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विस्थापित जिन्दगी का दर्द और प्रेम की मध्यम सी रोशनी है “शिकारा”


कुमार विजय

फिल्म – शिकारा
पात्र – आदिल खान, सादिया खान
निर्देशक – विधू विनोद चोपड़ा
रेटिंग – ***

सिनेमा कई बार इतिहास के पन्नों पर दर्ज कहानियों को अपनी सोच के अनुरूप प्रदर्शित करता है ׀ अक्सर ऎसी कहानियों में समय और परिस्थितियों की झलक तो होती है पर सिनेमा को इतिहास की सच्चाई के तौर पर देखना मुनासिब नहीं होता है . शिकारा भी कश्मीरी परिस्थितियों के किस्सों पर बुनी गई फिल्म है ׀ इसे फिल्म के तौर पर देखना अच्छा लगता है पर इसमें इतिहास तलाशना निराश करता है ׀ फिल्म के निर्देशक विधू विनोद चोपड़ा समर्थ और संवेदनशील फिल्मकार हैं, वह कश्मीर को बेहतर तौर पर समझते हैं और फिल्म को राजनैतिक मुद्दे से बचाते हुए प्रेम के सौन्दर्य और कश्मीरी खूबसूरती को एकाकार करके लोगों को यह बताना चाहते हैं कि देश या समाज सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं होता है बल्कि वह वहां के लोगों का हिस्सा होता है ׀
फिल्म की कहानी उस कश्मीर में शुरू होती है जिसमें सिर्फ खूबसूरती है, मुहब्बत है और सब कुछ सपनों की तरह हसीन है ׀ इसी माहौल में प्रोफेशर शिव धर के मन में शान्ति के प्रति प्रेम पनपता है एक मित्र की मदद से दोनों का प्यार शादी में बदलता है ׀ यह समय 1980 के आस पास का है ׀ एक तरफ कश्मीर में दो कश्मीरी पंडित अपनी रूमानियत का किस्सा लिख रहे होते है और दूसरी तरफ कुछ लोग इस हसीं कायनात में सामप्रदायिकता और घृणा की खेती में लगे होते हैं जो हर संभव तरीके से हिन्दू मुस्लिम के बीच नफ़रत की बाड़ खड़ी करने की कोशिश में लगे होते हैं ׀ नफ़रत की अनचाही आग पूरे कश्मीर को धीरे – धीरे अपनी चपेट में ले लेती है और शिकारा भी इससे नहीं बच पाता ׀ शिकारा के शिव और शांति भी इस आग की चपेट में आते हैं उन्हें भी पलायन करना पड़ता है …. अपना सब कुछ छोड़कर वह एक ऐसे ठिकाने की तलाश में निकल पड़ते हैं जहां माहौल ठीक होने तक जिंदगी गुजारी जा सके ׀ पलायन की इस जिंदगी में सब कुछ खो जाता है सिर्फ एक रिफ्यूजी कैम्प नई जिन्दगी का हिस्सा बनता है ׀ नफरतों के स्याह अंधियारे में विधु विनोद चोपड़ा रूमानियत की हल्की सी रोशनी को खूबसूरती से सामने लाते हैं जो उम्मीद बंधाती है कि बहुत बुरे समय में भी कुछ अच्छा हो सकने की गुंजाइश हमेशा होती है ׀

फिल्म का बैक ग्राउंड संगीत और सिन्मेटोग्राफी अच्छी लगती है ׀ आदिल खान और सादिया खान सिनेमा के नए चहरे हैं पर अपनी भूमिकाओं में वह अच्छे लगते हैं ׀ यह फिल्म इतिहास की पृष्ठभूमि पर आधारित है यह मानकर देखना अच्छा लगता है ׀ खासतौर पर आज के समय में इस फिल्म की प्रासंगिकता इसलिए और भी बढ़ जाती है क्योंकि एक बार फिर कश्मीर डरा, सहमा और उदास है एक बार फिर उस पर नफरती निगेहबानी की बाड़ लगी हुई ׀

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