Home / Slider / कहानी “जय पराजय”: “मेरी मां मातोश्री श्रीमती सुदेवी गौड़”: आचार्य श्री अमिताभ जी महाराज 

कहानी “जय पराजय”: “मेरी मां मातोश्री श्रीमती सुदेवी गौड़”: आचार्य श्री अमिताभ जी महाराज 

श्रीमती सुदेवी गौड़ M.A., साहित्य रत्न, साहित्यालंकार

‘जय पराजय “

(यह कहानी 8 जुलाई 1957 को प्रकाशित हुई थी)

शहनाई बज रही है। मेहमानों का तांता लगा हुआ है। सेठ हरिकिशन अपने भारी-भरकम शरीर को लेकर तख्त पर बैठे हुए भी हुक्म देते जा रहे हैं। आज उनके इकलौते बेटे सतीश का टीका चढ़ेगा।

सतीश को उन्होंने एम . ए. एलएलबी कराया है। सुंदर स्वस्थ पढ़ा-लिखा लड़का। इसी समय तो मां-बाप को लड़कों की अच्छी कीमत मिलती है। फिर सेठ जी को ही प्रसन्नता क्यों ना होती! एक तो इकलौते बेटे की शादी दूसरे दहेज में एक लाख कैश व एक लाख का सामान मिल रहा था। वाह क्या अच्छा पासा पड़ा था। एक ही चाल में दो लाख का फायदा।

लड़की सेठ जी और सेठानी जी खुद ही जाकर देख आए थे। लड़की का नाम था इमरती। मोटी ताजी लंबी तगड़ी देह, गहरा सावला रंग, चपटी नाक, छोटी छोटी आंखें , मोटे मोटे होंठ तथा शिक्षा के नाम पर इमरती अपना नाम भी नहीं लिख सकती थी।

श्रीमती सुदेवी गौड़ M.A., साहित्य रत्न, साहित्यालंकार

सेठ रामदयाल कानपुर में कपड़े के बहुत बड़े व्यापारी थे। बेचारे लड़की के रूप से विवश थे। लड़की को देखकर कोई भी संबंध करने को तैयार न होता था। वह इमरती की शादी में एक लाख खर्च करने को तैयार थे। पर जब सेठ हरिकिशन और सेठानी जी को भी हाथ से निकलते देखा तो साहस करके एक लाख की गोटी और फेंकी और उसमें उन्हें पूर्ण सफलता मिली। सेठ हरिकिशन दो लाख का लोभ संवरण न कर सके। सेठानी को उन्होंने फुसलाकर राजी कर लिया।

इधर सेठ रामदयाल ने भी यह सोचकर संतोष किया कि दो लाख तो गए पर लड़की अमीर घर की इकलौती बहू बनकर जा रही है और दामाद भी चांद का टुकड़ा और पढ़ा लिखा है।

और सतीश उसकी ओर ध्यान देने का समय किसी को न था। सेठ जी ने सोचा लड़का आज्ञाकारी है, शादी ब्याह के मामले में लड़की लड़के की राय लेना वह बेकार समझते थे।

सतीश को सब पता चल चुका था चुपके चुपके माता-पिता की बात सुनकर। किंतु पर सब कुछ जान कर भी वह मौन ही रहा।

सतीश की क्लास फेलो इंदिरा गुप्ता ने सतीश के साथ ही एम. ए. किया था। वह सौम्य एवं सुंदर थी। सतीश और इंदिरा दोनों ही एक दूसरे की ओर आकर्षित थे। संयोग की बात है कि इंदिरा के पिता भी कानपुर में ही सर्विस करते थे ।

वह सेठ रामदयाल की तरह रईस तो न थे पर सतीश के सजातीय थे। इंदिरा ने आगरे में अपनी मौसी के यहां रहकर शिक्षा गृहण की थी।

सतीश जानता था कि कहने से पिताजी इतने साधारण घराने में संबंध करने को हरगिज तैयार ना होंगे। इधर वह इंदिरा से वचनबद्ध हो चुका था। इंदिरा के माता-पिता भी सब जानते थे। वह स्वयं सतीश से मिलकर बातचीत कर चुके थे। इसलिए प्रसन्न और निश्चिंत थे।

सतीश ने साहस करके माता के द्वारा इमरती वाले संबंध में अपनी असहमति प्रकट भी की। पर सेठ जी ने इस बात पर गौर करना तो दूर रहा, उल्टे सतीश को बुलाकर बुरी तरह डांटा फटकारा।

विवश होकर सतीश ने अपने कुछ मित्रों की राय से इंदिरा के पिता रामनाथ गुप्ता को लिख दिया कि फलां दिन बारात लेकर आ रहे हैं। आप टीका बगैरा भेजने का कष्ट ना करें। मुझे दहेज के रूप में कुछ नहीं लेना है। हां एक बात है, आप अपनी हैसियत के अनुसार अपने दरवाजे पर बारात की खातिरदारी कर सके तो करने की कृपा करें।

सेठ हरिकिशन उमंगों से भरे खूब धूमधाम से बारात लेकर कानपुर पहुंचे। सेठ रामदयाल के द्वारा बारातियों की शानदार खातिरदारी होने लगी।

बारात सेठ जी की इच्छा अनुसार ही निकली। यहां भी किस्मत ने सतीश का साथ दिया। सेठ रामदयाल के यहां बारात जाने के लिए रामनाथ गुप्ता के घर के आगे से ही रास्ता था। बारात क्रमशः बढ़ती गई।

रामनाथ गुप्ता का बिजली की जगमगाहट से चमकता हुआ दरवाजा दिखाई देने लगा। क्रमशः सतीश की सजी हुई कार गुप्ता जी के दरवाजे पर पहुंच गई। सतीश के मित्रों व गुप्ता जी के रिश्तेदारों की सहायता से बारात वही रोक ली गई।

पहले तो सेठ जी कुछ ना समझ सके। सेठ रामदयाल के आदमी भी जो बारात के साथ चल रहे थे अवाक खड़े थे। जब सेठ जी को वस्तुस्थिति का पता चला तो वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए।

कुछ क्षण पश्चात कन्या पक्ष वाले भी सचेत हुए। उन्होंने फौरन ही सेठ जी को एवं कानपुर के जिलाधीश को टेलीफोन किया। मिस्टर कक्कड़ और सेठ रामदयाल फौरन घटनास्थल पर पहुंचे।

इधर समय का लाभ उठाकर इंदिरा सतीश के गले में जयमाल डाल चुकी थी। सतीश विवाह की वेदी पर बैठ चुका था और पंडित वेद पाठ कर रहे थे।

जिलाधीश मिस्टर कक्कड़ सीधे विवाह मंडप में पहुंचे और सतीश एवं गुप्ता जी से बोले पहले अपना अपना बयान दीजिए बाद में विवाह होगा।

सतीश ने कहा मिस्टर कक्कड़ मेरी इच्छा पिताजी एवं सेठ रामदयाल का अपमान करने की न थी। मैंने इस विवाह को रोकने की पहले ही प्रार्थना की थी। पर मेरे पिताजी सेठ रामदयाल के द्वारा दिए जाने वाले दो लाख के लोभ में फंस चुके थे। इनकी लड़की अत्यंत कुरूप एवं अशिक्षित है। उसका संबंध कहीं तय ना होता था। इसलिए उन्होंने पिताजी को दो लाख का लोभ देकर यह संबंध तय करा लिया। मैं अपनी व उस लड़की की जिंदगी बर्बाद करने के लिए सेठ रामदयाल जी के यहां विवाह नहीं कर सकता और मिस्टर कक्कड़ कानून की दृष्टि से मैं और इंदिरा दोनों ही बालिग हैं। इसलिए इस विवाह को नहीं रोका जा सकता।

जिलाधीश महोदय सतीश और इंदिरा के विवाह की सम्मति देकर चले गए और बेचारे सेठ रामदयाल दो लाख की बाजी लगाकर भी हार गए और सेठ हरिकिशन की परोसी हुई थाली पर उन्हीं के बेटे ने लात मार दी।

इधर सेठानी इंदिरा जैसी बहू पाकर निहाल हो गई। अंतः करण से आशीर्वाद देती हुई बोली पैसा तो भगवान ने बहुत दिया है पर ऐसी चांद सी बहू कहां मिलती!

प्रयाग गौरव श्रीमती सुदेवी गौड़

 (यह उपाधि उन्हें एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में प्रयाग के तत्कालीन आयुक्त श्री सदाकांत के द्वारा प्रदान की गई थी )

“मेरी मां मातोश्री श्रीमती सुदेवी गौड़”

आचार्य श्री अमिताभ जी महाराज 

श्रीमती सुदेवी गौड़ M.A., साहित्य रत्न, साहित्यालंकार का जन्म 30 नवंबर 1930 को उत्तर प्रदेश के अत्यंत प्रसिद्ध तीर्थ वृंदावन के श्री राधा रमण मंदिर के अत्यंत प्रसिद्ध मध्व गौड़ीय संप्रदाय के संप्रदायाचार्य परिवार में हुआ l इस कारण से बौद्धिक परिवेश जीवन के प्रारंभिक चरण से ही आपको प्राप्त हो गया।

आपके पिता गोस्वामी विजय कृष्ण जी महाराज अपने समय के प्रख्यात श्रीमद भगवत गीता तथा श्रीमद्भागवत के प्रखर वक्ता थे।

उन्होंने श्री मदन मोहन मालवीय, गोस्वामी गणेश दत्त जी आदि उद्भट विद्वानों के साथ पूर्व स्वतंत्रता काल के दूरस्थ भारतीय क्षेत्रों अर्थात आज के पाकिस्तान डेरा गाजी खान, पेशावर पन्नू आदि क्षेत्रों में सनातन धर्म प्रचार सभा स्थापित की तथा अपने प्रवचनों से वैष्णव धर्म का प्रचार किया l ऐसे मूर्धन्य पिता की पुत्री सुश्री सुदेवी जी में विद्वता के संस्कार प्रारंभ से ही विद्यमान थे।

आपने उच्च शिक्षा के विविध सोपान को प्राप्त करते हुए M.A.,साहित्य रत्न , साहित्यालंकार आदि परीक्षाएं उत्तीर्ण की।

विद्या विनोदिनी एवं हिंदी साहित्य सम्मेलन की मॉरीशस तक से कॉपियां आपके पास परीक्षण हेतु आती रही। दीर्घकाल तक आप उनकी परीक्षक रहीं।

आपका साहित्य के क्षेत्र में अवदान भी महत्वपूर्ण रहा l आपने लघु कथाओं का लेखन किया।

सुप्रतिष्ठित बंगला कथाकारों जैसे बनफूल, योगेंद्र नाथ गुप्त, रंजित चट्टोपाध्याय जैसों की अरब वेदूइन, ठाकुरमार झूली , बनफूल की लघु कथाओं का हिंदी में अनुवाद करने के साथ पर्याप्त स्वतंत्र लेखन भी किया जिसका अधिकांश अब अनुपलब्ध है।

उनका लेखन उस पूर्व काल में भी सामाजिक सरोकारों के बहुत निकट रहा।

साहित्यिक वर्ग में उनकी निरंतर गति बनी रही।

गोष्ठियों में समारोहों में हिंदी साहित्य सम्मेलन के प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री प्रभात शास्त्री , श्री लक्ष्मी नारायण मिश्र, श्रीमती शकुंतला सिरोठिया आदि के साथ उनके निकट के साहित्यिक संबंध रहे।

उनकी इस साहित्य यात्रा को स्मरण करते हुए उनकी इस वृद्ध वय में उनके प्रति अपनी भावुक वृत्ति के साथ प्रणत होकर साष्टांग अभिवादन करता हूं।

उनके लेखन का पुनर अनुसंधान उनके जीवन के इस चरण में अद्भुत पाथेय का कार्य करेगा, ऐसी मेरी आशा है।

मैंने अपने जीवन में जो कुछ भी प्राप्त किया है जो सद है, पवित्र है, शुभ है, तार्किक है, वह सब अपनी मातोश्री श्रीमती सुदेवी गौड़ के श्री चरणों की कृपा का ही प्रसाद है।

इस वय में भी उनके बौद्धिक बल के समक्ष में स्वयं को बहुत लघु अनुभव करता हूं। अपनी इस वृद्ध वय मे भी सामाजिक सरोकारों के साथ स्वयं को जोड़े रखना तथा पूरे बल के साथ तार्किक समसामयिक टिप्पणियां करना उनका प्रिय रुचि विषय है।

मेरे द्वारा किए जाने वाले समस्त सामाजिक कार्यों के की पृष्ठभूमि में उनके द्वारा प्रदत्त प्रेरणा ही है।

पृथ्वी पर मेरे लिए साक्षात ईश्वर मेरी मां के चरणों में मैं पुनः पुनः साष्टांग प्रणाम करता हूं।

आचार्य श्री अमिताभ जी महाराज

Check Also

माघमेला शिविर में सुंदरकांड पाठ आयोजित

बार के माघमेला शिविर में सुंदरकांड पाठ आयोजित हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के माघमेला शिविर का ...