
दक्षिणापथ -3
मंदिरों में दर्शनार्थियों के लिए ड्रेस कोड

वरिष्ठ पत्रकार रामधनी द्विवेदी
तमिलनाडु के मंदिरों की भव्यता देखते ही बनती है। सभी देखने में एक ही द्रविण शैली में बने लगते हैं। चाहे तिरुपति का मंदिर हो या मदुरै का मीनाक्षी या रामेश्वरम सभी एक तरह के लगते हैं। गर्भगृह में जिसे गोपुरम भी कहते है, मुख्य देव प्रतिमा होती है और उसके आस-पास अन्य देवी-देवता।
इन मंदिरों की कुछ विशिष्टता होती है। जैसे सभी प्रमुख मंदिरों के चारों ओर परिक्रमा पथ होता है जिसपर साल में कम से कम एक बार देवता की यात्रा निकलती है। हर मंदिर के उत्तर में जलस्रोत के रूप में विशाल तालाब जरूर होगा और उसमें लघुमंदिर भी । यह व्यवस्था तिरुपति तक में देखने को मिली। कन्याकुमारी से 15-16 किमी दूर सुचींद्रम में हम लोग जब दर्शन के लिए पहुंचे तो उस दिन दो जनवरी को अंजनेयार महोत्सव था। मुख्य मार्ग से न जाकर घूम कर जाना हुआ। रास्ते पर भीड़ थी लेकिन वाहनों की संख्या अधिक होने के बाद भी कहीं जाम जैसी स्थिति नहीं थी। मंदिर के आसपास मेला लगा था। दर्शनार्थियों की दो लाइनें घूम कर लगभग एक किमी लंबी थी। वहां की भीड़ देखकर लाइन में लगने की हिम्मत नहीं हुई। हम लोगों ने बाहर से ही दर्शन किया,परिक्रमा की, सरोवर में जलस्पर्श किया और लोगों की आस्था देख नतमस्तक हुए। वहां के मेले को देख कर एक चीज समझ में आई कि पूरे भारत के मेले एक जैसे होते हैं चाहे, उत्तर के हों या दक्षिण के। वही महिलाओं की सज्जा के सामान और घर गृहस्थी की चीजें। मिठाई की दूकानें और स्थानीय पक्वान। हम लोगों ने भी गन्ने का रस पीकर प्यास बुझाने के बाद ताजा बन रही जलेबी की मिठास का भी स्वाद लिया। वहां के मंदिर के बाहर लकड़ी के कई नक्काशीदार रथ खड़े थे। कुछ की मरम्मत की जा रही थी। शायद देवता की वार्षिक यात्रा की तैयारी हो रही थी। उनकी नक्काशी देखकर अपलक उसे हम लोग देख रहे थे जबकि स्थानीय लोगों के लिए वह सामान्य बात थी। लकड़ी पर की गई नक्काशी कारीगरों की कुशलता का प्रमाण दे रही थी। मैने और दिव्या ने कुछ फोटो खींचे जो यहां देखने को मिलेंगे।

तिरुपति के बालाजी की पूरे देश में तो बहुत मान्यता है ही,दक्षिण के लोग तो उनके दीवाने हैं। उनकी याद में हर शहर में उनके मंदिर हैं। कन्याकुमारी से कुछ किमी दूर भी समुद्र के एक दम सटा भव्य तिरुपति मंदिर है।वहां भीड़ तो कम थी लेकिन व्यवस्था एकदम आंध्र प्रदेश के तिरुपति की तरह। उसी तरह पूजा,उसी तरह खिचड़ी का प्रसाद। वहां के पुजारी ने भव्यदर्शन कराया और आरती दी। यह मंदिर बहुत ही सुव्यवस्थित है। समुद्र तट का दृश्य उसे और भव्यता प्रदान करता है। मेरे भाई चंद्रशेखर चैन्नई के जिसे इलाके में रहते हैं,वहां भी तिरुपति का मंदिर है। है तो वह छोटा लेकिन भव्यता में कोई कमी नहीं। 31 दिसंबर को वह खूब सजाया गया था। यह भी देखा के मंदिरों को केले के घार सहित और नारियल सहित उसके पौधे को तोरण की तरह लगाते हैं। पूरा प्रवेश द्वारा फलों और फूलों से सजा था। एक जनवरी को सुबह से ही दर्शनार्थियों की लाइन लग गई। मंदिरों के बाहर की लाइनें भी सुव्यवस्थित और बिना धक्के के आगे बढ़ रहीं थी। वहां भी लगभग एक किमी की लाइन लगी थी लेकिन कहीं भी आपा-धापी नहीं दिखी। दक्षिण के मंदिरों की एक विशेषता यह भी है कि गर्भगृह में बिजली नहीं होती और घी के दीपक की ही रोशनी रहती है। पूरा मंदिर चूंकि काले पत्थर का बना होता है और देव प्रतिमाएं भी इसलिए रोशनी कम रहने से दर्शन बहुत ध्यान से करना होता है। ध्यान भटकाने पर दर्शन नहीं हो पाता क्यों कि पुजारी लोगों को आगे बढ़ाते रहते हैं और भीड़ नहीं होने देते। यह व्यवस्था लगभग सभी मंदिरों में एक सी है।

एक बार और महत्वपूर्ण है। दक्षिण के लगभग सभी मंदिरों में ड्रेस कोड लागू है। महिलाएं साड़ी या सलवार सूट और पुरुष धोती कुर्ता, पाजामा कुर्ता पहन कर ही दर्शन कर पाते हैं। पुरुष पैंट तो पहन सकते हैं लेकिन जींस किसी तरह मान्य नहीं है। चाहे पुरुष हों या महिलाएं उन्हें यह कोड मानना ही होता है। मीनाक्षी मंदिर में प्रवेश के बाहर उन चीजों का चित्र दिखाया गया है जिसकी अंदर अनुमति नही है। उसमें हाफ नेकर, चेकदार लुंगी भी है। मेरे दोनों पोते हाफ पैंट पहने थे। जब मैने वहां तैनात पुलिस वालों से पूछा कि यह पहन कर अंदर जा सकते हैं कि नहीं तो वे बोले- नहीं। इसके ऊपर सफेद वेस्टी लपेट लीजिए। सामने पटरी पर एक महिला लुंगी बेच रही थी जिसे वहां प्राय: वेस्टी कहा जाता है। सौ-सौ रुपये की वह लुंगी ली जो अंगवस्त्रम जैसी थी,उसे पैंट पर लपेटा तभी अंदर जाने की अनुमति मिली। यही बात मैने तिरुपति में भी देखी। वहां तो हम सभी पाजामा -कुर्ता पहन कर ही गए थे।
मंदिरों में किसी तरह का प्रसाद आदि भी आप नहीं चढ़ा सकते। किसी को फूल आदि लिए भी नहीं देखा। छोटे मंदिरों में भले ही फूल आदि चढ़ा लें। बड़े मंदिरों में तो कतई नहीं। तिरुपति में लौटते समय शहर में पद्मावती देवी के मंदिर में दर्शन के लिए रुके तो बाहर कुछ महिलाएं कमल के फूल बेच रहीं थी। दिव्या और पत्नी ने फूल लिए । कुछ फूल तो लाइन में लगे लोग बाहर ही रख दे रहे थे और कुछ मंदिर के गर्भगृह के बाहर नीचे ड्योढ़ी पर रख दे रहे थे। जब हम लोग पहुंचे तो विनायक की पालकी निकल रही थी। बाद में पालकी ढोने वाले ने पान के पत्ते पर विनायक को चढ़ाया गया चंदन दिया और दक्षिणा मांगी।
तिरुपति और पद्मावती मंदिर में टिकट लेने वालों को एक एक लड्डू का प्रसाद नि:शुल्क मिलता है। और लड्डू लेने के लिए अलग से शुल्क देना होता है। तिरुपति में 60 रुपये और पद्मावती में 50 रुपये। लड्डू लेने चंद्रशेखर गए थे। बताया कि तिरुपति में 26 काऊंटरों पर लड्डू मिल रहे थे। एक एक काउंटार का पूरा हाल लड्डू से ही भरा था। खत्म हो जाने के बाद नए लड्डू आ जाते। पद्मावती में उससे कम व्यवस्था थी। दोनों जगह मंदिर प्रशासन ही लड्डू बांट रहा था। कहते हैं कि एक कारखाना रातों दिन लड्डू ही बनाता है।
पिछले कई सालों से लड्डू के स्वाद में कोई अंतर नहीं आया है। इलायची की सुगंध के साथ काजू का स्वाद भी उसमें मिलता है। पद्मावती मंदिर में जो लड्डू मिला उसका स्वाद अलग कुछ कपूर की गंध लिए हुआ था। खाने में दोनों के अलग स्वाद थे। मंदिरों के बाहर तीर्थयात्री अपनी पसंद के अन्य प्रसाद जैसे तरह तरह के रक्षा, रोली, देव प्रतिमाएं और पूजा से जुडी अन्य चीजें खरीद सकते हैं। तिरुपति में तो एक बाजार ही अलग से है। मीनाक्षी और पद्मावती मंदिर के बाहर भी अनेक दूकानें इन्हीं सब चीजों की हैं।
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