“दोपहर 12 बजे की लू में भी भरा पूरा बाजार दिखा”

RAMDHANI DWIVEDI
“मेरी सांसों में बसा मेरा गांव”
जब मैं जौनपुर-बनारस मार्ग पर जलालपुर चौमुहानी पर पहुंचा तो वह पहचान में ही नहीं आई। मैं तीन साल बाद गांव जा रहा था और चौमुहानी की पहचान पाकड़ के आधा दर्जन से पेड़ हाईवे के चौड़ीकरण की भेंट चढ़ चुके थे। पहले हम उन्हें देख कर समझते थे कि चौमुहानी आ गई, अब सतर्क हो कर देखना पड़ा कि कहीं आगे न चले जांए। चौराहे पर कई नई दूकाने भी खुल गई हैं और सज गई हैं। पर पटेल की मशहूर पेड़े की दुकान छोटी ही रह गई। इन तीन सालों में बहुत बदलाव आ गया है। लेकिन पराऊगंज वैसा ही दिखा, थोड़ा अधिक जन-संकुल। सात जून की दोपहर 12 बजे की लू में भी भरा पूरा बाजार दिखा। गांव के आसपास का भूगोल भी बदला दिखा। गांव के पूर्वी छोर पर जहां हम लोगों के खेत थे एक ईंट भट्ठे की चिमनी घना धुआं उगल रही थी। मेरे पट्टीदारों तक ने खेत की मिट्टी भट्ठे को दे दी थी। बिना कुछ किए पैसा मिल रहा था लेकिन उपजाऊ जमीन बंजर हो रही थी। गांव के घरों में भी बदलाव दिखा। अनेक घरों की सीमाएं उनके चारों ओर खड़ी दीवारें बता रहीं थीं। अब लोग सीमित होने लगे हैं।मेरे बचपन के असीमित सीमा वाले दुआर अब सिकुड़ गए हैं।गांव के उत्तरी-पूर्वी सीमा को घेरने वाली पिचरोड गहरे गड्ढों में बदल गई है। लगता है सालों से उसकी मरम्मत नहीं हुई है।

घर में आयोजित अखंड रामायण में जाने का यह अवसर था। बहुत से नए पुराने लोगों से मुलाकात का अवसर भी। मेरी वय के लोग अब कमजोर दिखे,सिर पर श्वेत केशों की राशि और श्वेत हो गई है, चेहरों पर वार्धक्य के निशान दिखने लगे हैं। उम्र के कारण बहुत से लोगों ने अब कहीं आना जाना छोड़ दिया है। कुछ अधिक शिथिल हो गए हैं। घर में हर आयोजन में दिखने वाले लोग जब नहीं दिखे तो मैने उनका हाल चाल करीबियों से पूछा। मेरे बालसखा रामप्रताप भाई भी पैर में चोट लगने से अब सहारा लेकर चल रहे हैं, श्रवणेंद्रिय भी अब पूरी तरह सतर्क नहीं रही। मैं जब आने वाले दिन उनसे मिलने गया तो बहुत खुश हुए। आग्रह किया कि आते जाते रहा कीजिए, जिससे मिलन हो जाया करेगा।वह मुझसे 15 दिन बड़े हैं। मैं उनका उसी तरह सम्मान करता हूं। मैं,रामप्रताप और धरणीधर कभी गांव के बगीचों में गर्मी की छुट्टियों में पटरे की नेकर और बनियाइन पहन कर घंटों घूमा करते थे। कभी कभी अखाड़े में भी पटका-पटकी हो जाती। इस बार यह सब याद आ रहा था। धरणीधर अब डा धरणीधर दुबे हो गए हैं। कुटीर संस्थान में सेवा के बाद पूर्वाचल विश्वविद्यालय के कुलसचिव और कार्यवाहक कुलपति होने के बाद अब गांव पर ही हैं। उनकी सादगी अनुकरण करने वाली है। उम्र में मुझसे कुछ छोटे वह गांव के पद में भतीजे लगते हैं।

मेरे गांव की शिक्षा केंद्र कुटीर संस्थान और विकसित हो रहा है। मैं उसके प्रबंधक प्रिय अजयेंद्र दुबे बब्बू से घर पर मिल चुका था लेकिन कुछ बातें फुरसत से करने सुबह उनके आवास पर गया। रामप्रताप भाई से भी मिलना था।बब्बू पद में मेरे भतीजे हैं और कालेज का बहुत सुचार प्रबंधन देख रहे हैं। मेरी आदत थी कि जब भी मैं गांव जाता था तो कालेज जरूर जाता। पहले अपने ताऊ और कुटीर संस्थान के संस्थापक ऋषि तुल्य पं अभयजीत दुबे के दर्शन करने जाता था और बाद में उनके न रहने पर उनके सुपुत्र चतुर्भुज भैया के पास जाता था। वे दोनों हर बार कालेज में कुछ न कुछ नया निर्माण जरूर दिखाते। इस बार यह परंपरा अजयेंद्र दुबे ने पूरी की। सुबह उनके आवास पर पहुंचा तो वह नहा धोकर तैयार थे जब कि मैं तो बिना नहाए ही चला गया था। उनके यहां ही नाश्ता किया और कुछ निजी बातें हुई। कुछ येाजनाएं मन में थीं,उनपर भी विचार किया। फिर उन्होंने कालेज दिखाने का आग्रह किया। यह खुशी की बात है कि कालेज परिसर में हर समय कुछ न कुछ नया निर्माण होता रहता है। इंटर कालेज का पुराना भवन तो है लेकिन पुराना कार्यालय जो छोटे से कमरे में था अब वहां नहीं है। अब वह नए आवास में काफी साल से शिफ्ट हो गया है। मैंने बब्बू को बताया कि जहां आज हरा भरा मैदान है,वहां कभी तालाब हुआ करता था और वहीं एक आम का सूखा पेड़ भी था। पुराना प्राइमरी स्कूल कहां था। वह टीला भी जिसे काट कर समतल बनाते समय कितने मानव कंकाल मिले थे। कहां पर कभी छप्पर लाइन से बने थे जिनमें हाई स्कूल की कक्षाएं चलती थीं। आज का भवन देखने पर कोई कल्पना नहीं कर सकता कि कितने सामान्य स्तर से यह विद्यालय शुरू हुआ था। बब्बू ने मुझे पूरे कालेज में भ्रमण कराया। धूप होने पर उनके सहायक ने जब मेरे सिर पर छाते की छाया करनी चाही तो मैने मना भी किया कि अभी मैं इतना कमजोर या बूढ़ा भी नहीं हुआ हूं। लेकिन सहायक साथ ही रहा। मैं पुस्तकालय में अपनी पुस्तकों को भी देखना चाहता था जिन्हें मैने गांव जाने पर दिया था। श्री भूषण मिश्र भाई साहब भी घर के आयेाजन में आए थे। उन्होंने बताया कि कुल ढाई सौ किताबें थी।

कुछ सीलन के कारण खराब हो गईं थी जो संभालने लायक नहीं बची थीं। यह पुस्तकालय मेरे बचपन में बना था। जिसमें हम लोग फर्श की मोजैक को चिकना करने के लिए सीमेंट के बोरे पर बैठ कर एक दूसरे को खींचते। इससे हम बच्चों का खेल भी हो जाता और मोजैक की घिसाई भी।घिसाई की मशीने बाद में आईं। बब्बू ने मुझे पुस्कालय के विस्तार की योजनाएं बनाई जिसमें इंटरनेट सुविधा से लैश प्रणाली स्थापित करने की योजना है जिससे वे बच्चे लाभान्वित हो सकें जिनकें पास इंटरनेट सुविधा नहीं है। ग्राम्य महिला क्लब खोलने की योजना भी उनकी है जिसका सुझाव धरणीधर जी ने दिया है। मैं पुस्तकालय में ही था और बातचीत कर ही रहा था कि अचानक बब्बू ने अंगवस्त्रम और माला पहनाकर सम्मान करने की बात की । मैं थोड़ा असहज हुआ लेकिन उनके आग्रह को टाला नहीं जा सकता था। मुझे श्री गीता साहित्य कुटीर के स्वर्ण जयंती वर्ष की स्मृति पट्टिका भी प्रदान की गई। गांव में ही अपना सम्मान मुझे संकोच में डाल रहा था। यह गांव की मिट्टी की महक है जो मेरी सांसों में रमी बसी है जो चुंबक की तरह अपनी ओर खींचती रहती है।
RAMDHANI DWIVEDI : मेरी सांसों में बसा मेरा गांव
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