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सीट बेल्ट लगाये होते तो मुंडे की न होती मौत

कार में सिर्फ ड्राइवर और आगे बैठी सवारी ही नहीं, बल्कि पीछे बैठे लोगों को भी सीट बेल्टे लगानी चाहिये। इसी प्रकार दो पहिया वाहन चलाते समय हेलमेट लगाना चाहिये। जहां तक बच्चोंल के साइकिल चलाने की बात है तो उन्हें भी साइकिल चलाते समय भी हेलमेट अवश्य लगाना चाहिये।

लखनऊ।

पांच साल पूर्व भाजपा नेता गोपी नाथ मुंडे की सड़क दुर्घटना में मौत हुई थी। उनकी कार का जब एक्सीरडेंट हुआ तब वह कार में पीछे बैठे थे और सीट बेल्टं नहीं पहने हुए थे। उनका ड्राइवर जो सीट बेल्टआ पहने था, वह बच गया। मुंडे ने अगर सीट बेल्ट पहनी होती तो वे भी बच सकते थे।
लोग इस बात को लेकर हमेशा अपने आपको असहज मह्सूस करते हैं, विशेषकर जब पुलिस के भय से उन्हें सीट बेल्ट पहननी पड़ती है। पीछे की सीट पर बैठने वालों के लिए तो सवाल ही नहीं उठता कि वे सीट बेल्ट बांधें। जबकि गाडी में कोई कहीं भी बैठे, सीट बेल्ट का उपयोग उसे करना ही चाहिए। कार में बैठकर अगर सीट बेल्ट नहीं लगायी है तो यह गलत है, नुकसानदेह है।

कार में सिर्फ ड्राइवर और आगे बैठी सवारी ही नहीं, बल्कि पीछे बैठे लोगों को भी सीट बेल्टे लगानी चाहिये। इसी प्रकार दो पहिया वाहन चलाते समय हेलमेट लगाना चाहिये। जहां तक बच्चोंल के साइकिल चलाने की बात है तो उन्हें भी साइकिल चलाते समय भी हेलमेट अवश्य लगाना चाहिये।

शुक्रवार को लखनऊ के किंग जॉर्ज चिकित्साक विश्वोविद्यालय के न्यूेरो सर्जरी विभाग द्वारा स्पारइनल कॉर्ड सर्जरी को बचाने के लिए आयोजित जागरूकता कार्यक्रम में ये जानकारी दी गयीं। न्यूररो सर्जरी विभाग के डॉ सोमिल जायसवाल बताते हैं कि कार में सभी को सीट बेल्ट लगाने की जरूरत होती है। सीट बेल्ट लगाना कितना सुरक्षित, और न लगाना कितना खतरनाक हो सकता है इसका ज्वरलंत उदाहरण है गोपी नाथ मुंडे की दुर्घटना में हुई मौत।

इस कार्यक्रम में स्कूाली बच्चोंा को बुलाया गया था क्योंकि उन्हें सड़क पर वाहन के साथ उतरने से पहले ही सचेत कर देना अधिक जरूरी है। डॉ सोमिल जायसवाल ने बताया कि बच्चोंक को साइकिल चलाते समय भी हेलमेल पहनने का संदेश देने का उद्देश्य् यह भी है कि जहां उनकी वर्तमान में स्पाचइनल कॉर्ड इंजरी से बचाव होगा वहीं बड़े होकर उनकी हेलमेट लगाने की आदत बरकरार रहेगी। इससे कार वालों को भी टू व्हीीलर चलाते समय हेलमेट लगाना उन्हेंम अतिरिक्त। कार्य महinसूस नहीं होगा।

डॉक्टर जायसवाल ने बताया कि स्कूली छात्र समाज में बदलाव की सीढ़ी हैं। हम मानते है कि स्पाइनल कॉर्ड इंजरी के इस मुद्दे के प्रति उन्हें संवेदनशील बनाने से निश्चित रूप से उनमें, उनके सहकर्मी समूह, परिवारों और समाज में बदलाव दिखने लगेगा।

केजीएमयू के न्यूरो सर्जरी विभाग के विभागाध्यदक्ष प्रो बीके ओझा ने बताया कि केजीएमयू का न्यूरोसर्जरी विभाग अपनी स्थापना के समय से ही स्पाइनल कॉर्ड की चोट के प्रबंधन में अग्रणी है। उत्तर प्रदेश में स्पाइनल कॉर्ड की चोट के रोगियों को सस्ता और गुणवत्ता पूर्ण इलाज प्रदान करने में विभाग पहले स्थान पर है। उन्होंीने बताया कि स्पाइनल कॉर्ड की चोट के रोगियों की संख्या अन्य न्यूरोसर्जिकल सेन्टर की तुलना में बहुत अधिक है। सन २०१८ में हमने स्पाइनल कॉर्ड की चोट के लगभग 350 रोगियों को इमरजेन्सी में देखा और उनमें से 300 को भर्ती किया। अस्पताल में 270 मरीजों का आपरेशन किया गया। यह आंकड़ा देश के सभी न्यूरोसर्जिकल इमरजेंसी केंद्रों में सबसे अधिक है।

सितम्बर के प्रथम सप्ताह को विश्व भर में स्पाइनल कॉर्ड इंजरी जागरूकता सप्ताह के रूप में मनाया जाता है। इसी श्रृंखला में हमारे विभाग द्वारा यह आयो‍जन किया गया है। प्रो ओझा बताते हैं कि रीढ की हड्डी की चोट के बचाव पर जोर देने वाले जागरूकता कार्यक्रमों की इस समय जरूरत है। चूंकि ऐसे मरीजों के परिवार पर अत्यधिक आर्थिक और मानसिक बोझ पड़ता है। इसलिए न्यूरोसर्जरी विभाग ने यह पहल की है कि रीढ की हड्डी की चोट के रोगियों का इलाज करने के साथ-साथ समाज को यह भी जागरूक किया जाना चाहिए कि स्पायइनल कॉर्ड की चोट को कैसे रोका जाये?

आज के जागरूकता कार्यक्रम का उदघाटन प्रति कुलपति प्रो0 मधुमति गोयल, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक प्रो0 एस एन संखवार, विभागाध्यक्ष प्रो बीके ओझा, वरिष्ठ संकाय सदस्य प्रो0 अनिल चन्द्रा और प्रो0 क्षीतिज श्रीवास्तव द्वारा किया गया।

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