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“जिस घर में गौरैया नियमित आती हैं, उसमें हारी-बीमारी नहीं आती”

 RAMDHANI DWIVEDI 

विश्‍व पर्यावरण दिवस पर विशेष

“जब चूं चूं चाची नाराज हो गईं”

वह वसंत पंचमी का दिन था जब सुबह पहली बार उनसे मुलाकात हुई थी। लगभग साढ़े पांच बजे सुबह वह आईं और कुछ बातचीत कीं, हाल-चाल लिया और चली गईं अपने रोज के काम पर। तब से यह नियम बना हुआ है। वह रोज आती हैं, थोड़ी बातचीत करती हैं और चली जाती हैं। वह अपने समय की पाबंद हैं और किसी भी दिन न लेट हों और न ही नागा करती हैं। उनकी समयबद्धता के सब कायल हैं। पता नहीं उनकी घड़ी कैसी है कि कभी लेट नहीं होने देती । हम लोग तो मोबाइल का अलार्म बजने पर भी आलस में लेटे रहते हैं और कभी कभी तो जगने के बाद दोबारा झपकी आ जाती है।

लेकिन एक वह हैं कि जहां साढ़े पांच बजा, सुबह की उजास फैलने लगी कि वह हाजिर हो जाती हैं। थोड़ी देर बात करती हैं, दिन भर का सुखा – दुखा पूछती हैं और फिर अपने काम पर चली जाती हैं। वह दिव्‍या से भी बात करती हैं। उनके काम के बारे में पूछती हैं – कहां काम करती हो जो इतने सुबह तैयार होने लगती हो। दिव्‍या बताती हैं कि क्‍या करें,आठ बजे दफ्तर पहुंचना होता है।इतनी सुबह तैयारी न करूं तो समय पर न पहुंचू और सैलरी कट जाए। भैया मेट्रो तक छोड़ देते हैं, नहीं तो और लेट हो जाए। मेरे कारण वह भी परेशान होते हैं।

दिव्या ने बताया कि आप दो दिन नहीं थे और जब मौसी के यहां शादी में गए थे, वह आईं और आपको नहीं देखा तो पूछने लगीं कि कहां गए तुम्‍हारे पापा। दो दिन से अकेली हो। मैने जब बताया कि कल आ जाएंगे तो वह चुप हुईं। वह बहुत बोलती हैं, चपर -चपर ।

आज सुबह अपने टाइम से आ गईं। उनकी आवाज से मैं उनकी ओर मुखातिब हुआ । पूछीं –कहां थे दो दिन। मुझे दिखे नहीं। मैंने बताया तो बोलीं कि हां दिव्‍या ने बताया तो था। लेकिन बिना आपसे बात किए मन नहीं मानता।


बोलीं- मेरी याद नहीं आई।

मैने कहा- जब आपसे मुलाकात का समय था तो दो दिन ट्रेन में था और एक दिन सुबह तक शादी में व्‍यस्‍त था। आपकी याद नहीं आई। वह नाराज हुईं।

बोलीं – आप मुझे भूल जांए। मैं तो आपको नहीं भूली। रोज आती थी। आपको आवाज देती थी लेकिन आप दिखते नहीं थे। जब दिव्‍या ने बताया तो कुछ संतोष हुआ। अरे, बतकही में देरी हो गई। चलूं, अपने काम पर।

मैं उनकी नाराजगी समझ सकता था। मैने ही दो दिन बाहर रहने की बात उनसे नहीं बताई थी। अचानक चला गया था। हालांकि जाने का कार्यक्रम तो एक हफ्ते पहले ही बन गया था।

आज तो गजब ही हो गया। वह हम लोगों के पहले ही हाजिर थीं। उनकी आवाज से नींद टूटी। अभी अलार्म बजने में भी 15 मिनट बाकी थे। किचन में पहुंचा तो
बोलीं- सो रहे थे क्‍या अभी तक।

हां, अभी साढ़े पांच नहीं बजे थे।

आप लोगों की घड़ी अलग है। मेरी घड़ी अलग। देखते नहीं, दिन बड़ा हो रहा है। उजाला फैल गया है और आप लोग सो रहे हैं। हम तो सूरज के साथ सोते-जागते हैं। वह जल्‍द उगने लगा तो हम जल्‍द उठने लगे।

बातचीत में थोड़ी देर हुई तो कुछ और आवाज उन्‍हीं कर तरह सुनाई दी। वह हड़बड़ा कर बोलीं। चलें बच्‍चे आवाज दे रहे हैं। लगता है,भूखे हैं, और वह तेजी से चली गईं।

यह सब मैं अपनी चूंचूं चाची के बारे में बता रहा हूं जो रोज सुबह मेरे किचन के पास के बारजे पर आ जातीं हैं और मुझसे बात करती हैं। चूं चूं चाची मेरी प्रिय गौरैया चाची हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि वह अब शहरों में नहीं रहतीं। लेकिन मेरे अपार्टमेंट के पार्क के पेड़ उन्‍हें भा गए हैं और वह वहीं अपने परिवार के साथ बस गईं है। वह रोज आती हैं अपनी भाषा में बोलती हैं। हम उनके सवालों को समझकर अपनी भाषा में जवाब देते हैं। क्‍या बात करने के लिए एक दूसरे की भाषा जानना जरूरी है।लेकिन उनका आवास बचा रहे, इसकी कोशिश सभी को करना चाहिए।

मेरी मां कहा करती थीं कि जिस घर में गौरैया नियमित आती हैं, उसमें हारी-बीमारी नहीं आती।

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