओए – दादा—तो मा र बाड़ी-ई कोथाय। प्रश्न एक भाषा अलग अलग। मल्लाहों से यह सवाल दो हजार साल से पूछे जा रहे हैं और आगे भी पूछे जाते रहेंगे।
यात्रा वृतांत लिखने का अपना तरीका होता है। उसमें लेखक का अंतर दिखता है। कोई और होता तो इसे नदियों के तटों की लोकसंस्कृति की व्याख्या में अधिक बदलता। इसमें लोक संस्कृति दिखती तो है, जगह जगह का समाज इसमें प्रतिविंबित होता है, उसका सामाजिक सरोकार भी दिखता है लेकिन राकेश तिवारी पुरात्तवविद होने के कारण साथ-साथ अपने मार्ग का इतिहास-पुराण भी बताते रहते हैं। इससे उनके लेखन में न केवल गंभीरता आती है बल्कि पाठक का भी ज्ञान वर्धन होता है। किस ऐतिहासिक क्षेत्र का नाम बदल कर कैसे वर्ततान स्वरूप में आया,यह पूरी किताब में यत्र-तत्र है। चंबल के जितने नाम- चर्मवती, चम्बिल, चामील, चम्बल, चामर और चामल आदि इसमें बताए गए हैं, उतने शायद ही कोई जानता हो। इसी तरह तरबूज के लिए हिंदमाना, हिरमाना, हिनमाना और माना। विंध्याचल के पास अकोढ़ी का नाम के पीछे अक्रोधी शब्द। चरणाद्रि से चुनार आदि। बनारस नाम के पीछे काशी राज की राजधानी वाराणसी का नाम औरंगजेब के समय में महमूदाबाद रखने,बाद में राजा बनार के नाम पर बनारस रखने,अंग्रेजों द्वारा उसे बेनारस करने और बाद में संपूर्णानंद जी के प्रयास से वाराणसी नाम रखने का भी उल्लेख है।
बनारस का वर्णन करते समय नदियों की उत्पत्ति की कहानी और उनके नामकरण के पीछे की कथा अनोखे तरह से बताई है। असि और वरुणा कैसे बनीं। उनके नामकरण के पीछे क्या कथा है आदि। पंचगंगा के घाट पर पांच कौन सी नदियों का मिलन माना जाता है,यह बहुत सलीके से बताया गया है। इसी तरह मार्ग में पड़ने वाले सभी स्थानों गाजीपुर, गहमर, कर्मनाशा, बक्सर, दिघवारा, आदि नामकी व्युत्पत्ति भी इसमें है। कर्मनाशा का पानी क्यों नहीं पिया जाता,इसकी भी जानकारी है।गंगा की धाराओं का रहस्य, अलखनंदा को ही असली गंगा मानने के पीछे का तर्क आदि बेहद महत्वपूर्ण हैं।
बंगाल की हरियाली यात्री का मन मोह लेती है और वह इसके मुरीद हो जाते हैं। पूरा भारत शस्य श्यामला है लेकिन गंगा-दोआब के मीलों फैले हरे खेत,पहाड़ों की सीढ़ीदार खेतों की हरियाली, केरल के ताड़,नारियल और धान की हरीतिमा से ये हरियाली कतई मेल नहीं खाती। इसकी पहचान ही अलग है।जिसे इसे देखना समझना हो उन्हें एक बार बंगाल जरूर जाना चाहिए।
पुस्तक में गंगा के प्रदूषण की बात भी गंभीारता से उठी है। बनारस से ही इसकी शुरुआत हो जाती है और बंगाल आते-आते यह समस्या अति गंभीर हो जाती है। 1976 से अब तक गंगा लगातार गंदी की की जा रही हैं। प्रयाग में रमते साधु ने गंगा और संगम की जो व्याख्या की वह तो एकदम अलग ही है।
इस पुस्तक में सिर्फ यात्रा का रोमांच ही नहीं, बहुत कुछ है। 23 साल के युवक की लगन और दुर्दमनीय इच्छा ही थी जिसने इसे पूरी किया। पुस्तक के शुरू में यात्रा का विचार कैसे आया, कैसे तैयारी की, क्या क्या दिक्कतें आईं, कैसे नाव खरीदी गई और कानपुर से दिल्ली लाया गया। दिल्ली में ट्रैफिक पुलिस वाले और ट्रक ड्राइवर के बीच की भाग-दौड़ गजब का रोमांच पैदा करता है। मैने तो एक सिटिंग में इसे पूरा नहीं किया लेकिन आप पढना शुरू करेंगे तो बिना अंत के रुकेंगे नहीं, तो क्यों नहीं इसे मंगाते और पढ़ते। राजकमल से प्रकाशित यह पुस्तक अमेजन पर भी है और 180 रुपये में पेपर बैक संस्करण मिल रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार रामधनी द्विवेदी
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