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श्री दुर्गा सप्तशती कथा तत्व (3): “भक्ति व मोक्ष की प्रदायक हैं भगवती”

परम पूज्य संत आचार्य श्री अमिताभ जी महाराज

श्री दुर्गा सप्तशती कथा तत्व (3)

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दुर्गा सप्तशती एक अद्भुत तंत्र ग्रंथ है जो भगवती की उपासना हेतु संकेंद्रित है l इसके सुचिंतित पाठ से आत्म चैतन्य की शक्ति प्राप्ति होने के साथ लौकिक हितों की पूर्ति भी होती है l

 किसी ग्रंथ की आंतरिक ऊर्जा तथा रहस्यात्मकता को समझने के पूर्व उसकी विषय वस्तु का ज्ञान होना अत्यंत अनिवार्य है l

सप्तशती व्यक्ति की ऊर्जा को गति प्रदान करते हुए निराशा से आशा की दिशा में गति का संकेत भी प्रदान करती है l

इसी उद्देश्य से उसके मूल संदर्भों का इस निरंतरता के साथ तृतीय अंक में दिग्दर्शन करने का प्रयास करूंगा l

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परम पूज्य संत आचार्य श्री अमिताभ जी महाराज

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भक्ति व मोक्ष की प्रदायक हैं भगवती 

श्री दुर्गा सप्तशती

सप्तम अध्याय

सप्तम अध्याय स्तुति:

स्तुतिः में भगवती मातंगी का ध्यान करता हूँ। श्यामवर्ण की भगवती रत्नमय सिहासन पर बैठकर पढ़ते हुए तोते का मधुर शब्द सुनती हैं। वीणावादन करती भगवती मस्तक पर अर्द्धचन्द्र से युक्त तथा अपना एक पैर कमल पर रखे हुए हैं। रक्तवर्ण की साड़ी पहने मधुमद से युक्त भगवती के ललाट में बेदी शोभायमान है।

आचार्य अमिताभ जी महाराज इलाहाबाद

मेघा ऋषि कहते हैं ‘ शुंभ की आज्ञा से चण्ड-मुण्ड आदि दैत्यों ने ससैन्य गिरिराज हिमालय के सुवर्णमय शिखर पर पहुँचकर सिंह पर बैठी देवी को देखा। भगवती अंबिका ने उन शत्रुओं के प्रति क्रोध किया, जिससे उनका मुख काला पड़ गया। चीते चर्म की साड़ी पहने हुए नर मुण्डों की माला से विभूषित थीं। रक्तवर्ण नेत्रों से युक्त भगवती अपनी भयंकर गर्जना से सम्पूर्ण दिशाओं को कंपित करती हुई दैत्यों पर टूट पड़ीं और उनका भक्षण करने लगीं। असुर सेना के इस नाश को देखकर चण्ड ने भगवती पर सहस्त्रों बार चलाए गए चक्रों से आक्रमण किया। देवी ने बहुत बड़ी तलवार हाथ में लेकर ‘हं’ का उच्चारण करके चण्ड के केश पकड़कर उसी तलवार से उसका मस्तक काट डाला। चण्ड को मरा देखकर मुण्ड ने भी आक्रमण किया। उसकी भी यही गति से हुई। तब चण्ड और मुण्ड का मस्तक दो हाथ में लेकर काली ने चण्डिका के पास जाकर अट्टहास करते हुए कहा ‘देवी मैने चण्ड-मुण्ड नाम के दो महा पशुओं को तुम्हें भेंट किया है। अब युद्ध यज्ञ में तुम शुंभ और निशुंभ का स्वयं वध करना।’

ऋषि कहते हैं भगवती चण्डी ने काली से मधुरवाणी में कहा ‘देवी चण्ड-मुण्ड को मेरे पास लाने के कारण संसार में चामुण्डा के नाम से तुम्हारी ख्याति होगी।’

अष्टम अध्याय स्तुतिः

मैं अणिमा आदि सिद्धीमय किरणों से आवृत्त भवानी का ध्यान करता हूँ। उनके शरीर का लाल रंग है। नेत्रों में करुणा लहरा रही है तथा हाथों में पाश, अंकुश, बाण और धनुष शोभा पाते हैं।

मेधा ऋषि कहते हैं ‘इस पराभव से क्रोधित होकर शुंभ ने दैत्यों की सम्पूर्ण सेना को युद्ध में जाने की आज्ञा दी। उनकी सेना को देखकर चण्डिका ने अपनी धनुष की टंकार से पृथ्वी और आकाश के मध्य का भाग गूंजा दिया। देवी का सिंह भी गर्जना करने लगा। जिसे अंबिका के घण्टे की गर्जना ने और बढ़ा दिया। दैत्य सेना ने चारों ओर में भगवती चण्डिका, सिंह और काली को घेर लिया। इसी बीच असुर विनाश हेतु समस्त देवताओं की शक्तियाँ ब्रह्माणी, शिवा, नारसिंघी, वारही, ऐन्द्री प्रकट हुई।

भगवान महादेव ने चण्डीका से कहा ‘मेरी प्रसन्नता के लिए असुर संहार करो।’ तब देवी के शरीर से उग्र चण्डिका शक्ति प्रकट हुईं। जिसने महादेव को दूत बनाकर दैत्यों के पास भेजा l इस कारण उन्हें शिवदूती कहा गया l समस्त शक्तियों के सहयोग से भीषण युद्ध में असुरों का पराभव होने लगा। तब उनकी रक्षा के लिए महाअसुर रक्तबीज युद्ध के लिए आया। जिसके शरीर से रक्त गिरने पर उसी के समान पराक्रमी असुर उत्पन्न होने लगे। तब चण्डिका से निर्दृष्ट होकर काली ने रक्तबीज के रक्त का पान आरम्भ किया तथा अन्य दैत्यों का वध संपन्न किया। इसके बाद देवी ने रक्तबीज को ‘वज्रवाण खड़ग आदि से मार डाला। देवता प्रसन्न हुए तथा मात्रगण का नृत्य प्रारम्भ ‘हुआ।’

नवम अध्याय स्तुति:

मैं अर्द्धनारीश्वर के श्री विग्रह की निरंतर शरण लेता हूँ । उनका वर्ण बंधूक पुष्प तथा सुवर्ण के समान रक्तपीत मिश्रित है। वह अपनी भुजाओं में सुंदर अक्ष माला, पाश, अंकुश और वरद मुद्रा धारण करती हैं। अर्द्धचंद्र उनका आभूषण है और वह त्रिनेत्र से युक्त हैं।

सुरथ राजा के द्वारा शुंभ और निशुंभ की प्रतिक्रिया के विषय में पूछे जाने पर मेधा ऋषि ने कहा ‘रक्तबीज व अन्य दैत्यों के नष्ट होने पर शुंभ और निशुंभ अपनी संपूर्ण शक्ति के साथ मातृगणों से युद्ध करके भगवती चंडिका को मारने आ पहुँचे। चण्डिका ने निशुंभ पर भीषण प्रहार करते हुए तथा अपने वाहन सिंह को घायल करने के अपराध के लिए भी निशुंभ को बाण समूहों से घायल करके भूमि पर गिरा दिया।

निशुंभ की ऐसी स्थिति देखकर शुंभ ने अंबिका का वध करने का दुष्प्रयास किया। उसको देखकर भगवती के शंख, धनुष की डोर तथा उनके घण्टे से भीषण नाद उत्पन्न हुआ। उनके सिंह ने भी भयंकर गर्जना की। तदुपरांत दोनों का प्रत्यक्ष युद्ध हुआ और शुंभ मूर्छित होकर गिर पड़ा। इसी काल में निशुंभ ने पुनः चैतन्य होकर भगवती पर चक्रों का प्रहार किया। किंतु वह प्रहार सहज ही निष्फल हो गए। इसके बाद निशुंभ हाथ में शूल लेकर भगवती की दिशा में दौड़ा, तब भगवती चण्डिका ने वेग से चलाए अपने शूल से उसकी छाती छेद डाली। इतना होने पर भी निशुंभ के वक्ष से एक दूसरा महाबलि-महापराक्रमी पुरुष भगवती को ललकारता हुआ बाहर निकला। किन्तु भगवती ने सहज ही मुस्कुराते हुए उसका मस्तक काट दिया। भगवती के केशों से प्रकट हुई काली, शिवदूती, कौमारी, माहेश्वरी, वाराही, वैष्णवी तथा ऐन्द्री के महापराक्रम से राक्षस सैन्य नष्ट-भष्ट हो गया।’

दशम अध्याय स्तुतिः

मैं मस्तक पर अर्द्धचन्द्र धारण करने वाली शिवशक्ति स्वरूपा भगवती कामेश्वरी का हृदय से चिंतन करता हूँ। वे तपाए हुए सुवर्ण के समान सुंदर हैं। सूर्य, चन्द्र और अग्नि यही तीन उनके नेत्र हैं। वे अपने हाथों में धनुष-बाण, अंकुश, पाश और शूल धारण किए हैं।

मेधा ऋषि कहते हैं ‘अपने प्राणप्रिय भ्राता निशुंभ का वध तथा सेना को नष्ट होते देखकर शुंभ ने भगवती से कहा अन्यान्य स्त्रियों के आश्रय से युद्ध न करके मुझसे अकेले ही युद्ध करो।’ भगवती ने कहा ‘दुष्ट ये मेरी ही विभूतियाँ हैं जिसे मैं अपने भीतर ही समाविष्ट कर रही हूँ।’ अब मात्र पुनः भगवती अंबिका रह गई हैं। दोनों के मध्य न भूतो न भविष्यति की संकल्पना को साकार करने वाला भीषण युद्ध प्रारम्भ हुआ। परिणामतः भगवती अंबिका ने अपने त्रिशूल से शुंभ का वक्ष विदीर्ण कर दिया, जिससे उसकी मृत्यु हो गई।

 समस्त अपशकुन समाप्त हो गए। वातावरण शुद्ध हो गया। सूर्य की प्रभा उत्तम होने के साथ-साथ अग्निशाला की बुझी हुई अग्नि स्वयं प्रज्जवलित हो उठी।’ 

शेष आगामी अंक में l

ll शुभम भवतु कल्याणम ll  

    ll सर्वे भवंतु सुखिनः ll

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