
“सृजनात्मकता का स्थान नहीं ले सकती कृत्रिम बुद्धिमत्ता” : श्री गजेन्द्र सिंह शेखावत, संस्कृति व पर्यटन मंत्री
नई दिल्ली 3 जून 2026.
साहित्य अकादेमी ने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के सहयोग से “लेखकविहीन क्षितिज : एआई, सृजनशीलता और उभरता रचनात्मक वातावरण” विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया, जिसमें साहित्यकारों, विद्वानों, तकनीकियों और सांस्कृतिक नेतृत्व के गणमान्य प्रतिनिधियों ने शामिल होकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मानवीय सृजनशीलता के बदलते संबंधों पर गहन विचार-विमर्श किया। संगोष्ठी का प्रारम्भ राष्ट्रगान के गायन से हुआ।

2 जून को उद्घाटन संबोधन में श्री गजेन्द्र सिंह शेखावत, माननीय संस्कृति मंत्री, ने साहित्यिक क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की परिवर्तनकारी संभावनाओं पर अपना विचार व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि डिजिटलीकरण, अनुवाद और प्रसार के माध्यम से एआई साहित्य की पहुँच बढ़ा सकती है, पर किसी भी तकनीक से मानवीय सृजनशीलता में निहित मौलिकता, कल्पना और भावनात्मक गहराई की नकल संभव नहीं है। उन्होंने उल्लेख किया कि डिजिटलीकरण और उभरती हुई तकनीकें साहित्य की पहुँच बढ़ाने, पुस्तकालयों को सशक्त करने और युवा पीढ़ी को साहित्य से जोड़ने के महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती हैं।
प्रारम्भ में डॉ. वरुण गुलाटी, सचिव, साहित्य अकादेमी ने विशिष्ट अतिथियों का अंगवस्त्रम, पुस्तकों का सेट और फल- टोकरी भेंट कर स्वागत किया तथा संगोष्ठी के केंद्रीय विषयों का संक्षेप में परिचय दिया। उन्होंने कहा कि समकालीन तकनीकी प्रगति ने लेखकों और वक्ताओं की भूमिका तथा प्रयोज्यता के संबंध में बुनियादी प्रश्न उठाने शुरू कर दिए हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि तकनीक अब रोजमर्रा की जिंदगी का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है और ऐसे विकास साहित्य अकादेमी के दायित्व से प्रत्यक्ष संबंधित हैं, जिसने अपनी स्थापना से ही भारत की भाषाओं, साहित्यिक परंपराओं और विविध आवाज़ों के लिए एक जीवंत मंच का कार्य किया है।
आरंभिक वक्तव्य देते हुए श्री श्याम सरन, अध्यक्ष, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर ने भी कला-संवेदनशीलता के मामले में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सीमाओं पर विचार व्यक्त किए। उनका कहना था कि चाहे एआई कितना भी परिष्कृत क्यों न हो, वह मानवीय अस्तित्व की गहराइयों में समाना नहीं कर सकता और न ही वास्तविक संवेदना और सहानुभूति को पूरा समाहित कर सकता है।
साहित्य अकादेमी की अँग्रेजी परामर्श मंडल की संयोजक प्रो. मलाश्री लॉल ने अकादेमी की मान्यता प्राप्त और अमान्य भाषाओं दोनों को संरक्षित व पोषित करने की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में भी अकादेमी भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक स्मृति की महत्त्वपूर्ण सेवा जारी रखेगी।
तकनीकी आयाम जोड़ते हुए प्रो. गिरीश नाथ झा ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संचालन के तरीके समझाते हुए इसके समाज में उपलब्ध फायदों और सीमाओं का आलोचनात्मक विवेचन प्रस्तुत किया। उद्घाटन सत्र का समापन श्री के. एन. श्रीवास्तव, निदेशक, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के धन्यवाद उद्गारों के साथ हुआ। उद्घाटन सत्र का अंत राष्ट्रगान के बाद राष्ट्रगीत वन्दे मातरम् के प्रभावी गायन के साथ हुआ।
संगोष्ठी में आगे तीन बौद्धिक सत्र आयोजित किए गए जिनमें अशोक चक्रधर, रेखा सेठी, सुकृतापाल कुमार, मनोज कुमार पाण्डेय, उज्ज्वल जना, जगदीश अरोड़ा और एन. वी. सत्यनारायण जैसे विद्वान और साहित्यकारों ने अपने विचार साझा कर विचार-विमर्श को समृद्ध बनाया। इस प्रकार यह संगोष्ठी साहित्य, सृजनशीलता और मानवीय अभिव्यक्ति के भविष्य का एक महत्वपूर्ण अन्वेषण बनकर उभरी। आज
संगोष्ठी के अंतिम दिन अनेक विचारोत्तेजक विषयों पर चर्चा हुई, जिनका नेतृत्व भरत भूषण, रवि सिंह, सुतापा दत्ता, विवेक सचदेवा, रोहन पॉल, जय चीमा, निता वर्मा, बुद्धा चन्द्रशेखर और डी. पी. सिंह जैसे विशिष्ट विद्वानों व विशेषज्ञों ने किया और उन्होंने भाषा, साहित्य तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बदलते संबंधों पर महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत किए।
वीरेंद्र मिश्र: दिल्ली ब्यूरो
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