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“संपूर्ण विश्व पागल हाथी की तरह भाग रहा है”: आचार्य अमिताभ जी

“आज संपूर्ण विश्व भौतिक सुखों की पूर्ति की आकांक्षा में पागल हाथी की तरह भाग रहा है” :

आचार्य अमिताभ जी महाराज

उनकी इस अपेक्षा के नीचे आकर प्रत्येक प्रकार की भावना, पारिवारिक संबंध, संपर्क, यहां तक कि अपना व्यक्तित्व भी हाथी के पांव के नीचे कुचल जाने जैसा विखंडित होता जा रहा है। ऐसा लगता है कि आज व्यक्ति की सामर्थ्य तथा उसका वैभव ही व्यक्तित्व के मूल्यांकन के एकमात्र पैमाने रह गए हैं। एक अजीब तरह की बेचैनी है ।

कोई किसी को पसंद नहीं करता 

सब केवल अपने स्वार्थ को ही पसंद करते हैं तथा उसको एक बढ़िया शिष्टाचार के मूल एवं मखमली आवरण में ढक कर रखना चाहते हैं जैसे की तीखी तलवार एक बढ़िया म्यान में रखी जाती है ।

समाज छोड़ दीजिए अपने परिवार के भीतर भी संबंधों की निरंतरता में स्वार्थ एक अद्भुत प्रेरक का काम करता है ।

अपने बच्चों में शील, संस्कार, नैतिक मूल्यों का संप्रेषण करने का समय किसी के पास नहीं है । मैं यह बात मात्र भारत वर्ष के संदर्भ में नहीं कह रहा हूं। विश्व के प्रत्येक खंड में यही समस्या है ।

भाषा और संस्कृति भिन्न होने पर भी हम अमेरिका में आज चारित्रिक विश्रंखलता तथा अनुशासनहीनता रोज कहीं ना कहीं होने वाली गोलीबारी में देख लेते हैं ।

क्रिश्चियन होने का मतलब अभद्र और दुष्ट प्रवृत्ति का होना तो नहीं होता । अपने समाज में विध्वंस करने की प्रवृत्ति रखने के साथ-साथ विशेष तौर पर अमेरिका दुनिया के बहुत बड़े क्षेत्र को अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए विध्वंस कर देना चाहता है। यह भी भोगवादी संस्कृति का एक स्पष्ट प्रतिफल है।

यह भी एक प्रकार की अपसंस्कृति है 

इस्लाम के तथाकथित उच्च मूल्यों की चर्चा करने वाले बड़े-बड़े आलिम फाजिल इस्लाम के नाम पर हो रहे रक्तपात पर किसी तरह की कोई टिप्पणी करने से बचते हैं। क्यों यह वही जानें?

जिन लोगों का कोई सकारात्मक भाव भी होता है उन्हें मुख्य धारा से अलग कर दिया जाता है । जैसे कि स्वतंत्रता के आंदोलन के समय नेशनलिस्ट मुसलमान की एक वर्गीकृत व्यवस्था समाज में कर दी गई थी l जैसे कि वह मूल धारा के न हो ।

जब हम यूरोप में चलने वाले 100 वर्षीय क्रुसेड या धर्म युद्ध की घटना का स्मरण करते हैं l तब यह बात समझ में आती है कि रक्त में प्रवाहित होने वाली विशेषताएं समय बीत जाने पर भी विलुप्त नहीं होती l उनकी निरंतरता रहती है तथा अवसर प्राप्त होने पर अधिक गतिशील भी हो जाती है ।

इसी चिंतन की प्रक्रिया में जब हम सनातन के अनुयाई वर्ग की चर्चा करते हैं तो परंपरा से ही यह वर्ग पीड़ित होते हुए भी कष्ट उठा करके भी आक्रामक होकर इस उत्पीड़न का सामना करने के लिए तथा दबाने वाले समूहों के प्रति आक्रामक दृष्टिकोण को उत्पन्न करने की सामर्थ्य अर्जित नहीं कर पाया ।

क्योंकि सहिष्णुता की उसकी दीर्घकालिक परंपरा उसे इस बात की अनुमति प्रदान नहीं करती ।

यह बात बहुत अच्छी है 

किंतु हम किसी पर अत्याचार न करें यह धर्म हो सकता है किंतु किसी और के द्वारा हमारे धर्म और संस्कृति पर अत्याचार किए जाने की प्रक्रिया को ना रोकना न केवल मूर्खता है अपितु अपराध भी है। जो आज सनातन धर्मावलंबी कर रहे हैं ।

आज आप नाना प्रकार के जिहाद की चर्चा सुन रहे हैं 

मुझे एक बात समझ में नहीं आती कि अन्य धर्मावलंबियों के द्वारा किया जाने वाला यह प्रयास सफल तो तभी हो रहा है ना जब सनातन की कन्याएं उनके इस आचरण को स्वीकृति प्रदान करती हैं ।

क्योंकि जो निषिद्ध है वह आकर्षक है ऐसी पूर्वकालिक मान्यता है तथा वह उसी से अनुप्राणित प्रतीत होती हैं ।

सब की संतुष्टि के लिए मैं यह मानकर चलता हूं कि वह सब अबोध हैं l तथा इस कारण वह इस चक्र में फंस गई ।

यद्यपि आप सभी यह जानते हैं आज सोशल मीडिया के जमाने में जब 6 और 7 साल के बालक अबोध नहीं है तो एक वयस्क कन्या किस प्रकार से अबोध हो सकती है ?

फिर भी मेरा दृढ़ विश्वास है इस पूरी प्रक्रिया को एक बहुत बड़े अनुपात में प्रारंभ होने के पूर्व ही नष्ट किया जा सकता है l

यदि हम अपनी बच्चियों को समझाएं इस जीवन में विवाह के पूर्व किसी भी प्रकार के निषिद्ध संबंध को स्थापित करना नैतिक रूप से निषेध माना गया है तथा ऐसा करने पर गंभीर परिणाम भोगने पड़ सकते हैं ।

यहां पर मैं बिना किसी जेंडर डिस्क्रिमिनेशन के सनातन से जुड़े हुए युवा वर्ग से भी इसी अनुशासन की अपेक्षा करता हूं ।

उन्हें भी ऐसा करने पर दंडित किया जाना चाहिए l

अगर हम किसी के बहकावे में आकर के उसके सामने समर्पण नहीं करेंगे तो ब्लैकमेल की संभावना प्रारंभ होने के पूर्व ही समाप्त हो जाएगी ।हमारा अस्वीकार किसी भी विध्वंस को उत्पन्न होने के पूर्व ही भस्मीभूत कर देगा ।

इसके पीछे का बड़ा कारण यह है हिंदू माता-पिता अपने बच्चों के मुंह से ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार जब सुनते हैं तो कबूतर जैसी उनकी छाती हाथी जैसी हो जाती है।

किंतु यदि उनसे कहा जाए कि क्या आपके बच्चे को हनुमान चालीसा, सुंदरकांड तथा दो -चार -पांच श्लोक स्मरण हैं तो उपेक्षा पूर्ण वाणी में उनका उत्तर होता है ।

यह सब करने की क्या आवश्यकता है ? इससे नौकरी तो मिलेगी नहीं ।

तो भैया नौकरी की चिंता तो कर रहे हो लेकिन घर के बच्चे हाथ से निकल जाएंगे तो छाती पीटने के अलावा कुछ बचेगा नहीं। अतः मूल रूप से यह अपराध माता-पिता का है। वह इस दायित्व से बच नहीं सकते । जो अपने बच्चों को सनातन के मूल संस्कार प्रदान करने के प्रति आपराधिक अवज्ञा के दोषी हैं ।

वृक्ष के पत्ते पर पानी डालने से वृक्ष स्वस्थ नहीं होता । उसके लिए जड़ में पानी डालने की आवश्यकता होती है ।

मैं यह जानता हूं हजारों वर्षों से बगल के राज्य का झंडा गिर जाने तथा राजमहलों को तथा नालंदा और विक्रमशिला के विश्वविद्यालय को जला दिए जाने के बावजूद भी उसके बगल के राज्य कभी भी राजनीतिक चेतना से युक्त नहीं हुए मात्र यह सोचते हुए इसका हमसे क्या लेना देना है। 

तो मेरी इस छोटी सी विचार अभिव्यक्ति से किसी के अंदर धर्म संरक्षण तथा सनातन को मजबूत करने का भाव उत्पन्न होगा ।

ऐसी कोई कपोल कल्पना करने में या मूर्खतापूर्ण भावुकता में मैं विश्वास नहीं रखता हूं l

लेकिन जिस प्रकार से श्री राम के सेतु के निर्माण में एक गिलहरी बालू में लोटपोट होकर के थोड़े से बालुका कण को ले जाकर के सेतु पर गिरा देती थी जिससे कि श्री राम का सेतु निर्मित हो सके।

इस प्रकार से मेरी यह भाव अभिव्यक्ति बहुत छोटा सा प्रयास है। संभवतः एक छोटा सा वर्ग इस पर ध्यान देकर के स्वयं को परिमार्जित करने का प्रयास करें।

ऐसी में आशा करता हूं।

ll शुभम भवतु कल्याणम ll ll जय श्री कृष्ण ll

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