
“घड़ी”
मूल बांग्ला लेखक
रंजित चट्टोपाध्याय
अनुवादिका 2/8/1972
श्रीमती सुदेवी गौड़ एम.ए. साहित्य रत्न, साहित्यालंकार
पिताजी की मृत्यु के बाद तीन वर्ष वाद घड़ी पुनः बन्द हो गई।अब किसकी बारी है l टिक टिक करके घड़ी में 8:00 बज गएl जल तरंगों के समान अत्यंत मीठी आवाज थी l
मानवेंद्र गोलाकार दीवाल घड़ी की ओर मुग्ध भाव से देख रहा था l बोला तुम्हारी घड़ी तो बड़ी सुंदर है l इतनी मीठी आवाज तो मैंने कभी नहीं सुनी। और इसका पेंडुलम तो आश्चर्यजनक ही है।
मैं थोड़ा हंसकर बोला सचमुच ही आश्चर्यजनक है। गोल घड़ी के तले में जरा सा सुराख था l उसी में से स्टील की एक लम्बी चैन लटक रही थी, उसी में लाल आंखों वाली एक बकरे के बच्चे का सिर लटक रहा था l पल पल बकरे का सिर बना हुआ पेंडुलम हिल रहा था l वह सिर धातु का बना नहीं था बल्कि हड्डियों से तैयार किया गया था l
मानवेन्द्र ने पूछा, यह घड़ी कहाँ से प्राप्त की ? जैसे यह घड़ी जिज्ञासा की वस्तु हो l मैं बोला, यही बात है। घड़ी, यहाँ की नहीं है। चीन की है। और यह पचास वर्ष पुरानी है l पचास वर्ष पहले आर्मेनियन स्ट्रीट के एक कबाड़ी की दुकान पर थी। उस दुकान को एक वृद्ध चीनी महिला चलाती थीं। मेरे बाबा यहाँ से एक आराम कुर्सी खरीदने गये थे। तभी उनकी दृष्टि इस चीनी घड़ी पर पड़ी। लेकिन बुढ़िया इसे नहीं बेचना चाहती थी। उसने कहा यह भुतही घड़ी है, बाबू इसे मत लो।
भुतही घड़ी ! सो किस तरह l मानवेन्द्र को आश्चर्य हुआ l मैंने कहा मेरे बाबा ने भी ठीक यही प्रश्न किया l प्रश्न सुन वृद्धा कुछ क्षण चुप रही l हमारे लिये यह एक कहानी है लेकिन वृद्धा के लिये यह एक सत्य घटना थी। सुनो घटना इस प्रकार है।
मानवेद्र बोला, “शशांक पहले एक सिगरेट दो। चीनी बुढ़िया, बकरे के बच्चा मार्क की घड़ी— यह कहानी तो बड़ी रोमांचक लगती है l और एक प्याला कॉफी भी चलेगी।”
मैंने नौकर को बुला कर काफी लाने को कहा। पौष समाप्त हो रहा था । सर्दी जैसी तेज होनी चाहिये वैसी ही पड़ रही थी। लेकिन इस वर्ष कोहरा बहुत अधिक था। सन्ध्या होते ही कुहासे की वजह से सारा शहर एकाकार हो गया था। सर्दियों में सन्ध्या से ही रात्रि घिरने लगती है। लोगों के आने जाने का शब्द सुनाई नहीं देता। बल्कि निस्तब्धता के बीच कभी-कभी साए साए की आवाज सुनाई देती है । पता नहीं क्यों आज जैसे सूर्यास्त के बाद से क्रंदन करती हुई शीत वायु समस्त वातावरण में व्याप्त हो रही है।
वातावरण जैसे घुटा हुआ है। ऐसे वातावरण में प्रतिदिन जीवन में व्यस्त रहने वाला मन भीड़भाड़ से अलग एकान्त में रहना चाहता है, या घर के किसी एकान्त स्थान में दो चार साथियों के साथ एकत्रित हो कर बैठना चाहता है और सासारिक बातों से अलग कुछ अलौकिक बातचील करना चाहता है l
लगता है इसीलिये मानवेन्द्र मेरे शहर के मकान की बैठक मे पौष की सन्ध्या में मेरे साथ गप्प लड़ाने आया है। मेरी घड़ी उसने पहले कभी न देखी हो ऐसी बात नहीं है l लेकिन इससे पहले इस घड़ी के विषय में उसमें कोई आश्चर्य व उत्सुकता नहीं देखी थी। इस शान्त सन्ध्या के वातावरण ने ही उसमें इस घड़ी के प्रति एक कौतूहल पैदा कर दिया है।
कॉफी भी आ गई। मानवेन्द्र ने अपने पैर सोफे के ऊपर उठा लिए और सिगरेट जला कर उसका धुआं छोड़ते हुए बत्ती भी कम कर दी। फिर शशांक से बोला कि अब उस चीनी बुढ़िया की कहानी सुनाओ l
मैंने कहा, कहानी उस चीनी बुढ़िया की नहीं है, बल्कि उसकी सुनाई हुई है l
हो. ची . खेतिहर जाति का होते हुए भी वह घड़ी बनाने वाला बहुत अच्छा कारीगर था l गाँव में बैठे बैठे वह अनेक प्रकार की घडियाँ बनाया करता था और महीने में एक बार शहर जाकर बेच आता था। उसके परिवार में उसकी पत्नी तान् एवं एक कन्या थी । उसकी पत्नी तान अति सुन्दरी एवं कार्य कुशल थीl इनकी जाति में इतनी रूपवती स्त्री साधारणतया दिखलाई नहीं देती थी। हो .चि .के सौभाग्य को देख कर अनेक लोग ईर्ष्या करते थे, लेकिन उसका सांसारिक जीवन सुखी था। हो .चि. केवल घड़ी ही बनाता था। घर गृहस्थी खेती आदि का कार्य उसकी पत्नी तान ही देखती थी। सेवा सुश्रुषा एवं अपने अच्छे व्यवहार के कारण तान दीपक के समान आलोकित रहती थी l उसने अपने प्रेम के आवरण में हो. ची. को हवा की तरह घेर रखा था ।
एक दिन शहर से आकर हो. चि. ने रेखा कि तान घर पर नही है। केवल घर पर ही नहीं पूरे गाँव में खोजने पर भी तान का कहीं पता नही लगा। हो. चि. पागल के समान हो गया। बहुत चेष्टा करने पर पता लगा कि गाँव का जमीदार तान का हरण करके नांकिंग शहर ले गया है। नांकिंग उस देहात से बहुत दूर था। यह खबर मिलते ही हो. चि. एक्दम शान्त हो गया। बहुत दिनों बाद देखा गया कि उसने पुनः एक दीवाल घड़ी बनानी शुरू की है। वह घड़ी देखने में कोई असाधारण घड़ी नहीं लगती थी एवं उसका बाहरी नक्शा भी कोई खास तरह का नहीं था। लेकिन जितने एकाग्र मन से वह इस घड़ी को बना रहा था। इतने एकाग्र मन से उसने कभी कोई घड़ी इस प्रकार नही बनाई थी।
दिन में वह घड़ी का कार्य करता और रात में भूत प्रेत की पूजा करता l हो ची जंत्र मन्त्र जानता था। सारी रात घर में वह घड़ी के सामने धूप दीप जलाकर मंत्रों के द्वारा उसे सिद्ध करता था। एक बार सात रात तक लगातार भूतों की पूजा चली। उसके बाद हो.चि. एक मरे हुए गिद्ध की हड्डियाँ लाया और उन हड्डियों से बकरे के बच्चे के सिर के समान सिर तैयार किया, आँखों की जगह लाल रंग लगा दिया जिससे लाल लाल आँखे जलती हुई दिखाई देती थी। इसके बाद उस मुण्ड को स्टील की चेन में अटका दिया।
वह बकरे का मुण्ड हिलने लगा और क्षण क्षण में रक्तवर्ण दोनों आँखे निष्ठुर रक्तपिपासु की तरह जलने लगी।
मानवेन्द्र स्तब्ध भाव से सुन रहा था, उसकी सिगरेट के मुँह पर राख जमा हो गई थी, जंगले के शीशे में से बाहर का कोहरा रहस्यमय जगत की तरह दिखाई दे रहा था, उस शीत रात्रि में हवा रुदन करती हुई लगती थी l
उसके बाद हो. चि. गाँव की जमीन जायदाद बेच कर नान किंग शहर में आकर रहने लगा। यहां आकर’हो. चि. जमीदार के निवासस्थान की खोज करने लगा और अंत में उस जमीदार के घर को उसने ढूंढ भी लिया। लेकिन हो चि ने न तो जमीदार का खून करने की चेष्टा की और न ही पत्नी हरण की नालिश ही की। एक दिन वह तिब्बत के लामा का वेश धारण कर उस घड़ी को जमींदार को भेंट कर आया। उसने वह घड़ी जमीदार को उपहार स्वरूप दे के कहा कि यह घड़ी सिद्ध घड़ी है। जिसके यहां रहती है उसके यहाँ सब मंगल होता है और वह दीर्घायु होता है। जमीदार ने खुश होकर घड़ी को अपने घर में टांग लिया।
एक वर्ष बाद एकाएक घड़ी एक दिन बन्द हो गई। आश्चर्य की बात यह थी कि घड़ी में पूरी चाबी होते हुए भी घड़ी बन्द हो गईl
और दूसरे ही दिन अचानक सांस बंद होने से जमीदार की मृत्यु हो गई l उम्र 40 साल से कुछ ही ज्यादा थी l निरोग बलवान एवं पूर्ण स्वस्थ होते हुए भी अचानक उसकी मृत्यु हो गई l
इस खबर के मिलने के बाद बहुत दिनों बाद हो. चि. के मुख पर हंसी दिखाई दी l
मानवेंद्र अचल देह को जरा सा हिलाते हुए बोला, बड़े आश्चर्य की बात है l
मैंने कहा आश्चर्य की बात तो है ही l जमींदार के परिवार के लोग कहने लगे कि यह घड़ी बड़ी अशुभ है l भयभीत होकर उन लोगों ने उस घड़ी को शहर की एक नीलाम की दुकान पर बहुत थोड़ी कीमत पर बेच दिया l हो. चि. को जब पता लगा तो वह फिर उस घड़ी को खरीद कर अपने घर ले आया l
दूसरे वर्ष पुनः वह घड़ी एकाएक बंद हो गई जबकि उसमें पूरी चाबी भरी हुई थी l और दूसरे दिन हो .चि. स्वयं ही मर गया । पानी पीते पीते एकाएक उसके प्राण निकल गए l हो .चि. की लड़की सान फौरन उस घड़ी को अपने एक पड़ोसी को देकर स्वयं नानकिंग शहर छोड़ कर चली गई l
चीनी वृद्धा बोली, उसके बाद वह घड़ी, ना मालूम कितने हाथों में घूमती रही कोई नहीं जानता। तीन वर्ष बाद एक अंग्रेज भद्र पुरुष इस घड़ी के लेकर मेरी दुकान पर बेचने आए l मैं देखते ही चौक पड़ी l यह तो हो. चि. घड़ी वाले की वही भुतही घड़ी थी । मैं उस घड़ी को खरीदना नहीं चाहती थी और वह अंग्रेज भी उसे नहीं ले जाना चाहता था । साहब की अवस्था दयनीय थी l भीषण भय के कारण उसका आंख मुंह सफेद पड़ गया था l अन्त में वह अंग्रेज बगैर एक पैसा भी लिये उस घड़ी को छोड़ कर चला गया। तब से यह घड़ी यहीं दुकान पर पड़ी है l इस भुतही घड़ी को घर कभी नहीं ले गई l बाबू मैं मना करती हूं आप भी इस घड़ी को मत ले जाइए l
तुम्हारे बाबा ने क्या कहा? मानवेन्द्र ने प्रश्न किया |
मेरे बाबा पहले तो खूब हँसे l उसके बाद बोले, सुनो बूढ़ी मां आषाढ़ में सुनी हुई यह कहानी बुरी नहीं है l लेकिन सुनो मैं शंकर नाथ चक्रवर्ती कुश्ती का ऑल इंडिया का चैंपियन था l इस वक्त मैं 65 वर्ष का हूं l अब से 10 वर्ष पहले तक नियमित कुश्ती लड़ता था l मैं भूत-फूत नहीं मानता l
बुढ़िया बोली, तुम भूत नहीं मानते?
बाबा बोले, नहीं ।
लेकिन विश्वास करो। भूत होते हैं।
रहने दो l मेरा कुछ बनता बिगड़ता नहीं lमेरा नाम है शंकर, मतलब भूतनाथ – मैं हूँ भूतो का स्वामी । जब यह मुझ पसन्द आ गई है, तो में इसे खरीदूँगा ही । कितने में होगी। ज्यादा कीमत न बढ़ा कर सीधे से बतलाओं कितने में दोगी l
बुढ़िया अत्यन्त शिथिल हो गई। बोली, जब तुम भूत घड़ी खरीदना ही चाहते हो, तो जो चाहो वही दे दो। पर अपना पता मुझे लिख कर दे जाओ l भगवान बुद्ध तुम्हारी रक्षा करें ।
बाबा रुपए ५) में उस घड़ी को खरीद कर घर ले आए।
मानवेन्द्र वाला – फिर ?
मेरी सिगरेट बुझ चुकी थी, उसे फिर से जला कर बोला, उसके बाद उस घड़ी की कहानी घर के सभी लोग प्राय: भूल ही गये थे। बैठक में टंगी हुई थी , मृदु आवाज में समय की घोषणा करती हुई बिल्कुल ठीक चल रही थी। अचानक एक दिन सर्दियों में सुबह के समय कंबल ओढ़े एक मूर्ति सामने आकर खड़ी हो गईं l सन की तरह सफेद बाल चेहरे की खाल लटकी हुई आँखे न होने के बराबर बोली शंकर नाथ चक्रवर्ती हैं?
बाबा ने आकर उन चीनी बुढ़िया को देखा और देखकर अवाक हो गए l वोले, क्या बात है बूढ़ी मां? तुम इस वक्त कैसे ?
वृद्धा धीरे धीरे बोली, तुम जिस दिन घड़ी खरीद कर लाये हो l आज उसे पूरा एक वर्ष हो गया है। तुम्हारे यहाँ कोई दुःख मुसीबत तो नहीं आई l
बाबा हंसने लगे और बोले, “ओह, इस बात को पूछने के लिये पूछती हुई मेरे इस मकान तक आई हो l नहीं बूढ़ी माँ — हमारे यहां सब ठीक है, मुझे देख कर ही समझ गई होगी। कहा तो मैं भूतों का स्वामी हूँ मैं भूत- फूत नहीं मानता l यह घड़ी बहुत अच्छी है l ठीक टाइम दे रही है।
बुढ़िया जैसे परास्त हो गई। फिर धीरे धीरे उसका मुख प्रसन्नता से चमकने लगा।
वृद्धा के जाने के समय पितामह ने उससे प्रश्न किया कि इस घड़ी के विषय में तुमने यह कहानी कहाँ सुनी ।
बुढ़िया बोली, यह केवल कहानी ही नहीं है सत्य घटना है। हो सकता है सच्ची घटना ही हो लेकिन तुमने कहाँ सुनी।
जाते जाते धीरे धीरे बुढ़िया बोली में ही हो. चि. की कन्या सान हूं।
अलवान अच्छी तरह ओढ़ कर मानवेन्द्र वोला, जाने दो, उसके बाद तो कोई दुर्घटना नहीं हुई l
जरा चुप रह कर बोला हुई थी। मानवेन्द्र दोनों आँखो में उत्सुकता लिये देखता रहा।
पौष की रात्रि जैसे हवा का क्रंदन ध्यान से सुन रही थी l हवा का हाहाकार बढ़ता जा रहा था। जंगले के शीशे पर हिमकण एकत्र होते जा रहे थे।
मैंने पुनः प्रारंभ किया , चीनी बुढिया जिस दिन आई थी, उसके एक दिन बाद घड़ी को खरीदे 1 वर्ष पूरा हुआ था l 1 वर्ष में घड़ी एक बार भी बंद नहीं हुई थी l किंतु उस दिन संध्या समय घड़ी बंद हो गई l चाबी देने के लिए देखने पर देखा चाबी भरी हुई है l तब बाबा बोले कि कल किसी अच्छी दुकान पर सफाई कराकर तेल डलवा दो शशधर l
शशधर मेरे पिताजी का नाम था l पिताजी बोले घड़ी की सफाई कराए एवं तेल डलवाए तो अभी तीन ही महीने हुए हैं l बाबा बोले फिर भी एक बार दिखा
लेना l कुछ भी हो घड़ी बहुत पुरानी है l
बहुत चेष्टा करने पर भी घड़ी नहीं चली। दूसरे दिन सुबह से ही बाबा की छाती में दर्द होने लगा। जितना समय चढ़ता जा रहा था l दर्द तेजी से बढ़ रहा था। घड़ी का इतिहास मेरी दादी जी भी जानती थी। उनका मुँह सूख गया था, वह बार बार कहने लगी, इतनी जिद अच्छी नहीं l निश्चय ही इस कुलच्छिनी घड़ी के कारण ही तुम्हारी तबियत खराब हुई है।
डाक्टर आया, बाबा की परीक्षा करके बोला, करोनरी रोग का आक्रमण है l सुनते ही सब निराश हो गये l घर में शोक छा गया l केवल बाबा का का मुँह खुशी से चमकने लगा । वह जैसे जीत गए l वह हाँपते हाँपते बोले सुना तुम लोगों ने l मेरी मृत्यु स्वाभाविक रोग से हो रही है, भुतई घडी के प्रभाव से नहीं । भूत फूत कुछ नहीं होता सब प्रकार की बातें हैं।
सन्ध्या समय बाबा जी की मृत्यु हो गई। लेकिन अन्त तक वह यही कहते रहे भूत नहीं होते l
मानवेन्द्र बोला तुम्हारा क्या विचार है शशांक क्या सचमुच भूत नहीं होते।
मैंने कहा विषय में मैंने कभी गम्भीरता से सोचा ही नहीं। क्यों कि बेकार माथा खराब करने लायक कोई घटना नहीं हुई। में अकेले मकान में रात्रि व्यतीत कर चुका हूँ l रात में श्मशान का चक्कर भी काट चुका हूँ l घोर अंधकार में भी आता जाता रहा हूँ लेकिन कभी भी भूत का हंसना रोना नहीं सुना और न कभी कोई छाया मूर्ति ही देखी l
तो तुम्हारा विश्वास है कि तुम्हारे दादाजी की मृत्यु हो. चि. की भूतई घड़ी के कारण नहीं हुई है।
नहीं घड़ी के कारण नहीं हुई है, चीनी बुढ़िया से अधिक मुझे डॉक्टर पर विश्वास है।
जरा रुक कर मानवेंद्र बोला किंतु शंकर नाथ को करोनरी का अटैक ठीक उसी दिन क्यों हुआ जिस दिन घड़ी बंद हुई l दो-चार दिन आगे पीछे भी तो हो सकता था l
हो सकता था, लेकिन घडी बंद होने के दूसरे ही दिन उनकी मृत्यु के आकस्मिक योग को कौन रोक सकता था l होनी की बात है l उनकी मृत्यु घड़ी बन्द होने के दूसरे दिन ही होनी थी।
घड़ी न भी बन्द होती तो भी बाबाजी की मृत्यु उसी दिन होती l
लेकिन चाबी भरी होने पर भी अचानक घड़ी बंद क्यों हो गई।
मुझे हंसी आ गई। बोला ठीक नहीं जानता l पुरानी कहावत है कि कार्य बिगड़ने के बाद कारण ढूँढना कठिन है। लेकिन इस बात को लेकर तुम्हारा मन इतना व्यग्र क्यों है ? इस वैज्ञानिक युग में भी क्या तुम भूत पर विश्वास करते हो ?
मानवेन्द्र कुछ व्यग्र हुआ। फिर गम्भीर हो कर बोला, विश्वास करता हूं यह कहने की भी इच्छा नहीं है और विश्वास नहीं करता यह भी जोर देकर नहीं कह सकता l लेकिन ऐसा विश्वास है कि कि इस संसार से भी परे कुछ अलौकिक जगत है l
ऐसा है l तब बताओ उस अलौकिक जगत में क्या है ? अस्पष्ट चेहरा, मिनमिना कर रोना और विकट अट्टहास l मानवेंद्र तुम 40 वर्ष के हो गए हो l फिजिक्स के प्रोफ़ेसर हो , लेकिन तुम्हारा ग्रामीण संस्कार अभी तक बना हुआ है
मानवेन्द्र चुप हो गया l उसने इस व्यंग की ओर ध्यान नहीं दिया l फिर अत्यन्त गम्भीर हो कर बोला, इसे संस्कार समझ कर व्यंग मत करो l शशांक यह तो अनुभूति मात्र है। किसी समय स्थूल अनुभूति हम लोग अच्छी समझते है लेकिन किसी को समझा नहीं सकते। एक दिन निश्चय ही तुम इस सत्य को समझोगे ।
हंसकर बोला ठीक है यदि किसी समय ऐसा समझूंगा तो अपना व्यंग वापिस ले लूँगा। लेकिन में फिर कहता हूँ कि भौतिक कल्पनाओं का नशा मुझे नहीं है।
मानवेन्द्र ने इस बहस को आगे नहीं बढ़ाया और पूछा बाबा जी की मृत्यु हुए कितने दिन हुए।
करीब पाँच वर्ष हुए।
इस बीच तुम्हार परिवार में और भी कोई दुर्घटना हुई है?
यानि किसी की मृत्यु ।
हुई बोला किसी परिवार में इतने लम्बे समय तक कोई दुर्घटना या मृत्यु न हो ऐसा है कोई परिवार।
मानवेन्द्र बोला, मैं तुम्हारे परिवार की कहानी सुनना चाहता हूँ।
हम भी अन्य परिवारों की तरह है। दादाजी की मृत्यु के दो वर्ष बाद एक मौत और हुई हमारे परिवार में। लेकिन यह मृत्यु भी स्वाभाविक नहीं हुई। इसका एक स्पष्ट कारण था
किसकी मृत्यु हुई थी l
मेरे पिताजी शशधर चक्रवर्ती की l
एक मिनट मेरी तरफ देखते रहने के बाद मानवेन्द्र बोला, किस तरह?
मैं कहने लगा, मेरे पिताजी ने ग्लास्गो यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की परीक्षा पास की थी l वह एक विलायती कंपनी में नौकरी करते थे l काशीपुर में एक विशाल फैक्ट्री थीl पिताजी वही काम करते थे l 3 वर्ष पहले मेरी बुआ की लड़की की शादी थी l विवाह हमारे इसी मकान से हुआ था l माघ के मध्य में शादी की तारीख निश्चित हुई थी l उस दिन सुबह से ही घर में विवाह की हलचल प्रारंभ हो गई थी। सब सामान एकत्रित करना, कंपाउंड ठीक करना, पंडाल बनाना आदि कार्य आरंभ हो गया था l आत्मीय स्वजनों से मकान भरा था। सब खुशी से भरे हुए थे l अचानक 12 बजे के करीब फैक्टरी से टेलीफोन आया। कारखाने की मशीन नहीं चल रही है l कोई उसे ठीक नहीं कर पा रहा है। आप फौरन आइये नहीं तो बहुत नुकसान हो जाएगा। दादाजी थे नहीं, शादी की सब व्यवस्था का भार पिताजी पर था। विवाह के लिये वह छुट्टी भी ले चुके थे। अचानक यह क्या हो गया। पिताजी बोले मैं जाता हूं लेकिन शीघ्र वापस आऊंगा l वर के आने में केवल २-३ घंटे रह गए हैं उसके पहले ही वापस आ जाऊंगा l
पिताजी चले गये, जो गये तो फिर आने का लक्षण दिखाई नहीं दिया l काम के आगे सब भूल जाते थे। असिस्टेन्ट को कार्य समझाने लगे।
इधर दोपहर समाप्त हो कर सन्ध्या घिरने लगी। सन्ध्या को ही शादी थी. वर आने में अब देर नहीं थी। लेकिन पिताजी आते दिखाई नहीं दे रहे थे। परिवार के सब लोग व्यग्रता से उनके आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। सर्दियों में सन्ध्या जल्दी ही होने लगती है। अन्धकार होते होते फिर कारखाने से टेलीफोन आया– पिताजी अस्पताल में हैं। कुछ असावधानी हो जाने में हाई वोल्टेज का धक्का लगने से गिर गये हैं।
अस्पताल से पिताजी फिर वापिस नहीं आये।
मानवेन्द्र ने व्यग्रता से प्रश्न किया, और घड़ी? क्या घड़ी उस वक्त चल रही थी?
मैंने कहा, नहीं घड़ी एक दिन पहले ही बन्द हो गई थी।
कुछ क्षण निस्तब्धता छाई रही l
बाहर ठंडी हवा साँय साँय करती चीत्कार कर रही थी। घर की चुप्पी से वातावरण भारी होता जा रहा था। मानवेंद्र उठ कर चहल कदमी करने लगा। अचानक खड़े होकर बोला, इस घड़ी को अब मत रखो शशांक , इसे फेंक दो l
बोला, क्यों ? घड़ी का क्या दोष है ?
अब भी नहीं समझे ? अच्छा तुम नहीं फेंक सकते तो मैं ही फेक आता हूं l पास ही गंगा हैं।
ऐसा लगा मानवेन्द्र बहुत उत्तेजित हो गया है। बोला, पागलपन मत करो। यह बाबा जी की यादगार है, इसे फेंक देने से बाबाजी का अपमान होगा। मानवेन्द्र पागल की तरह मुझे समझाने लगा, अभी भी समय है शशांक इस घड़ी को मकान से विदा कर दो। नहीं तो तुम्हारे ऊपर और भी विपत्ति आयेगी l भूत, प्रेत, दुष्टात्मा होते हैं, इन्हें लेकर बच्चों का खेल नहीं करना चाहिये, वह दुष्ट आत्माएं होती है , होती है।
मन कठोर हो गया, गले की आवाज भी कड़ी हो गई । बोला ठहरो! इन पुराने संस्कारों को लेकर तुम्ही रहो मानवेंद्र । भूतों के विषय में हमारा वंश नास्तिकों का है। भूत हम नहीं मानते, नहीं मानते , नहीं मानते।
मानवेन्द्र शान्त हो गया। बत्ती तेज करके हाथ की घड़ी देखी। बोला ठीक है तुम अपनी जिद लेकर रहो। सूखे गले से बोला रात्रि के दस बज रहे हैं। मैं अब जाऊँगा।
मानवेन्द्र चला गया। लेकिन जैसे ही अपनी दीवाल घड़ी की ओर मेरी दृष्टि पड़ी मैं पत्थर हो गया। मानवेन्द्र की घड़ी में इस समय दस बजे थे और मेरी दीवाल घड़ी में 8 बज कर 30 मिनट ।
फिर देखा, अच्छी तरह गौर से देखा, पेन्डुलम की चेन का हिलना डुलना बन्द था, मरे हुए गिद्ध की हड्डी से बने बकरे के बच्चे का रक्त वर्ण आंखों वाला सिर शान्त था l
पिताजी की मृत्यु के तीन साल बाद घड़ी पुनः बन्द हुई।
आज सुबह ही मैने घड़ी में चाबी दी है।
घड़ी की ओर देखते देखते मुझे सर्दी चढ़ने लगी। मन कमजोर होता जा रहा है l आंख फेर कर जंगले की तरफ देखा l मन में लगा चीनी वृद्धा सान की तरह कंबल ओढ़े यह पौष की रात बंगले के जंगले के शीशे के पास आकर खड़ी है । वह क्या मुझे झाँक कर देख रही है । उसके पीछे कोहरे की छाया और लगता है अनेकों अशरीरी छायाएं खड़ी है. L
यह पौष की रात जंगले के शीशे के पास आकर खड़ी है l सर्दी क्रमशः बढ़ती जा रही है l घर के अंदर बैठा हुआ शीत लहरी का मृत्यु रोदन सुन रहा था l
घड़ी फिर बंद हो गई l
दादा जी गए, पिताजी गए, अब किसकी बारी है ?

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