भारत पर मंडराता एल नीनो का संकट

भारत पर मंडराता एल नीनो का संकट
कमजोर मानसून, महंगाई और कृषि पर बढ़ता खतरा
डॉ. सूरज कुमार मौर्य
नई दिल्ली।
प्रशांत महासागर में सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने की घटना, जिसे ‘एल नीनो’ कहा जाता है, एक बार फिर भारत के लिए चिंता का विषय बनती दिख रही है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार इस वर्ष एल नीनो की स्थिति विकसित होने की संभावना है, जिसका सीधा असर भारतीय मानसून पर पड़ सकता है। यदि ऐसा होता है तो इसकी कीमत केवल किसानों को ही नहीं, बल्कि आम उपभोक्ताओं, उद्योगों और देश की अर्थव्यवस्था को भी चुकानी पड़ सकती है।
एल नीनो एक महासागरीय-वायुमंडलीय परिघटना है, जिसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से अधिक बढ़ जाता है। इसके कारण वैश्विक वायु परिसंचरण प्रभावित होता है और भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून कमजोर पड़ सकता है। चूंकि भारत की लगभग 75 प्रतिशत वार्षिक वर्षा जून से सितंबर के बीच होने वाले मानसून से प्राप्त होती है, इसलिए इसकी थोड़ी-सी भी कमजोरी व्यापक प्रभाव डाल सकती है।
भारत का कृषि क्षेत्र मानसून पर अत्यधिक निर्भर है। देश के लगभग 56 प्रतिशत कृषि क्षेत्र में सिंचाई की पर्याप्त सुविधा नहीं है और वहां खेती वर्षा आधारित है। ऐसे में एल नीनो के कारण कम वर्षा होने पर धान, दलहन, तिलहन, कपास और गन्ने जैसी खरीफ फसलें सबसे अधिक प्रभावित होती हैं। इसके साथ ही मिट्टी में नमी की कमी रबी फसलों के उत्पादन पर भी असर डालती है।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि कमजोर मानसून का प्रभाव केवल खेतों तक सीमित नहीं रहता। जब उत्पादन घटता है तो खाद्यान्न, दालों, सब्जियों और खाद्य तेलों की कीमतों में वृद्धि होने लगती है। इससे महंगाई बढ़ती है और आम लोगों की घरेलू अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ता है। कई बार सरकार को आयात बढ़ाने या निर्यात पर नियंत्रण जैसे कदम उठाने पड़ते हैं, जिससे राजकोषीय दबाव भी बढ़ता है।
एल नीनो का असर जल संसाधनों पर भी पड़ता है। कम वर्षा के कारण जलाशयों में पानी का स्तर घट जाता है, जिससे सिंचाई और पेयजल आपूर्ति प्रभावित होती है। जलविद्युत उत्पादन पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। दक्षिण भारत और महाराष्ट्र के मराठवाड़ा जैसे जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में स्थिति और गंभीर हो सकती है।
हालांकि सरकार ने संभावित चुनौतियों को देखते हुए तैयारियां शुरू कर दी हैं। कृषि मंत्रालय ने संवेदनशील जिलों की पहचान कर आकस्मिक योजनाओं को अद्यतन करने का काम शुरू किया है। किसानों को कम पानी में अधिक उत्पादन देने वाली फसलों और सूखा-सहिष्णु बीजों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल अल्पकालिक उपाय पर्याप्त नहीं होंगे।
जलवायु परिवर्तन के दौर में एल नीनो जैसी घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। ऐसे में देश को दीर्घकालिक रणनीति अपनानी होगी। सिंचाई नेटवर्क का विस्तार, वर्षा जल संचयन, जल संरक्षण, जलवायु-अनुकूल कृषि तकनीकों का प्रसार, प्रभावी फसल बीमा और मजबूत खाद्य आपूर्ति श्रृंखला समय की आवश्यकता बन चुके हैं।
एल नीनो कोई नई चुनौती नहीं है, लेकिन बदलते जलवायु परिदृश्य में इसका प्रभाव पहले से अधिक गंभीर हो सकता है। इसलिए इसे केवल मौसम की घटना मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कृषि, जल और आर्थिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से भारत को अभी से व्यापक तैयारी करनी होगी, ताकि संभावित संकट को अवसर में बदला जा सके।
— डॉ. सूरज कुमार मौर्य
विशेषज्ञ, जलवायु परिवर्तन एवं प्रशिक्षण अधिकारी
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी), शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार
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