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प्रणवउं पवन कुमार: “मारुति नंदन के दर्शन से मन को बहुत संतोष मिला”

प्रणवउं पवन कुमार

महान गणितज्ञ रामानुजन ने कभी कहा था कि जीवन भी गणित है और दिक् काल के हर विंदु पर घटने वाली घटनाएं पूर्व सुनिश्चित होती हैं। ईश्‍वर ने सांसे और दिल की घड़कनें तक गिन कर दी होती हैं। उससे न एक सांस कम आती है न अधिक।

बचपन से मेरे दिल की धड़कन कुछ अधिक रहती थी और बरेली के कार्यकाल के दौरान जब एक बीमारी के इलाज के लिए अनुभवी डाक्‍टर के के मिश्रा से मिला तो उन्‍होंने कहा कि दिल तेज धड़कने से ईश्‍वर द्वारा दी गई धड़कनें कम हो जाती हैं। मैंने उनसे कहा था कि उसने यह भी तो तय किया होगा कि ये धड़कने कम कैसे होंगी। अब आप मिल गए हैं तो इन्‍हें कम करने का उपाय कीजिए। खैर,उस समय न्‍यूमोनाइटिस का इलाज अधिक महत्‍वपूर्ण था जिसे डाक्‍टर साहब ने बिना सीरिंज से पानी निकाले बस दवाओं से ठीक किया। बाद में रक्‍तचाप के इलाज के लिए जो दवा ली उसने धड़कनों की रफ्तार पर भी चाबुक लगा दिया। अब वे अपनी औकात में हैं। यह सब लगता है कि दिक् काल में पहले से ही तय था। इसी तरह पिछले दिनों अयोध्‍या यात्रा भी हमारे कार्यक्रम में नहीं लेकिन ईश्‍वर के कार्यक्रम में तय थी।

मैं तो गया था अपनी दोनों बेटियों के पास। साथ में मेरे दोनों पौत्र भी थे ज्‍योतिर्मय और प्रियंवद। मैंने सोचा इसी बहाने वे अपनी दोनों दीदियों(बुआओं) और उनके बेटों से मिल लेंगे। आयुष्‍मान और मानस से तो वे मिल चुके थे, इंदिरापुरम में लेकिन देवांश और वेदांश से उनकी अभी तक मुलाकात नहीं थी।

कोरोना ने पिछले तीन साल तो कहीं आने जाने पर रोक लगा रखी थी। एक साल आजकल करते बीत गया। बीच वाली बेटी तृप्ति ने सुल्‍तानपुर में मकान बनवाया था और मैं उसके गृह प्रवेश में भी नहीं जा सका था। वह सुल्‍तानपुर जीजीआइसी में शिक्षक है। मेरी दोनों बेटियां और दामाद शिक्षा के ही क्षेत्र में हैं। बड़ी बेटी दीप्ति ने भी कुछ निर्माण कराया था। उसका भी आग्रह था कि उसे देख लूं आकर। बच्‍चों की प्रगति चाहे जिस क्षेत्र में हो संतोष प्रदान करती है। इस बीच तृप्ति के चचेरे देवर की अकाल मृत्‍यु हो गई। वह नोएडा में नौकरी करते थे और मेरी सोसायटी के बगल की सोयायटी में रहते थे। बड़ी कच्‍ची गृहस्‍थी थी। अचानक हृदय गति रुकने से देहांत हो गया। उनके घर भी जाना था उनके परिवार के शोक को बांटने के लिए। कम उम्र में मैने भी अपनों को खोया है और उस दर्द को मैं खूब जानता हूं। दुख में अपनों को देख-सुन उससे लड़ने की ताकत आती है।

लेकिन अयोध्‍या यात्रा का कोई कार्यक्रम नहीं था। सुल्‍तानपुर में बेटी-दामाद का आग्रह था कि एक दिन हम लोग या तो अयोध्‍या या प्रतापगढ़ के एक आश्रम में घूम आएं। मैं अयोध्‍या बचपन में गया था जब हाईस्‍कूल में पढ़ रहा था। कानपुर से गांव लौटते समय पिता जी के साथ में गया था और साथ में मेरे मित्र चतुर्भुज यादव भी थे। उस समय अयोध्‍या दर्शन की याद काफी ताजा थी। लेकिन उसके बाद सरयू में न जाने कितना पानी बह गया है और अयोध्‍या कई रूपों में राजनीति के केंद्र में रहा। मैं उन सबके मुख्‍य प्रवाह से तो वाकिफ रहा लेकिन प्रत्‍यक्षत: वहां जाने का कार्यक्रम नहीं बन पाया। एक साल लखनऊ के सेवाकाल में भी जाना नहीं हो पाया। परिवार का बोझ किसी लायक नहीं रखता।

हम लोग 25 की सुबह पौने ग्‍यारह बजे अयोध्‍या के लिए निकले। इसके पहले दैनिक जागरण के ब्‍यूरो चीफ रमा शरण अवस्‍थी से बात हो गई थी। उन्‍होंने उत्‍साह से आने का न्‍योता दिया और गाड़ी नंबर तथा कितने लोग हैं,यह जानकारी ली और सीआरपीएफ के नाकों पर नंबर नोट करा दिया जिससे कि कहीं रोकें नहीं। जब हम लोग सुल्‍तानपुर से निकले ही थे हमारे पुराने मित्र डाक्‍टर चंद्र गोपाल पांडे का फोन आ गया। उन्‍हें अवस्‍थी जी ने बता दिया था क्‍यों कि वह हम लोगों के संबंधों को जानते थे। डाक्‍टर पांडेय जिला होम्‍यो चिकित्‍सा अधिकारी पद से रिटायर होने के बाद अब निजी प्रैक्टिस कर रहे हैं और उनका एक क्लिीनिक सुल्‍तापुर फैजाबाद रोड पर सुल्‍तानपुर से दस किमी पर बाबूगंज बाजार में है। जहां वह हफ्ते में एक दिन बैठते हैं। मैं उसी रास्‍ते जा रहा था। उनकी क्‍लीनिक पर कुछ मिनट के लिए रुका और उनसे अपनी आंख में आ गई चोट के लिए आर्निका मांट भी लिया। खड़े खड़े ही बात हुई। वह बोले कि मौका मिला तो मैं अयोध्‍या में मिलूंगा।डाक्‍टर पांडेय से मेरा लगभग चालीस साल पुराना संपर्क है। जब मैं इलाहाबाद के अमृत प्रभात में सेवारत था तो वह गोंडा से हमारे संवाददाता थे। अयोध्‍या में ढांचा विवाद में उन्‍होंने बड़ी खबरें लिखी थीं। जब कारसेवकों ने उसे ढहाया तो वह थोड़े थोड़े अंतराल पर फोनसे अपडेट जानकारी देते रहते जिसका हम लोगों ने अमृत प्रभात में खूब उपयोग किया जिससे हमारा अखबार हमेशा आगे रहा और विश्‍वसनीय समाचारों के लिए जाना गया। तब का संपर्क बना हुआ है और सोशल मीडिया के संपर्क ने उसे और पुख्‍ता कर दिया है।

हम लोग दोपहर बारह बजे के आसपास अयोध्‍या में प्रवेश किए और तय हुआ कि पहले हनुमान गढ़ी में हनुमान जी का दर्शन किया जाए। हम लोग पार्किंग में गाड़ी खड़ी कर जब मंदिर के पास पहुंचे तो वहां सीढि़यों के बाहर तक अपार भीड़ लगी थी। भीड़ देख कर किसी की हिम्‍मत नहीं हुई अंदर घुसने की क्‍यों कि साथ में दो छोटे बच्‍चे भी थे। अवस्‍थी जी का बताया तो उन्‍होंने आने की जानकारी दी और गढ़ी के एक युवा पुजारी शिवम दास को हम लोगों की मदद के लिए भेजा।

पुजारी जी ने आकर हम लोगों को भव्‍य दर्शन कराया। हनुमान जी के घर में आम लोगों से हट कर विशेष रूप से दर्शन सुविधा लेने से मन में थोड़ी ग्‍लानि भी थी। भगवान के घर में कैसा वीआइपी ट्रीटमेंट लेकिन मजबूरी थी। लेकिन मारुति नंदन के दर्शन से मन को बहुत संतोष मिला। भीड़ को रोक कर शिवम दास जी ने दर्शन कराया और हनुमान जी को चढ़ी माला प्रसाद के रूप में पहनाई और प्रसाद भी दिया। कुछ देर उन्‍होंने अन्‍य देव विग्रहों के बारे में भी जानकारी दी और विश्राम कराया। उनके साथ फोटोग्राफी की गई और इसी बीच रमाशरण अवस्‍थी भी आ गए। कुल मिलाकर हनुमान जी के दर्शन से सबका मन आह्लादित था।

(क्रमश:😊 )

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