
उनमें नारी की संवेदना भी जिंदा थी और राजनीति भी

रतिभान त्रिपाठी
बात उन दिनों की है जब श्रीमती सरोज दुबे सांसद बनकर इलाहाबाद के राजनीतिक आकाश में सितारे मानिंद चमक रही थीं। वह 1991 में जनता दल के टिकट पर चुनाव जीतकर इलाहाबाद जैसे गौरवशाली क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने देश की सबसे बड़ी पंचायत में पहुंच चुकी थीं। इलाहाबाद के तमाम जड़ीले और जड़खोदू नेता सिहा रहे थे, उनसे ईर्ष्या भी कर रहे थे लेकिन इन सबसे बाखबर होते हुए भी वह क्षेत्र के लोगों के काम में जुटी पड़ी थीं। लोगों से नियमित मिलना, उनके लिए फोन करना, चिट्ठी लिखना और जरूरत पड़े तो डीएम एसपी को फटकारना उनके दैनंदिन जीवन का हिस्सा बन चुका था। लोग उनसे खुश रहते थे।
एक दिन की बात है। मैं स्नटैली रोड के अपने फ्लैट पर दोपहर बाद पहुंचा और ताला खोलकर अंदर घुसा तो फर्श पर एक लिफाफा पड़ा था। मैंने लिफाफा उठाया। प्रेषक का नाम सुखराम, संचार मंत्री, भारत सरकार लिखा था। मेरे लिए कौतूहल यह था कि न मैं सुखराम से परिचित हूं और न ही उन्हें मैंने कभी चिट्ठी लिखी तो फिर मेरे घर उनका यह पत्र क्यों? खोलकर देखा तो अंदर सांसद श्रीमती सरोज दुबे का लेटरपैड था और उसमें नत्थी संचार मंत्रालय की एक चिट्ठी जो मेरे घर में आउट ऑफ टर्न फोन कनेक्शन लगने की थी। मैं हैरत में था कि मैंने कोई फोन मांगा नहीं, फिर यह अंदाजा लगाते देर नहीं लगी कि यह चमत्कार सरोज आंटी का है। मेरे प्रति उनकी आत्मीयता कुछ ऐसी थी कि मैं उन्हें आंटी ही कहकर संबोधित करता था।
उन दिनों मैं दैनिक जागरण का सिटी रिपोर्टर था, तो जब तब सरोज आंटी से मिलता भी रहता था लेकिन मैंने उनसे फोन कनेक्शन के लिए कहा नहीं पर सचमुच मुझे अपना घरेलू मानती रही होंगी, तभी बिना कहे फोन कनेक्शन की चिठ्ठी भेजवा दी। उन दिनों ऐसे फोन कनेक्शन मिलना थोड़ा सोशल स्टेटस की बात भी हुआ करती थी क्योंकि तत्कालीन डीएम (टेलीफोन) ने मेरे ऑफिस फ़ोन करके पूछा था कि आप पैसे जल्दी जमा कराइए, कनेक्शन लगना है।
बहरहाल, यह बात कभी बाद में कि आगे कैसे हुआ, हम यहां सरोज आंटी को याद कर रहे हैं। फैजाबाद (अयोध्या) में जन्मी श्रीमती सरोज दुबे 1975 के आसपास से इलाहाबाद की राजनीति में सक्रिय थीं। उनके पति जेएन दुबे तब इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकील थे। सरोज आंटी तब शायद हाशिमपुर रोड में किराए के मकान में रहा करती थीं। बाद में उनके पति जब इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज हो गए तो सरकारी मकान में चली गईं लेकिन अपनी राजनीति उन्होंने छोड़ी नहीं। 1985 में इलाहाबाद शहर उत्तरी से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ीं।

मुकाबला अनुग्रह नारायण सिंह से था, लेकिन टिकट न मिलने के कारण तत्कालीन कांग्रेस नेता अशोक बाजपेई भी उनके विरोधी हो गए थे। जब बाहरी और भीतरी दोनों तरह के विरोधी सक्रिय हों तो उन्हें चुनाव हारना ही था। लेकिन इस हार ने सरोज आंटी को और आत्मबली बना दिया। 1989 में राजीव गांधी के विरोध में वीपी सिंह का सिक्का चल रहा था। दावेदारों की सूची में सरोज दुबे भी थीं लेकिन टिकट धुरंधर समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्र को मिला। वह जीते और केंद्र में मंत्री बने। लेकिन जैसा पहले से होता रहा था। खिचड़ी सरकार दो ढाई साल में रफा दफा हो गई और मई 1991 के चुनाव में वीपी सिंह के प्रभाव से सरोज आंटी को टिकट मिला। वह जीत गईं।
कुछ साल बाद उनके पति जस्टिस जेएन दुबे तबादले पर पटना हाईकोर्ट पहुंच गए। इस बीच श्रीमती सरोज दुबे का बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव से संपर्क हुआ। लालू यादव ने सरोज आंटी को राज्य सभा की सीट ऑफर की। वह बिहार कोटे से राज्य सभा पहुंच गईं। उन दिनों बिहार में लालू यादव का ऐसे सिक्का चलता था कि वह अपने सामने किसी को भी नहीं सेंटते थे। लालू ने सरोज आंटी को सांसद जरूर बना दिया था लेकिन सांसद निधि की पाई-पाई की चिठ्ठियां अपने पास रखवा ली थीं।
एक तो समाजसेवी महिला, ऊपर से लोकतंत्र के प्रति आस्थावान श्रीमती सरोज दुबे लालू यादव के इस व्यवहार से अंदर ही अंदर बहुत दुखी थीं क्योंकि सांसद के नाते वह उस राशि से अपने हिसाब से किसी मदद ही नहीं कर पातीं थीं। उन्होंने यह बात खुद मुझसे शेयर की थी लेकिन बड़ी सोच की थीं इसलिए पार्टी और उसके नेता की मर्यादा पर आघात नहीं करना चाहती थीं। राजनीतिक व्यक्ति के लिए यह बड़ा दुखद होता है, जब उसकी संप्रभुता पर कोई आघात करे। फिर भी अपनी राजनीतिक हनक से वह लोगों की मदद करने में पीछे नहीं रहती थीं।
बाद में सरोज आंटी नोएडा में ही बस गईं। वजह कि उनके पति और पुत्र दोनों वहीं वकालत करने लगे थे लेकिन इलाहाबाद से नाता नहीं छोड़ा। वह दो बार सांसद रहीं लेकिन एक टिपिकल गृहणी का उनका स्वभाव बना ही रहा। राज्यसभा सांसद के नाते दिल्ली के स्वर्ण जयंती सदन में उन्हें दूसरी या तीसरी मंजिल पर फ्लैट मिला था। उनका आमंत्रण रहता ही था कि मैं उनसे मिलूं। एक बार दिल्ली गया तो उन्होंने अपने घर बुलाया। सांसद थीं, नौकर चाकर भी थे लेकिन मेरे प्रति आत्मीयता ऐसी कि गोभी के पराठे खुद सेंककर खिलाये। यह उनका मातृवत प्रेम था। वैसे तो इलाहाबाद उनसे सन 1997 के आसपास ही छूट गया था पर मन में हमेशा बसा रहा।
वह पटना रहीं, दिल्ली रहीं और फिर नोएडा लेकिन ऐसा एक भी दिन नहीं गुजरा होगा जब उन्होंने इलाहाबाद के किसी न किसी व्यक्ति को फोन करके यहां का हालचाल नहीं लिया है। 27-28 सालों से मुझसे निरंतर संपर्क में रहीं। मेरे लखनऊ आ जाने पर भी हर दस पंद्रह दिन में वह खुद फोन करती थीं। इलाहाबाद के नेताओं, डाक्टरों, पत्रकारों के बारे में ऐसे तफसील से पूछतीं, मानो वह इलाहाबाद में ही हों और जैसे उन्हें चुनाव लड़ना हो।
अपने समय की महिला नेता श्रीमती संतोष सक्सेना, नीता साहू, कुसुमलता गुप्ता, इलाहाबाद के वरिष्ठ नेता रेवती रमण सिंह, बाबू भोला सिंह, हृदय नारायण शुक्ल, अनुग्रह नारायण सिंह, इंद्र बहादुर सिंह, अभिनव दुबे आदि के बारे में उनकी जिज्ञासा होती थी तो वरिष्ठ पत्रकार और ज्योतिषाचार्य डॉ. रामनरेश त्रिपाठी की चर्चा जरूर करतीं। शायद कम ही लोगों को मालुम हो कि सरोज आंटी साहित्यिक अभिरुचि की रही हैं। सन् 1998 के आसपास मैं एक पुस्तक संपादित कर रहा था ” नारी, समय और समाज”। सरोज आंटी ने अपने संपर्क के नाते दिल्ली के अनेक लेखकों से कहकर उनके लेख मेरी किताब के लिए भेजवाए थे।

इधर दो तीन साल से वह अपनी अस्वस्थता की बात भी करतीं लेकिन आवाज उनकी वैसी ही बुलंद रही, जैसे पहले थी। पिछले करीब छह महीनों में उनसे एकाध बार ही बातचीत हो पाई थी। अचानक कल उनके निधन की सूचना फेसबुक पर देखी तो मन को बहुत पीड़ा पहुंची। ईश्वर सरोज आंटी को अपने निकट स्थान दे। एक संवेदनशील और निरंतर वात्सल्य भाव रखने वाली नारी, लोकतंत्र के प्रति आस्थावान राजनेता और समाज के प्रति आजीवन समर्पित श्रीमती सरोज दुबे जी को मैं विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
trbhan@gmail.com
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