
कुमार विजय
कुछ रातें कयामत की होती हैं जिनमें सन्नाटे ख्वाबों का कत्ल कर देते हैं । बीती हुई रात भी कुछ इसी तरह की थी। शिवसेना के लिए यह रात उम्मीद की मंजिल लेकर आने वाली थी। जगह जगह पर तोरण सजने लगे थे, ढोल मजीरा बजने के लिये तैयार थे, पूरी फिजा तरह-तरह के पकवानों के इन्तजार में डूबी हुई थी। सुबह की नई रोशनी के साथ मुनादी होनी थी की नया राजा, राजा बनने आ रहा है पर कम्बखत कुछ ख्वाब कभी नही पूरे होते हैं वह आंखो तक आते हैं और भोर की रौशनी पूरी क्रूरता से उनका कत्ल कर देती है।
शिवसेना के ख्वाब का कत्ल भी 23 नवम्बर की रौशनी ने कुछ इस तरह से कर दिया। वह कहते रहे कि रुक जा रात ठहर जा रे चन्दा पर रात नहीं रुकी सुबह हुई और दक्षिण पंथी भाजपा बामपंथी नारे के साथ यानी इंकलाब जिंदाबाद करते हुई उठी और शिवसेना के ख्वाबों की जीस्त सजाती आंखों को ही लूट लिया। जब आंखे ही लुट गई तो ख्वाब कहां बचता, उसका भी कत्ल हो गया। राजा का सेहरा राज्यपाल ने दूसरे राजा को पहना दिया।
ढोल मजीरे की जगह नगाड़े बजने लगे। मिडिया जो नई सुबह के साथ नये राग बजाने के लिये रात भर मेहनत कर रहा था वह फिर से पुरानी एम पी 3 लगाकर राग दरबारी बजाने लगा ।
किसी ने चुपके से बस इतना ही कहा की मुम्बई समुद्र का शहर है यहां ज्वार भाटा आता रहता है और कभी-कभी हाईटाइड भी। बीती रात भी हाईटाइड वाली कयामत की रात थी।
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