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आज महाशिवरात्रि: “दो बूंद आंसू के अभिषेक से प्रसन्न हो जाते हैं महादेव”

परमपूज्य आचार्य श्री अमिताभ जी महाराज आज महाशिवरात्रि के पर्व के महात्म का वर्णन करते हुए बताते हैं, “अगर आपमें विषपान करने का सामर्थ्य नहीं है तो दूसरों के जीवन को विषयुक्त बनाने से भी बचें, अपनी मानवीयता को नष्ट न करें। औरों के जीवन के कष्ट देखकर जो द्रवीभूत हो जाए, वही संत है, वही महापुरुष है। भोलेबाबा तो दो बूंद आंसू के अभिषेक से प्रसन्न हो जाते हैं।”

आचार्य श्री अमिताभ जी महाराज बताते हैं कि शिव जी ने विषपान करने से पूर्व अपनी पत्नी पार्वती जी से इसकी अनुमति ली थी, जो यह संदेश देता है कि पति को किसी भी कार्य के संपादन से पूर्व पत्नी को भी उसमें भागीदार बनाना चाहिए। यही नहीं, विष को शरीर को किस अंग में धारण किया जाए, इसका भी उन्होंने मंथन किया था क्योंकि शरीर के विभिन्न अंगों में विभिन्न देवताओं का वास होता है।

आचार्य श्री अमिताभ जी महाराज कहते हैं: 

आप सभी को आज महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर शुभ मंगल कामना एवं शुभ आशीर्वाद

आज महाशिवरात्रि का पर्व है l प्रकृति प्रसन्न है l प्रकृति और पुरुष के इस मिलन पर प्रकृति की निरंतता का संकेत प्राप्त होता है l

 बाबा भोलेनाथ के व्यक्तित्व के अनेक दुर्लभ पक्ष हैं l जो हमको समझने की आवश्यकता है l प्राय: हम पूजन पर अधिक ध्यान संकेंद्रित करते हैं किंतु मनन पर हमारा ध्यान संकेंद्रित नहीं होता l भूत भावन भगवान शिव नंदी पर भगवती पार्वती के साथ बैठते हैं l

 कभी आपने विचार किया कि इस परिदृश्य का वास्तविक आध्यात्मिक अर्थ क्या है ?वस्तुत: नंदी बैल धर्म है l भगवती पार्वती शक्ति का स्वरूप है l जबकि महादेव विवेक का स्वरूप है तथा नियंत्रक है l 

अर्थात विवेक तथा शक्ति से समन्वित धर्म समाज के विकास के लिए उपयोगी होता है , किंतु विवेक से रहित तथा शक्ति से युक्त धर्म मात्र विध्वंस कर सकता है l 

उससे हम सकारात्मकता की अपेक्षा नहीं कर सकते l बाबा को दिगंबर कहा गया है l अर्थात दिशाएं ही उनके वस्त्र के रूप में अभिहित की गई हैl

 इसका तात्पर्य यह है कि बाबा के जीवन में सब कुछ पारदर्शी है l कुछ भी छुपाने के लिए नहीं है l जैसा कि हम मनुष्यों के जीवन में होता है l 

इसके अतिरिक्त विषपान करने की सामर्थ्य बाबा भूतनाथ में ही है l समुद्र मंथन के काल में जब कालकूट हलाहल प्रकट हुआ तब हड़कंप मच गया कि इसको कौन ग्रहण करेगा ? बात सही है l 

हम भी अपने जीवन में जो श्रेष्ठ है, उत्तम है, आकर्षक है, ग्रहण करने योग्य है उसी को स्वीकार करते हैं l 

समाज के लिए भले ही कितना उपयोगी हो किंतु यदि कष्ट प्रदान करने वाला हो तो ऐसे संदर्भ को हम स्वीकार नहीं करते l

जब भूतनाथ भगवान शिव के समक्ष यह प्रस्ताव रखा गया तब उन्होंने स्वीकृति प्रदान करने के पूर्व पहले भगवती पार्वती से अनुमोदन की अपेक्षा कीl भगवती ने भी अपनी मौन स्वीकृति प्रदान की l

आप भी अपने जीवन में कोई महद कार्य करने के लिए बढ़ो तो प्रयास करो पत्नी की स्वीकृति प्राप्त कर लो l 

अब बाबा के सामने संकट यह है : उस हलाहल को कहां धारण करें ?

हृदय में धारण नहीं कर सकते क्योंकि वहां पर तो साक्षात वासुदेव नारायण विद्यमान है l जिह्वा पर धारण नहीं कर सकते क्योंकि वहां पर भगवान का नाम विद्यमान है l अतः उन्होंने उसे अपने कंठ में धारण कर लिया l कंठ नीला हो गया जिसको श्रीमद् भागवत के अनुसार शंभू का आभूषण कहा गया l

हम भी अपने जीवन में यह सीखें l कुछ सकारात्मक करते हुए यदि किसी प्रकार का कोई अपवाद भी हो जाए तो डरने की अपेक्षा उसको ईश्वर के प्रसाद के रूप में ग्रहण करें l

 महापुरुष वही होता है , संत वही होता है जो अन्य के कष्ट को देखकर के द्रवीभूत हो जाता है l उसके कपड़े सफेद है कि गेरुआ इससे कोई अंतर नहीं पड़ता l 

हमको भी सीखने की आवश्यकता है कि जब हम किसी के जीवन के हलाहल का पान नहीं कर सकते तो हमें उसके जीवन को जहर युक्त करने की दुष्ट वृत्ति से भी बचना चाहिए l

पूजन करना महत्वपूर्ण है किंतु बाबा के व्यक्तित्व के इन गुण समूह को यथासंभव स्वीकार करना भी महत्वपूर्ण है l क्योंकि बाबा का व्यक्तित्व तो इतना सरल और सहज है l वह तो मात्र दो बूंद अश्रुओं के अभिषेक से भी प्रसन्न हो जाते हैं l

आप सभी को महाशिवरात्रि पर्व की पुनः शुभ मंगल कामना एवं शुभ आशीर्वाद l

ll शुभम भवतु कल्याणम ll आचार्य श्री अमिताभ जी महाराज

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