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व्यक्तिगत जीवन में श्रीमद् भगवत गीता: श्री अमिताभ जी महाराज

व्यक्तिगत जीवन में श्रीमद् भगवत गीता
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परम पूज्य संत आचार्य श्री अमिताभ जी महाराज
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वर्तमान उपभोक्तावादी, भौतिक तथा प्रतिद्वंद्विता से युक्त युग में, जहां व्यक्ति पर अपनी अपेक्षाओं के साथ ही अन्य संबद्ध व्यक्तियों व संस्थाओं की अपेक्षा पूर्ति का भारी दबाव बना रहता है, अपने व्यक्तित्व को बिखरने से बचाए रखना एक बड़ी प्राथमिकता है l
” सामान्य जीवन में तथा अत्यंत तीव्र गति से विकसित हो रहे कॉरपोरेट सेक्टर में इसे स्ट्रेस मैनेजमेंट के नाम से जाना जाता है l”
हमारे शास्त्रीय ग्रंथ सूत्रों में जीवन की इस समस्या का सहज समाधान विद्यमान है l
सबसे बड़ी आवश्यकता लक्ष्य प्राप्ति हेतु कार्य करते समय अवसाद अर्थात फ्रस्ट्रेशन से स्वयं को बचाए रखने की होती है l
हमारे उपनिषद ग्रंथ समुच्चय के आश्रय से यदि हम मनुष्य में व्याप्त असीम संभावनाओं को जान सकें तो व्यक्तित्व को नष्ट कर देने वाले इस तत्व से बच सकते हैं l
ऋग्वेद में स्पष्ट उद्घोष किया है “हमारा हाथ ईश्वर है, हमारा हाथ ईश्वर से भी बढ़कर है “। हम अपने हाथ के प्रयोग से सब प्राप्त कर सकते हैं l क्योंकि हमारे हाथ ईश्वर के द्वारा प्रदत्त विवेक एवं कृपा के बल से संबलित हैं l
हमारे हाथ द्वारा संपादित कर्म ही हमारे हाथ में ईश्वर के अवतार की अनुभूति प्रदान करता है l
कर्म की उपेक्षा करके लक्ष्य सिद्धि की कामना व्यक्ति को विक्षिप्त व असंतुलित कर सकती है। इससे बचने की आवश्यकता है l
हमारे समस्त शास्त्रीय ग्रंथ किसी भी कार्य के क्रियान्वयन की एक सुचिंतित प्रक्रिया प्रस्तुत करते हैं l
गीता ने स्पष्ट कहा है :
“बुद्धि का नाश विनाश उत्पन्न करता है”
अर्थात जिसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है, विनाश उसी का होता है l
जब ईश्वर प्रसन्न होते हैं तब वह उपयुक्त बुद्धि प्रदान करते हैं।
वास्तव में गीता में बुद्धि योग की प्रधानता की सहज स्वाभाविक परिणति कर्म की निरंतरता में एवं उसकी सकारात्मक में ही निहित होती है l
भगवान श्री कृष्ण गीता में स्पष्ट कहते हैं कि
“योग: कर्मसु कौशलम्”
अर्थात कर्म करने की निपुणता जो किए गए कर्म की सुंदरता को स्पष्ट करने के साथ कर्म करने वाले के हृदय की सुंदरता को भी प्रदर्शित करे l
कोई कर्म छोटा बड़ा नहीं होता है। अपितु उसकी उपयोगिता एवं प्रासंगिकता ही उसे छोटा ‘ बड़ा बनाती है l
अवसाद के प्रभाव से बचने के लिए किए जाने वाले कर्म के आकर्षण को बनाए रखने हेतु बिना उबे हुए उसमें आंतरिक परिवर्तन एवं परिवर्धन की प्रक्रिया को निरंतर चलाते रहना चाहिए l
कर्म करते समय बुद्धि द्वारा प्रदत्त धैर्य भी चाहिए l जो ईश्वरीय कृपा से ही प्राप्त होता है l
धैर्य के अभाव में जीवन तूफान में अटकी नाव के समान हिचकोले खाता है l
ईश्वर के प्रति उत्कट समर्पण ही आत्म बल प्रदान करता है l जो व्यक्ति को कर्मशील बनाए रखते हुए उसे उसका लक्ष्य प्राप्त करने में सहायक सिद्ध होता है l
क्योंकि एक बड़ी खींची हुई लकीर के बराबर या उससे बड़ी लकीर खींचने का जो वैध साधन है l
वह तो धैर्य और श्रम के साथ अपनी लकीर को वहां तक पहुंचाना है या उससे भी आगे तक ले जाना है l
किंतु बड़ी लकीर को मिटा कर या काटकर अपनी छोटी लकीर को स्थापित करने से अंततोगत्वा लक्ष्य दूषित हो जाता है और व्यक्तित्व भी नष्ट हो जाता है l
“कठोपनिषद के अनुसार आत्मा रथी है, शरीर रथ है, इंद्रियां घोड़े हैं तथा मन लगाम और बुद्धि सारथी है l”
अब यदि विवेक के आश्रय से बुद्धि में मन रूपी लगाम को खींचने की सामर्थ्य नहीं है तो परिणाम भयानक ही होंगे l
कोई भी व्यक्ति गीता के आश्रय से अपने तनाव को यह समझकर नियंत्रित कर सकता है कि कर्म करते समय लक्ष्य की प्राप्ति या परिणाम का लाभ इतना प्रभावी न हो जाए कि कर्म की निरंतर या प्रक्रिया में ही बाधा उत्पन्न हो जाए l
ऐसा करने पर लक्ष्य , प्रतिष्ठा तथा लक्ष्य को प्राप्त करने की प्रक्रिया सभी नष्ट हो जाएंगे l
गीता कर्म में तृप्ति एवं संतुष्टि का संकेत प्रदान करती है l
अनुशासन युक्त होने पर ही व्यक्तित्व विकसित होता है l
अपने कर्म चिंतन को अध्यात्म से युक्त करके समस्त कर्मों को ईश्वर के चरणों में अर्पित कर हम ग्रंथियां से मुक्त हो सकते हैं l
कर्म को करने वाला तथा कर्म फल का भोक्ता ईश्वर ही हमें विवेक प्रदान कर कुकर्म वा अकर्म से बचा कर कर्म सदकर्म से जोड़ता है l
कर्म संतुष्टि महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि हम ही संतुष्ट नहीं है तो हमारे कर्म से समाज या अन्य के संतुष्ट होने का प्रश्न ही नहीं उठता l
अतः विवेक युक्त कर्म करते हुए ही कर्म फल के रूप में ईश्वर का जीवन में आगमन होगा l
तथा उसकी प्रक्रिया व फलश्रुति के प्रति संतुष्टि ही हमें तनाव तथा अवसाद से मुक्त रख सकेगी l
ll शुभम भवतु कल्याणम ll
मोबाइल नंबर
+91-941 53085 09
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