
श्री नव योगेश्वर संवाद षष्ठ पुष्प!!

आचार्य श्री अमिताभ जी महाराज
श्रीमद् भागवत कथा- षष्ठ पुष्प
हम योगेश्वर हरि के द्वारा प्रदान किए गए भक्तों के विभिन्न वर्गीकरण की चर्चा कर रहे थे। स्पष्ट है कि समस्त शास्त्र- समस्त वांग्मय मात्र इस बात का संकेत करते हैं कि यदि हमारे द्वारा किए जाने वाले क्रियाकलापों का सूत्र बंधन मानव एवं मानवता के साथ नहीं होता तब उसका कोई औचित्य शेष नहीं रहता l वह श्मशान चंपा के पुष्प के समान ही होता है जो देखने में बहुत सुंदर होता है किंतु वास्तव में सुगंध से रहित होता है l हमारे समस्त आध्यात्मिक – धार्मिक कार्य यदि हमारे जीवन में हमारे हृदय को सरस नहीं बना पाए तब वह सब किया गया कार्य ऊसर में पड़े हुए बीज के समान ही निष्फल होता है l
अतः अपनी भक्ति के- अपने प्रेम के बंधन में ईश्वर को बांधने का प्रयास ही जीवन को चरितार्थ एवं फलित कर सकता है l यद्यपि उस स्थिति में भी निर्णय ठाकुर जी को ही करना है किंतु अपने भाव में उनको अपने साथ बंधा हुआ पाकर के भक्तगण अत्यंत प्रसन्न हो जाते है l
महाराज निमिने इस संवाद के तृतीय चरण में विनम्रता पूर्वक यह पूछा है कि महाराज आप ने यह कहा कि भक्त इस संपूर्ण सृष्टि को विष्णु माया के रूप में देख कर के उसके प्रति मोह से आसक्त नहीं होता है अतः कृपा पूर्वक यह बताइए कि यह माया क्या है ?
यह जो माया का संदर्भ है यह भी अत्यंत अद्भुत है l वस्तुतः माया को जादू के साथ समेकित नहीं कर सकते l जादू तो आंख का धोखा होता है l माया तो यह स्पष्ट करती है कि जो वास्तव में है वह प्रतीत ना हो और जो नहीं है उसकी ही प्रतीति हो l वैष्णव आचार्य कहते हैं माया को मारो, माया को मारो l किंतु यह बात बहुत दमदार प्रतीत नहीं होती क्योंकि माया तो
ईश्वर की सृष्टि को कष्ट देती है प्रताड़ित करती है इस उद्देश्य से कि जिस ईश्वर के कारण यह सृष्टि है , यह प्राणी है l यह उसको ही भूल कर के दुनिया भर के चक्रों में फंसे हुए हैंं। इनको इस प्रकार से निर्देशित करना चाहती हूं कि यह पुनः उसी ईश्वर की शरण को प्राप्त करें l बाकी माया को बहुत लज्जा आती है l वह ईश्वर के समक्ष नहीं आती लेकिन इसकी लोग प्रकार से व्याख्या करते हैं और वैसे गीता में तो भगवान ने कह दिया है कि जो मुझ मायापति को भजता है वह मेरी माया से, माया के समुद्र से सहज ही संतरण कर के पार उतर जाता हैै।
अतः तृतीय योगेश्वर अंतरिक्ष माया के स्वरूप का वर्णन करते हैं l वस्तुतः माया वही है जिसका निरूपण सांसारिक नियमों के अनुसार न किया जा सके l नारद जी चाहते हैं कि वसुदेव जी को वह ज्ञान प्राप्त हो जाए जो साक्षात वासुदेव कृष्ण ने उनको प्रदान करने के लिए दायित्व मुझे सौंपा है।
वास्तव में उपनिषदों का कहना है कि भगवान में प्राण, मन और माया नहीं होते l शुभ्र पद का तात्पर्य होता है माया रहित, अप्राण का अर्थ है क्रिया शक्ति नहीं और अमना का अर्थ है ज्ञान शक्ति नहीं l तो ऐसी स्थिति में सृष्टि कर्म कैसे संपादित होगा? तो भगवान ने लीला के उद्देश्य से मन का निर्माण किया क्योंकि बिना मन के लीला संभव नहीं है और वह अमना से समना हो गए और अगर यदि संदर्भ को रास से जोड़ा जाए तो मन में ही पाप और पुण्य का स्पर्श होता है अतः गोपियों के मन का कर्षण करके उन्होंने उनको अमना कर दिया l यही योग माया ही भगवान की माया है जो अचिंत्य रूपों का प्रकाश प्रस्फुटित करती हैं l
वस्तुतः माया के प्रभाव स्वरूप हम जिस प्रकार के दुरवृत्ति से युक्त आचरण से ग्रस्त रहते हैं वह हमें बुरे लगते ही नहीं है l यह उसी प्रकार से है जैसे कि किसी के वस्त्र बहुत श्वेत हो और उस पर थोड़ी सी गंदगी लग जाए तो वह सतर्क हो जाता है। जैसे कि किसी के वस्त्र बहुत श्वेत हो और उस पर थोड़ी सी गंदगी लग जाए तो वह सतर्क हो जाता है उस गंदगी को दूर करने के लिए और यह प्रयास करने के लिए कि उस पर और अधिक गंदगी न लगने पाए l

किंतु जिसके वस्त्र मैले हो चुके होते हैं, वह उस गंदे का अभ्यस्त हो जाता है तथा उसको पता ही नहीं लगता कि गंदगी कितनी बढ़ती जा रही है l उसी प्रकार से मनुष्य जब अपने अंतःकरण को अपने अभ्यास से प्रदूषित कर लेता है तब उसके ऊपर बुरे कर्मों का प्रभाव उतना नहीं पड़ता जितना कि और पड़ सकता है l लेकिन यह मतलब नहीं हुआ कि प्रभाव नहीं पड़ता तो उसका फल नहीं भोगना पड़ेगा l एक समय ऐसा आता है जब उसको उसका फल भोगना ही पड़ता है l यही ईश्वर की माया है l
पंचमहाभूत के प्रलय का जब काल आता है, तब जो कार्य है वह कारण की ओर आकृष्ट होने लगता है l यहीं भगवद माया है l वर्तमान युग में हम जिस प्रलय की चर्चा करते हैं या जिस उद्विकास के सिद्धांत की चर्चा करते हैं और यह कहते हैं कि कभी बड़ी भारी बाढ़ आई होगी, कभी सूर्य के प्रकाश में बहुत तीव्रता रही होगी तो वही श्रीमद्भागवत भी कहती है कि 100 वर्ष तक अनावृष्टि का वर्णन है। मतलब वर्षा नहीं होती l भीषण दुर्भिक्ष पड़ता है l सूर्य की किरणों की तीव्रता समस्त लोगों को, सभी प्राणियों को जलाने लगती है l यहीं भगवद माया है l इसके उपरांत समय परिवर्तित होता है, आकाश को आच्छादित किए हुए मेघ 100 वर्ष तक वृष्टि करते हैं वह भी हाथी की सूंड के समान मोटी धारा l तब यह विराट सृष्टि पानी में डूब जाती है। यही भगवान की माया है।

पृथ्वी का जल में, जल का तेज में, तेज का वायु में, वायु का आकाश में और आकाश का अंतरिक्ष में लय हो जाता है। जब ईश्वर आकाश से शब्द को खींच लेते हैं, तब वह अहंकार में लीन हो जाता है। तामस अहंकार में पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश लीन हो जाते हैं। हमारी समस्त इंद्रियां कर्मेंद्रियां एवं ज्ञानेंद्रियां,,श्रोत्र, त्वक, चक्षु, रसना, नासिका, वाक, पाणि, पाद पायु, उपस्थ राजस अहंकार में लय हो जाते हैं और मन सात्विक अहंकार में प्रविष्ट हो जाता है और फिर यह सभी महत् तत्व में लीन हो जाते हैं। यही है भगवद माया। इस माया से ही सृष्टि, स्थिति एवं प्रलय की निरंतरता बनी रहती है और यह सत्व रज और तम तीन गुणों के विस्तार के रूप में परिलक्षित होती है l
इतनी महत्वपूर्ण चर्चा जिसमें माया का ऐसा वर्णन किया गया हो तो कोई भी व्यक्ति हो जो श्रवण कर रहा हो धार्मिक और आध्यात्मिक बुद्धि से युक्त हो उसके अंदर भी यह सारे जिज्ञासा उत्पन्न होगी और निमी तो राजर्षि हैं विदेह हैं l उनके मन में भी यह जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि जिस माया के चक्कर में संपूर्ण ब्रह्मांड फंसा हुआ है उस माया से मुक्ति का भी तो कोई ना कोई उपाय अवश्य होगा। मुक्ति के उपाय की चर्चा आगे करेंगे चतुर्थ योगेश्वर प्रबुद्ध के द्वारा प्रवचन दिए जाने पर।
इस अंश में मात्र इतना ही शेष संवाद विस्तार आगामी अंक में।
ll शुभम भवतु कल्याणम ll

एक परिचय
परम पूज्य संत आचार्य श्री अमिताभ जी महाराज राधा कृष्ण भक्ति धारा परंपरा के एक प्रतिष्ठित हस्ताक्षर हैं।
श्रीमद्भागवत के सुप्रतिष्ठ वक्ता होने के नाते उन्होंने श्रीमद्भागवत के सूत्रों के सहज समसामयिक और व्यवहारिक व्याख्यान के माध्यम से भारत वर्ष के विभिन्न भागों में बहुसंख्यक लोगों की अनेकानेक समस्याओं का सहज ही समाधान करते हुए उनको मानसिक शांति एवं ईश्वरीय चेतना की अनुभूति करने का अवसर प्रदान किया है।
आध्यात्मिक चिंतक एवं विचारक होने के साथ-साथ प्राच्य ज्योतिर्विद्या के अनुसंधान परक एवं अन्वेषणत्मक संदर्भ में आपकी विशेष गति है।
पूर्व कालखंड में महाराजश्री द्वारा समसामयिक राजनीतिक संदर्भों पर की गई सटीक भविष्यवाणियों ने ज्योतिर्विद्या के क्षेत्र में नवीन मानक स्थापित किए हैं। किंतु कालांतर में अपने धार्मिक परिवेश का सम्मान करते हुए तथा सर्व मानव समभाव की भावना को स्वीकार करते हुए महाराजश्री ने सार्वजनिक रूप से इस प्रकार के निष्कर्षों को उद्घाटित करने से परहेज किया है।
सामाजिक सेवा कार्यों में भी आपकी दशकों से बहुत गति है गंगा क्षेत्र में लगाए जाने वाले आपके शिविरों में माह पर्यंत निशुल्क चिकित्सा, भोजन आदि की व्यवस्था की जाती रही है।
उस क्षेत्र विशेष में दवाई वाले बाबा के रूप में भी आप प्रतिष्ठ हैं ।
अपने पिता की स्मृति में स्थापित डॉक्टर देवी प्रसाद गौड़ प्राच्य विद्या अनुसंधान संस्थान तथा श्री कृष्ण मानव संचेतना सेवा फाउंडेशन ट्रस्ट के माध्यम से आप अनेकानेक प्रकल्पओं में संलग्न है
जन सुलभता के लिए आपके द्वारा एक पंचांग का भी प्रकाशन किया जाता है “वत्स तिथि एवं पर्व निर्णय पत्र” जिस का 23 वां संस्करण प्रकाशित होने की प्रक्रिया में है, यह निशुल्क वितरण में सब को प्रदान किया जाता है।
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