
#शरद जोशी के नाटक “अन्धों का हाथी” का मुंबई में हुआ मंचन
मुंबई।
समय कितना भी भयावह क्यों न हो, पर कुछ लोग उम्मीदों की डोर थामे पूरी शिद्दत और संवेदना के साथ सुनहरे भविष्य का निकष सजाते ही रहते हैं। 17 फ़रवरी, शुक्रवार शाम को नंदादीप विद्यालय, गोरेगांव के साइन्स लैब में प्रख्यात व्यंग्यकार श्री शरद जोशी की नाट्यरचना ‘अन्धों का हाथी’ के मंचन में भी कुछ ऐसी ही उम्मीद का जज्बा देखने को मिला।
अस्सी के दशक में लिखा गया यह नाटक जनमानस में बसी हुई एक प्रचलित लोककथा के माध्यम से तत्कालीन भारत की राजकीय और राजनीतिक व्यवस्था पर गहरा कटाक्ष करता है। महत्वपूर्ण यह है कि आज भी नाटक में दर्शायी गई स्थिति उतनी ही सटीक और प्रसांगिक प्रतीत होती है ।
कलाकारों ने अपने अभिनय से तथाकथित राजनीतिक आदर्शों, सिद्धांतों व विचारधारा से लिपटे राजनेताओं व नौकरशाहों के बीच जनता की स्थिति को बताया है। कलाकारों ने अपने अभिनय के माघ्यम से एक ओर आम जन तो दूसरी ओर जन-विशेष की स्थिति का मंच पर सजीव चित्रण किया।
नाटक में दिखाया गया कि कैसे सामान्य लोगों को मूर्ख बनाए रखने तथा उसे इस्तेमाल करते रहने के लिए राजनीति का दुष्चक्र हमेशा चलता रहता है।

नाटक में राजनीत के तहत सतत रूप से घटित हो रही इस मूल्य हीन त्रासदी की गहरी पकड़ समाहित थी। नाटक का कथानक व्यंग्यात्मक तथ्यों पर आधारित था। जिसे कलाकारों ने अपने अभिनय से जीवंत करने का प्रयास किया।
पांच अंधे और एक सूत्रधार के माध्यम से व्रेख्त शैली में मन्चित यह नाटक हँसते-हँसाते, गुदगुदाते हुए दर्शकों को समाज के उस अन्धेरे पक्ष से रूबरू करवा देता है जिसमें सत्य आभासी है और समस्या हाथी जैसी विशाल। बावजूद इसके हमारा प्रसाशन तंत्र उसे सम्पूर्णता में ना देखना चाहता है ना दिखाना चाहता है। समाज को आईना दिखाता यह नाटक पुरअसर अंदाज में समय की भयावहता का वह रेखा चित्र भी खींचता है जिसमें व्यवस्था की सडांध इतने खतरनाक स्तर पर जा चुकी है कि वह अपने खिलाफ या फिर कहें की सत्य के पक्ष में आवाज उठाने वाले की हत्या भी कर सकता है।

निर्देशन प्रज्ञा गान्ला ने किया था। अपनी क्रान्तिधर्मी और जनपक्षधरता के तहत वह नाटक के कथ्य पर शिल्प को हाबी नहीँ देती बल्कि वह यर्थाथ और गल्प के मिश्रण से कथ्य संप्रेषण का एक नया भाव-बोध रचती हैं। बिनोद यादव (अन्धा 4), देव कांगणे (सूत्रधार), ऋग्वेद सी (अन्धा 2), रोचना विद्या (अन्धी), सुनिल मनोहर (अन्धा 3) और साईदीप (अन्धा 1) इन सभी अभिनेताओं ने अपनी भूमिकाएं बख़ूबी निभाईं ।
मन्चित नाटक में गीत और संगीत को और प्रभावी बनाने की गुंजाइश दिखती है। पर जो रंगकर्मी मंच पर आभासी हाथी ला सकते हैं निसन्देह उनसे हम उनके आगामी मंचनों में और ज्यादा रचनात्मक उँचाई की अपेक्षा तो कर ही सकते हैं।
मंचन के अवसर पर शिक्षा, कला और सिनेमा से जुड़े हुये दर्शक बड़ी मात्रा में उपस्थित रहे और और मंचन को तात्कालिक समय का जरूरी हस्तक्षेप बताया।
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