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“सर्पगंधा घाव को भरता है और पेट के कीड़े को नष्ट करता है”: प्रबोध राज चंदोल

Medicinal Plants: 1

सर्पगंधा

प्रबोध राज चंदोल
पेड़ पंचायत

सर्पगंधा का वानस्पतिक नाम राउवाॅल्फिआ सर्पेंटिना है। दुनिया में सर्पगंधा की कई प्रजातियां हैं। भारत में पश्चिम बंगाल में यह सभी जगह स्वाभाविक रूप में उगा पाया जाता है। भारत में लगभग 1200 मीटर की ऊंचाई तक इसकी खेती की जा सकती है।

यह लगभग एक मीटर ऊंचा सीधा छोटी झाड़ी वाला पौधा है। वैसे तो यह सदाबहार और बारहमासी पौधा है परंतु पतझड़ में इसके पत्ते झड़ जाते हैं जो बसंत में फिर से हरा-भरा हो जाता है। यह चांदनी के कुल का पौधा है जिसकी प्रत्येेक गांठ पर तीन या चार गहरे हरे रंग की पत्तियां होती हैं जो पीछे की ओर से हल्का पीलापन लिए होती हैं। फूलों की पंखुड़ी सफेद और नलिका हल्के लाल रंग की होती हैं। इसके फूल गुच्छे में होते हैं तथा फल छोटे, गोल, बैंगनी जो पककर काले दिखने लगते हैं। जड़ की छाल धूसरित पीले रंग की व पौधे की छाल का रंग पीला होता है। इसके फूल व फल अपै्रल से अक्टूबर के मध्य आते हैं। यह औषधि में प्रयोग होने वाला एक महत्वपूर्ण पौधा है जो भारत में प्रायः वनों में सब जगह तथा आम के या अन्य बागों में नमी वाले स्थानों पर उगता है। वनों से बड़े पैमाने पर इसके दोहन से अब यह दुर्लभ वनस्पति की श्रेणी में आ गया है।

औषधि के रूप में इसकी जड़ और फल का प्रयोग होता है,। इसकी पत्तियां भी कभी-कभी उपचार में काम आ जाती हैं। जड़ों का प्रयोग हाइपरटैंषन या उच्च रक्तचाप, आंतों की व्याधियों, हैजा और बच्चे के पैदा होने में किया जाता है। इसकी जड़ों में कड़वा टोनिक होता है जिसमें पीड़ा हरने और ज्वर नाषक गुण होते हैं। पेचिस, अनिद्रा रोग तथा तंत्रिका तंत्र में बेचैनी आदि में जड़ें उपचार में काम आती हैं। कोर्निया की फुल्ली के उपचार के लिए पत्तियों की राख को आंखों में डाला जाता है।

सर्पगंधा की जड़ी सांप के विष को उतारने की एक अच्छी दवा है। ऐसा कहा जाता है कि नेवला जब सर्प से लड़ने जाता है तो इसकी पत्तियों का रस चूसकर जाता है। पहले इसे पागलों की दवा भी कहा जाता था क्यों कि इससे पागलपन ठीका होता है। यह कफ और वात को शांत करता है, पित्त को बढ़ाता है और भोजन में रूचि पैदा करता है। यह दर्द को खत्म करता है, नीेंद लाता है तथा काम को षांत करता है। सर्पगंधा घाव को भरता है और पेट के कीड़े को नष्ट करता है। इसकी जड़ अत्यंत तीखी व कड़वी, रेचक अर्थात् मल को निकालने वाली और गर्मी पैदा करने वाली होती है।

चूर्ण के रूप में 3 वे 5 ग्राम की मात्रा और काढ़ा 10 से 30 मिली. से अधिक का सेवन नही करना चाहिए। अच्छे लाभ के लिए चिकित्सक का परामर्ष लेना चाहिए। इसकी अधिक मात्रा में सेवन से घबराहट, हृदय में भारीपन, खून के दौरे में कमी, पेट में जलन आदि हो सकते हैं।

स्तनपार कराने वाली तथा गर्भवती स्त्रियों को इसका सेवन नही करना चाहिए। ष्षराबी व्यक्ति को सर्पगंधा का सेवन कदापि न कराएं। बच्चों को भी इसके सेवन से बचाए रखना चाहिए।

प्रबोध राज चंदोल
पेड़ पंचायत

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