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भारत का अन्तरिक्ष कार्यक्रम: 1920 से 2019 तक की यात्रा

सफलता का मंत्र: किसी भी महान नेतृत्व का यही लक्षण होता है कि वह असफलता की ज़िम्मेदारी आगे बढ़कर अपने कन्धों पर ले लेता है और सफलता का श्रेय अपनी टीम को देता है ।

हरिकान्त त्रिपाठी

भारत में अन्तरिक्ष अनुसंधान की दिशा में काम तो 1920 में कोलकाता के वैज्ञानिक एस के मित्रा के द्वारा ही आरम्भ किया गया था और बाद में मेघनाद साहा और सर सी वी रमन ने भी इस पर काफ़ी शोध किया ।

1945 में डॉ. भाभा और विक्रम सारा भाई ने अन्तरिक्ष अनुसंधान की अवसंरचना बनाने का काम शुरू किया । इस हेतु असली संगठित प्रयास 1962 में तब हुआ जब पंडित नेहरू की प्रेरणा से भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान के जनक कहे जाने वाले विक्रम सारा भाई ने INCOSPAR इंडियन नेशनल कमिटी फ़ॉर स्पेस रिसर्च की स्थापना की । यही संस्था आगे चलकर 1969 में इसरो बना दी गई जो आज दुनिया में सबसे अधिक उपग्रहों की देखरेख करने वाली अन्तरिक्ष एजेंसी बन चुकी है ।

प्रो. सतीश धवन जब 1972 में इसरो के अध्यक्ष बने तो उन्होंने सैटेलाइट लांच वेहिकिल SLV से उपग्रह को अन्तरिक्ष की कक्षा मे स्थापित करने वाले प्रोजेक्ट का डाइरेक्टर बनाने के लिए ए पी जे अब्दुल कलाम नाम के युवा वैज्ञानिक को चुना ।

कलाम ने कहा कि यह बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है और मुझसे भी अनुभवी वैज्ञानिक इसरो में जब मौजूद हैं तो मुझे ही यह गुरुतम दायित्व क्यों दिया जा रहा है ? सतीश धवन ने कहा कि मुझे तुम्हारी आँखों की चमक देखकर लगता है कि इस अति महत्वाकांक्षी परियोजना को तुम्हीं पूरा कर सकते हो और इस तरह कलाम साहब के मिसाइल मैन बनने की नींव पड़ गई । कलाम एस एल वी परियोजना के प्रोजेक्ट डायरेक्टर बन गये ।

दस साल के अथक परिश्रम के बाद एस एल वी -3 पर एक सैटेलाइट अन्तरिक्ष में छोड़े जाने का कार्यक्रम बना ।1979 में जब एस एल वी लांच होने चला तो चन्द्रयान-2 के लांच की तरह ही सारी दुनिया की निगाहें भारत पर थीं । उलटी गिनती शुरू हुई तो थोड़ी देर में कम्प्यूटर बाबा ने एस एल वी के लांच को होल्ड पर डाल दिया , मतलब सलाह दी कि यान को लांच न किया जाये क्योंकि यान के ईंधन टैंक में मामूली लीकेज पाया जा रहा था । सभी वैज्ञानिक तनाव में आ गये । आपस में विचार विमर्श चलता रहा । वैज्ञानिकों की गणना के अनुसार यान में लीकेज के बावजूद पर्याप्त ईंधन मौजूद था और यान उपग्रह को अन्तरिक्ष के निर्धारित परिपथ में स्थापित करने के लिए पूर्ण सक्षम था । कम्प्यूटर बाबा की सलाह की उपेक्षा कर एस एल वी को लांच करने का निर्णय लिया गया । एस एल वी ने प्रथम चरण बड़ी सफलता से पूरा किया तो इसरो के वैज्ञानिकों में ख़ुशी की लहर दौड़ गई और तालियाँ बजने लगीं । दूसरे चरण में जब यान पागल जैसा स्पिन करने लगा तब वैज्ञानिकों के होश उसी तरह उड़ गये जैसे चन्द्रयान-2 के 8 सितम्बर 2019 की रात में 1:52 बजे ट्रैजेक्ट्री से विचलित होने पर उड़े थे । एस एल वी ने स्पिन करते हुए उपग्रह को अन्तरक्ष में निर्धारित परिपथ पर स्थापित करने के बजाय बंगाल की खाड़ी में उठा कर फेंक दिया ।

निर्णय की छोटी सी भूल से बहुत बड़ा अनर्थ हो चुका था । यह वह समय था जब भारत की ग़रीबी और ख़र्चीले स्पेस प्रोग्राम की सार्थकता को लेकर अक्सर सवाल खड़े किये जाते थे । कलाम निराशा में डूबे अछताते पछताते अपने अध्यक्ष प्रो. सतीश धवन के पास पहुँचे । दुखी मन से कलाम ने प्रो. धवन से कहा कि इस शर्मनाक असफलता के बाद अब वे पूरी दुनिया की मीडिया को क्या जवाब देंगे ? प्रो. सतीश धवन ने कहा कि तुम फ़िक्र न करो मैं मीडिया का सामना कर लूँगा । वे मीडिया के पास गये और कहा कि एस एल वी के लांच की असफलता की पूरी ज़िम्मेदारी वे खुद लेते हैं पर उनके पास उपलब्ध वैज्ञानिकों की टीम की योग्यता पर उनका पूरा विश्वास है और उन्हें शीघ्र ही अगले प्रयास में सफलता अवश्य मिलेगी ।

प्रो. सतीश धवन की उदारता से अभिभूत इसरो की टीम ने अपने प्रोजेक्ट डायरेक्टर कलाम के नेतृत्व में एक साल दिन रात अनथक परिश्रम किया और अन्तत: जुलाई 1980 में अगला मिशन पूरा कर दिया और एस एल वी -3 ने रोहिणी उपग्रह को अन्तरिक्ष में उसकी ऑर्बिट में स्थापित कर इतिहास रच दिया ।

दुनिया भर में भारत को अन्तरिक्ष क्लब की उभरती शक्ति के रूप में मान्यता मिल गयी । जब एस एल वी मिशन सफल हो गया तो ख़ुशी से आह्लादित कलाम भागते हुए प्रो. सतीश धवन के पास पहुँचे और बोले – सर हम सफल हो गये , आप चलिए और पूरी दुनिया की मीडिया को इसरो की सफलता की कहानी सुनाइये। मुस्कुराते हुए प्रो. धवन ने कहा कि आज की इस महान सफलता का श्रेय तुम्हें और तुम्हारी टीम के वैज्ञानिकों की योग्यता और अथक परिश्रम को ही जाता है , मीडिया को सम्बोधित करने का हक़ तुम्हारा ही है और मैं उस समय वहाँ उपस्थित भी न रहूँगा ।अपने नेतृत्व की इस उदार सोच पर कृतज्ञता से कलाम की आँखों में आँसूं आ गये ।

प्रो. सतीश धवन का महान नेतृत्व न मिलता तो न तो इसरो आज का इसरो बन पाता और न ही कलाम मिसाइल मैन बन पाते । इसरो आज दुनिया की सबसे बड़ी छह स्पेस एजेंसीज में से एक है और पद्म विभूषण प्रो. सतीश धवन के अधीनस्थ कलाम दुनिया के जाने माने स्पेस साइंटिस्ट के साथ भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय राष्ट्रपति बने और भारत रत्न से सम्मानित हुए।

किसी भी महान नेतृत्व का यही लक्षण होता है कि वह असफलता की ज़िम्मेदारी आगे बढ़कर अपने कन्धों पर ले लेता है और सफलता का श्रेय अपनी टीम को देता है ।

             ::लेखक::: हरिकान्त त्रिपाठी, सेवा निवृत्त आईएएस 

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