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“क्‍या चल रहा है, क्‍या दिनचर्या है, स्‍वास्‍थ्‍य कैसा है, समय कैसे कटता है…?”: Ramdhani Dwivedi

Senior Journalist RAMDHANI DWIVEDI

Life after 70

पुराने मित्र फोन करते हैं, पूछते हैं– कैसे हैं, क्‍या चल रहा है, क्‍या दिनचर्या है, स्‍वास्‍थ्‍य कैसा है, समय कैसे कटता है आदि आदि।

मेरा सबको एक ही जवाब रहता है… ठीक हूं, स्‍वास्‍थ्‍य ठीक है, समय पहले की तरह ही व्‍यस्‍तता भरा है। समय कैसे कटता है, पता नहीं चलता। कभी-कभी तो लगता है, समय कम पड़ गया है। जो मैं अब कर रहा हूं, बहुत पहले शुरू कर देना चाहिए था लेकिन जीवन की आपा-धापी कहां अपने मन का करने देती है। 

मैं नियमत: तो 2008 में ही रिटायर हो गया था लेकिन प्रबंधन की उदारता ने और काम करने का अवसर दिया। और रिटायरमेंट के बाद 13 साल तक काम करता ही रहा। दैनिक जागरण के मालिकों और वरिष्‍ठ अधिकारियों ने न केवल लगातार सेवा विस्‍तार दिया, अपितु पूरा सम्‍मान भी। लेकिन हर चीज का अंत भी हेाता है। मेरा सेवा कार्य भी 31 दिसंबर 2021 को अंतिम रूप से विश्राम पाया। मन भी काम से उकता रहा था लेकिन आर्थिक जरूरतें काम करने को विवश करती रहीं थीं। लेकिन अब मैं पूरी तरह अपना हूं, परिवार का हूं, अपने मन का करने के लिए स्‍वतंत्र हूं, कर भी रहा हूं और इसकी शुरुआत जनवरी में दक्षिण की तीर्थ यात्रा से लौटने के बाद ही कर दी थी अपने यात्रा वृतांत को लिख कर।

मेरे संस्‍मरणों की पुस्‍तक आने ही वाली है। कई पुस्‍तकें मन में हैं, कुछ स्‍वरूप लेने लगी हैं, कुछ पर काम हो रहा है। सुबह पांच बजे से रात 10 बजे तक काम से फुरसत नहीं होती। मैं समझता हूं कि यदि मैं काम न करता होता तो अब तब बीमार हो गया होता। काम ही मेरा इलाज है, वही मुझे स्‍वस्‍थ रखता है।

व्‍यस्‍तता इतनी है कि तय काम के समय में दूसरे काम में लगा रहता हूं। यह समय मेरी संगीत साधना का है,तबला के रियाज का और मैं यह सब लिख रहा हूं। दोपहर में भोजन के बाद झपकी आ रही थी कि एक पुराने मित्र का फोन आया, हॉल-चाल हुआ,फिर झपकी आ ही गई। लगभग एक घंटे बाद नींद खुली। दिन में ही सपना भी देखा जो बहुत अच्‍छा नहीं था। सो कर उठते ही अखबार पढ़ने के लिए खोला- सुबह अखबार पढ़ ही नहीं पाया था क्‍योंकि सुबह नाश्‍ते के बाद भी कुछ लिखने की तैयारी में रिसर्च कर रहा था।

अखबार की नौकरी छोड़ने के बाद भी आज भी पांच अखबार पढ़ता हूं। लेकिन अब सोच रहा हूं कि अगले महीने से दो अखबार कम कर दूं। सबमें एक ही बात रहती है, कभी कभी वे बोर भी करते हैं, कुछ नहीं मिलता पढ़ने को। क्‍या मेरी तरह सभी लोग ऐसा ही सोचते हैं? दोपहर नहाने के पहले एक मित्र को उनकी प्रकाशित होने वाली स्‍मारिका के लिए काशी के वरिष्‍ठ पत्रकार श्री ईश्‍वरचंद सिन्‍हा जी पर 15 सौ शब्‍दों का संस्‍मरणात्‍मक लेख लिख कर दिया।

इस समय भी लिखना है लेकिन सोचा कि मित्रों को अपनी व्‍यस्‍तता बता दूं। पिछली नौ अक्‍टूबर को अपनी भतीजी डा प्रज्ञा शुक्‍ला के यहां गया था, सपरिवार लंच पर। बातचीत में मैने अपने स्‍वास्‍थ्‍य के बारे और व्‍यस्‍तता के बारे में बताया तो उन्‍होंने और उनके डा पति डा विनय ने कहा कि फूफा जी व्‍यस्‍त रहिए तो स्‍वस्‍थ रहेंगे। व्‍यस्‍तता खत्‍म हुई तो बीमारी की व्‍यस्‍तता आ जाएगी। डाक्‍टरों के यहां के चक्‍कर लगाने पड़ेंगे।

जब मैं सेवा में था तो छुट्टी के दिन यदि कोई काम न हो तो दिन नहीं कटता था। मैं सोचता था कि जब लोग रिटायर हो जाते होंगे, उनके पास कोई काम नहीं होता होगा तो उनका समय कैसे कटता होगा? कितना टीवी देखेंगे, कितना मित्रों के साथ गप लडाएंगे, मित्र अब साथ होंगे कि नहीं और नए बनते होंगे तो उनसे मन की कैसे कह पाएंगे?

मेरे पिता जी भी कभी आराम से नहीं बैठे। मेरे दादा जी को भी मैने कभी बिना काम के नहीं देखा। पिता जी तीन मार्च 1983 को रिटायर हुए और दूसरे दिन गांव आ गए और खेती में रम गए। दस साल तक सबसे अच्छी खेती की गांव में। वह 90 साल की उम्र पा कर शांत हुए। मेरे दादा जी भी जब तक जिंदा रहे, काम में ही लगे रहे और लगभग सौ साल की सार्थक उम्र पाई। वही डीएनए मेरे में है। बैठे रहा ही नहीं जाता। शरीर थकता है तो भी संगीत सुनने का मन करता है, नहीं कुछ तो तबले के लेशन ही देखता हूं यूट्यूब पर।

दीवाली पर सोसायटी के एक मित्र मिलने आए और ड्राइंग रूप में तबले का बैग देख कर पूछा कि कौन तबला बजाता है? तो बच्‍चों ने बताया कि पापा। मेरे दोनों पोतों ने भी सीखना शुरू किया था लेकिन यह धैर्य मांगता है जो उन किशोर मन के उड़ते पंखों के पास नहीं है। तबला मेरे मन में छिपा था- पिता जी की धरोहर के रूप में और मैने चार साल पहले सीखना शुरू किया जब मैं 70 साल का था। अब तक कुछ अधिक गति नहीं हो पाई है लेकिन क ख ग सीख गया हूं। इधर एक महीने से कुछ व्‍यतिक्रम आ गया है क्‍यों कि पुस्‍तक के प्रकाशन को लेकर कुछ नई व्‍यस्‍तताएं आ गई थीं। अब उससे राहत मिली है तो आज से फिर अभ्यास शुरू होगा।

तो मित्रों, मैं स्‍वस्‍थ हूं, सक्रिय हूं। उम्र का असर शरीर पर तो होता ही है, कुछ हल्‍की-फुल्‍की बीमारियां लगी रहती हैं। लेकिन मैं उनको कभी अपने पर हावी नहीं होने देता। सुबह लगभग पांच छह किमी टहल लेता हूं, पूरे एक घंटे से अधिक ही जिससे जाड़े में भी पसीना हो जाता है। रोज कुछ न कुछ लिखता हूं, कुछ नया पढ़ता हूं और खाना-पीना (पानी, दूध, मठ्ठा) आदि सामान्‍य है। इसे इसलिए स्‍पष्‍ट करना पड़ा क्‍योंकि पत्रकारों का पान और खान भी कुछ अलग होता है। लेकिन 49 साल तक इसी समुद्र में रहने पर इसका एक बूंद भी मुझे स्‍पर्श नहीं कर पाया। मेरे परिवार में किसी को भी नहीं, कम से कम अब तक।

मुझे तो लगता है कि अब मैं असली काम कर रहा हूं। जीवन अभी कुछ अर्थ का बन पाया है। अभी तक तो रोटी, कपड़ा और मकान की ही चिंता थी। अब इसकी चिंता नहीं है। यह बेटे की चिंता है। हालांकि वह पढ़ते समय से ही इसमें हाथ बंटाने लगे थे लेकिन अब मैं पूरी तरह इससे मुक्‍त हूं। रोटी कपड़ा और मकान की चिंता और उसके लिए धन अर्जन की चिंता और जीविका बची रहे, इसमें ही पूरा जीवन चला गया। अब लगता है कुछ ऐसा करना चाहिए जो स्‍थायी हो। अपने मन का हो, उससे अर्थ भले न प्राप्‍त हो लेकिन सुख और शांति जरूर मिले। देखिए क्‍या कुछ हो पाता है। 

तो मित्रों में ठीक हूं, आप कैसे हैं, यह भी बताइएगा।

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