
तीन सखियां
वरिष्ठ पत्रकार रामधनी द्विवेदी
वे तीन सखियां थीं। वे आपस में ननद- भौजाई, देवरानी- जेठानी और बहनें भी हो सकती हैं और पड़ोसनें भी, लेकिन इनमें जो सख्य भाव था उसे देख कर मैं इन्हें सखियां ही कहूंगा। आप भी सखियां ही मान लें तो अच्छा रहेगा।

ये मुझे जयपुर में रविवार 24 अप्रैल को अचानक मिल गईं थीं जवाहर कला केंद्र में। मैं उस दिन बेटी को एक परीक्षा दिला कर वहां गया था जहां उसके कुछ पूर्व वरिष्ठ और सहकर्मी पत्रकार मिल गए थे। वहीं चर्चित तिलोनिया गांव में वेयर फुट कालेज से जुड़े कमल टांक भी मिले। उन्होंने बताया कि तिलोनिया की सोलर ममाज पर यहीं प्रदर्शनी लगी है, उसे देखिएगा। बेटी अपनी सीनियर के साथ अपने पहले के कार्यस्थल चली गई तो मैं उसके एक साथी माधव शर्मा के साथ प्रदर्शनी देखने लगा। वहीं इन तीनों सखियों से मुलाकात हुई। मैं प्रदर्शनी देखने के बाद कुछ लिखूंगा भी, यह सोच कर नहीं गया था। लेकिन इन सखियों से मुलाकात के बाद बिना लिखे नहीं रहा गया।

ये एक समूह की सदस्य थीं जो तिलोनिया के आसपास के किसी गांव का था जिसमें महिलाएं अधिक थीं-कुछ किशोरियां, कुछ युवतियां और अधिकतर वृद्धाएं। रंगबिरंगे परिधान में सजे इन लोगों को देख कर स्मार्टफोन से अचानक हम दोनों उनकी फोटो लेने लगे। यह देख कर वे तीनों बोलने लगीं हमारी भी फोटो खींचों। वे अपनी स्थानीय भाषा में बात कर हीं थीं और हम हिंदी में लेकिन दोनों को एक दूसरे की बात समझने में दिक्कत नहीं आ रही थी।
हम लोगों ने कई स्नैप लिए लिए। तीनों में एक सखी अधिक मुखर थी। सांवले रंग की अन्य दो से कुछ अधिक लंबी और पतली भी। उसने कई बार पोज दिया, वहां लगे पोस्टर के साथ। वह हर बार फोटो खींचने के बाद उसे देखती और कहती और अच्छी फोटो खींचों। फिर फोटो खिंचती तो वह उसे देखती लेकिन संतुष्ट नहीं होती। एक फोटो से वह संतुष्ट हुई और बोली कि हां ये ठीक है, लेकिन इसमें हमरी आंखें तो दिखी ही नहीं रहीं हैं?
दरअसल वह अपने लुक को लेकर बहुत सतर्क थी। उसके पोपले मुंह में दो ही दांत थे जिनमें एक कुछ बाहर निकला हुआ जो मुंह में रहने को तैयार नहीं था। और वह चाहती थी कि उसके दांत फोटो में न आएं। जिस फोटो में उसके दांत नहीं आए उसमें उसकी छोटी छोटी कोटरों में धंसी आंखें भी नहीं दिख रहीं थीं।

लेकिन, उसने कहा – चलो ये मां दांत नहीं दिखै।
फिर उसने कहा हम तीनो की फोटो खींचों एक साथ। याद रहेगी। हम लोगों ने उन तीनों की एक साथ फोटो खींची । तीनों बहुत ही खुश थीं और आपस में चुहल कर रहीं थीं। पूरा समूह बहुत ही प्रफुल्लित था। कुछ युवतियां वहां रखी दो आदमकद कठपुतलियों के साथ फोटो खिंचा रहीं थी। एक पुरुष के पास स्मार्ट फोन था। वह उससे सबके फोटो ले रहा था और प्रदर्शनी के बारे में जानकारी भी दे रहा था। एक महिला के पास भी छोटा सा कैमरे वाला फोन था। वह भी उससे फोटो खींच रही थी।
एक बात सबमें एक सी दिखी कि यदि हम उनकी फोटो खींचते तो वे पेाज देने या रुक कर फोटो खिंचाने में संकोच नहीं कर रहे थे। उनके साथ आए पुरुषों में एक तो मेरे सामने काफी देर तक खड़ा रहा कि लो खूब फोटो खींच लो। लगता है कि वे लोग पर्यटकों की फोटो खींचने की आदत से वाकिफ थे। सबसे अलग थी उनकी खुशी और भोलापन जो सभी चिंताओं से दूर रख रही थी उन्हें।

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