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साहित्य अकादेमी पुस्तक मेला ‘पुस्तकायन’ का छठा दिन

साहित्य अकादेमी पुस्तक मेला ‘पुस्तकायन’ का छठा दिन

साहित्यिक पत्रिकाओं की मुश्किलों पर हुई बात

स्पेन से पधारे कवियों ने प्रस्तुत कीं अपनी कविताएँ

समर्पित लेखकों एवं संपादकों के श्रम एवं समर्पण से चलती हैं साहित्यिक पत्रिकाएँ : ममता कालिया

 

नई दिल्ली, 6 दिसंबर 2023;

साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित पुस्तकायन पुस्तक मेले के छठे दिन साहित्यिक पत्रिकाओं की पहचान और उनकी भूमिकाओं पर चर्चा हुई। इस पैनल चर्चा की अध्यक्षता प्रख्यात साहित्यकार ममता कालिया ने की और शैलेंद्र सागर (कथाक्रम), संजय सहाय (हंस), एवं पल्लव (बनास जन) ने अपने-अपने विचार व्यक्त किए।

सर्वप्रथम ममता कालिया ने साहित्यिक पत्रिकाओं को लघु पत्रिकाओं के रूप में चिह्नत करते हुए कहा कि लघु पत्रिकाओं ने हिंदी साहित्य के कई नए आंदोलन खड़े किए और उससे हज़ारों पाठकों को जोड़ा। उन्होंने साहित्यिक पत्रिकाओं के समर्थ इतिहास को प्रस्तुत करते हुए बताया कि कैसे रवींद्र कालिया की इलाहाबाद स्थित प्रेस में लघु पत्रिकाएँ छापी जाती थीं और युवा पीढ़ी उन्हें खरीदने के लिए लालायित रहती थी।

चर्चा को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने हंस के संपादक संजय सहाय को आमंत्रित किया। संजय सहाय ने अपने वक्तव्य में कहा कि साहित्यिक या लघु पत्रिका वही है, जिसमें कोई अंतर्निहित स्वार्थ न हो। उन्होंने लघु पत्रिकाओं को इस संदर्भ में भी याद किया कि उन्होंने नए और युवा साहित्यकारों को एक बड़ा मंच प्रदान किया।

कथाक्रम के संपादक शैलेंद्र सागर ने लघु पत्रिकाओं के सामने आने वाली मुश्किलों की चर्चा करते हुए कहा कि आज के समय में पत्रिकाओं को भेजने का डाक-खर्च इतना अधिक हो गया है कि उन्हें कम मूल्य पर भेज पाना संभव नहीं रह गया है। उन्होंने यह प्रस्ताव रखा कि भारत सरकार से जितनी भी पत्रिकाएँ पंजीकृत होती है, वे चाहे नियमित हांे या अनियमित, उन्हें पोस्टेज की छूट हमेशा मिलनी चाहिए।

चर्चा को आगे बढ़ाते हुए बनास जन के संपादक पल्लव ने कहा कि साहित्यिक पत्रिकाओं की पूँजी उनके पाठक हैं और हमें उनतक पहुँचने का निरंतर प्रयास करना चाहिए। उन्होंने सोशल मीडिया पर प्रकाशित होने वाली कुछ महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि हमें उनको भी प्रोत्साहित करने का कार्य करना चाहिए। उन्होंने कहा कि साहित्यिक पत्रिकाओं की ज़रूरत किसी समाज के लिए इसलिए भी है क्यांेकि वे साहित्यिक आंदोलन और विचारवान मानस बनाने का वातावरण तैयार करती हैं। बीच में संजय सहाय ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि सरकार हमारी सहायता करे तो उसके पीछे किसी उपकार का भाव नहीं होना चाहिए।

शैलेंद्र सागर ने सोशल मीडिया से साहित्यिक पत्रिकाओं को मिल रही चुनौती का ज़िक्र करते हुए कहा कि अभी भी मुद्रित पत्रिकाओं को कोई बेहतर विकल्प नहीं है। अंत में, चर्चा की अध्यक्षता कर रही ममता कालिया ने साहित्यिक पत्रिकाओं के संघर्ष की एक व्यापक छवि प्रस्तुत करते हुए कहा कि साहित्यिक पत्रिकाएँ समर्पित लेखकों और संपादकों के श्रम से चलती हैं यह आज से 30 साल पहले भी सच था, और आज का भी सच है। यह पत्रिकाएँ पैसे से नहीं, बल्कि साधना से निकलती है और जब तक इनको पसंद करने वाले पाठक है, जब तक यह निकलती रहेगी।

कार्यक्रम के आरंभ में अकादेमी के उपसचिव कृष्णा किंबहुने ने सभी अतिथियों का स्वागत अंगवस्त्रम् पहना कर किया। सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतर्गत आज सीसीआरटी छात्रवृत्ति पा रही भरतनाट्यम नृत्यांगना हृषा टंडन एवं स्वयंजीत पात्रा ने तबला वादन प्रस्तुत किया। उनके साथ सारंगी पर संगत आरिश फै़सल ने की।

सायं 5.00 बजे एक ‘साहित्य मंच’ कार्यक्रम का आयोजन हुआ। इस कार्यक्रम में स्पेन से पधारे, वहाँ की 4 भाषाओं के 4 कवियों – आंजेल्स ग्रेगोरी, कास्टिय्यो सुआरेस, चूस पातो तथा मारिओ ओब्रेरो ने अपनी कविताएँ अपनी मूल भाषा में प्रस्तुत कीं तथा उनका अंग्रेज़ी अनुवाद शुभ्रॅ बंद्योपाध्याय ने सुनाया। सर्वांतेस इंस्टीत्यूतो के निदेशक ऑस्कर पुजोल ने अंत में अपनी सारगर्भित टिप्पणी की।

कार्यक्रम के आरंभ में साहित्य अकादेमी के सचिव के. श्रीनिवासराव ने अतिथियों का अंगवस्त्रम् भेंट कर स्वागत किया और अपने संक्षिप्त वक्तव्य में भारत और स्पेन के सांस्कृतिक एवं साहित्य संबंधों की परंपरा पर भी प्रकाश डाला। कार्यक्रम का संयोजन कृष्णा किंबहुने, उपसचिव, साहित्य अकादेमी ने किया।

कल ‘बहुभाषी रचना-पाठ’ का आयोजन किया जाएगा, जिसकी अध्यक्षता उर्दू कवयित्री अमीता परसुराम मीता करेंगी और इसमें हिंदी, ओड़िआ, पंजाबी एवं सिंधी के रचनाकार अपनी रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे। साहित्य अकादेमी परिसर में 09 दिसंबर 2023 तक चलने वाला यह पुस्तक मेला प्रतिदिन पूर्वाह्न 10 बजे से सायं 8 बजे तक खुला रहेगा।

के. श्रीनिवासराव

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