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“जिन ढूढ़ा तिन पाइयां गहरे पानी पैठ”: रामधनी द्विवेदी

“जिन ढूढ़ा तिन पाइयां गहरे पानी पैठ
मै बौरी बूड़न डरी रही किनारे बैठ”

वरिष्ठ पत्रकार रामधनी द्विवेदी

कन्‍या कुमारी में समुद्र तट पर, सड़क के किनारे और बाजार में भी कुछ लोग छोटा सा कपड़ा फैलाए तरह तरह के रंग बिरंगे पत्‍थर बेचते नजर आते हैं।

ऐसा भारत के लगभग सभी तीर्थस्‍थलों और बाजार मेंले में दिख जाता है। इनके पास तरह तरह के पत्‍थर होते हैं। उनका कहना होता है कि ये सब समुद्र से मिलते हैं। जब हम लोग कन्‍या कुमार मंदिर के पीछे समुद्र तट पर टहल रहे थे तो कुछ लोग समुद्र में कमर भर पानी में कुछ खोजते नजर आए। वे एक बड़ी चलनीनुमा पात्र लिए थे जिसमें तलहटी से कुछ गाद भरते और उसे छानते। कभी-कभी उसमें से कुछ निकाल कर नेकर की जेब में भी रखते। ऐसे दो लोगों को मैने यह करते देखा। दोनों से बात करनी चाही लेकिन वे कुछ बोलने को तैयार नहीं थे। जब मैने पूछा कि क्‍या मिला समुद्र में तो उसने जेब से कुछ पत्‍थर निकाल कर दिखाए। किसी को पन्‍ना तो किसी को पुखराज बताया। लेकिन वे पत्‍थर अनगढ़ न होकर तराशे लग रहे थे। समुद्र में उन्‍हें कैसे तराशा गया,यह समझ में नहीं आया। मुझे यह उनकी चालाकी लगी कि समुद्र में रत्‍न तलाशते देख लोग उन्‍हें असली समझ कर खरीद लेगें। लेकिन उनके पास कुछ पत्‍थर सजावटी जरूर मिल जाएंगे।

मेरे भाई ने एक गोल शंक्‍वाकार लगभग चार इंच का पत्‍थर दिखाया जो उसने पहले की यात्रा में किसी ऐसे ही दूकानदार से खरीदा था। देखने में वह सफेद शिवलिंग की तरह दिखा। ऐसे पत्थर बहुत मिल जाएंगे। लेकिन ऐसी जगहों पर ठगे जाने का भी चांस होता है। कुछ दूकानदार बाघ के नाखून की ताबीज भी बेचते मिले जो पूरी तरह नकली थे। लेकिन उन्‍हें इस तरह बनाया गया था कि देखने में असली लगें। जब मैने कहा कि यह तो प्‍लास्टिक का है तो उसने एक पीली खाल जैसी दिखाई जिसमें हाथ जैसी रचना में नाखून लगे थे।एक नजर में देखने पर वह बाघ के बच्‍चे की खाल लग रही थी लेकिन ध्‍यान से देखने पर उसके नकली होने और रंगे होने का पता चल जाता था।


आसपास की दूकानों पर तरह तरह के शंख और उनसे बने सजावटी सामान भी बिकते दिेखे। जो मोल भाव करने पर सस्‍ते में मिल जाते थे। तरह तरह की कौडि़यां भी बिक रही थीं जो 50 रुपये दर्जन थीं। एक समय ये कौडि़यां देश में मुद्रा के रूप में प्रचलित थीं। ये आभूषण के रूप में भी पहनी जाती थीं। आदिवासी अब भी इनके तरह तरह के आभूषण बनाते और पहनते हैं। मैने भी बचपन में कोडि़यों की माला कमर में पहनी है। पहले बच्‍चों का नजर से बचाने के लिए कौडि़यों की माला कमर या गले में पहना दी जाती थी। कभी कभी तांबे के छेदहवा पैसे को भी कमर में पहनाया जाता था। तांबे का यह पैसा एक पैसे का होता था। पहले यह पूरा गोल बनता था जिसे टिकुलहवा पैसा कहा जाता लेकिन द्वितीय विश्‍व युद्ध में तांबे की खपत हथियार बनाने में अधिक हो गई तो पैसे के बीच में छेद कर उसे हल्‍का कर दिया गया और छेदहवा पैसा चलन में आया।

पहले पैसों और रुपयों की कीमत धातु की कीमत के बराबर होती थी। इसी से तांबे,पीतल और चांदी के पैसे रुपये चलते थे। बाद में कागज की करेंसी का चलन हुआ। इसके पीछे भी सुविधा और धातु की कमी एक कारण था।

बच्‍चों को तांबे के पैसे और कोड़ी की माला पहनाने के पीछे विज्ञान काम करता था। इससे शरीर में कैलसियम और तांबे की नियमित आपूर्ति होती रहती थी। यह आज के मल्‍टीविटामिन की गोलियों की तरह थीं। तांबे का शरीर से संपर्क होने से उसके अंश त्‍वचा के जरिये शरीर में जाते थे। यह बच्‍चों को डा‍यरिया जैसी बीमारी से बचाता था। डाक्‍टर एनसी घोष ने अपनी होम्‍योपैथी की मैटेरिया मेडिका में लिखा है कि बंगाल में हैजा फैलने पर डाक्टर सलाह देते थे कि पेट पर तांबे की प्‍लेट बांधी जाए जिससे हैजा से बचा जा सकेगा। तब अंग्रेजी दवाओं का चलन नहीं के बराबर था और न ही टीके वि‍कसित हुए थे। पहले घरों में पीने का पानी मिट्टी के घड़ों में रखने के साथ तांबे या पीतल के गगरे में रखा जाता था। यह पानी शुद्ध और रोगाणु नाशक होता था। आज के विज्ञान ने भी तांबे की महत्‍ता स्‍वीकार की है और तांबे से बने आरओ बाजार में बिकने लगे हैं।


जिसे हम कभी पिछड़़ेपन का प्रतीक मानते थे,अब विज्ञान उनका महत्‍व समझने लगा है। हड्डी के डाक्‍टर जो कैलसियम की गोलियां देते हैं उनमें सीप और कौडि़यों का चूर्ण भी हेाता है। हमारे पूर्वजों के पास प्राकृतिक ज्ञान हमसे कहीं अधिक था।
कुछ साल पहले यूपी के बागपत जिले के सनौली गांव में हुए उत्‍खनन से पता चला कि वहां के लोग ईसा से दो हजार साल पहले से तांबे का बेहतर इस्‍तेमाल करना जानते थे। सनौली में तांबे की नुकीली तलवारें मिली हैं जिनकी मूंठ अभी तक सही सलामत थी क्‍यों कि उसके ऊपर तांबे के तार लपेटे हुए थे। इसी तरह वहां से मिले तीन रथों में जगह- जगह पर तांबे की नक्‍काशी और सजावट की गई थी जिससे वे न केवल मजबूत बने रहे बल्कि चार हजार साल बाद भी उनका अस्तित्‍व बना रहा। वहां मिले कंकालों को जिन ताबूत में रखा गया था,उनकी मजबूती के लिए भी तांबे का प्रयोग किया गया था। तांबे का प्रयोग हम बहुत प्राचीन काल से करते रहे हैं। पूजा के पात्र भी तांबे या पीतल के ही अधिक प्रयोग होते हैं। इसका एक कारण उनका वैज्ञानिक महत्‍व होना ही था। तांबे के पात्र में रखा जल एक तरह से औषधि का काम करता है। नदियों में तांबे के सिक्‍के डालने के पीछे भी यही विज्ञान ही है। दुनिया के किसी देश में नदियों के सिक्‍के डालने की परंपरा नहीं है। यह इतनी गहरी है कि तांबे के सिक्‍के न मिलने पर भी लोग आज भी नदियों में सिक्‍के डालते हैं, चाहे वे जिस धातु के हों।

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