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लखनऊ की शक्सियत विक्टर नारायण विद्यान्त जी

उन्होंने अपनी विदेशी ‘रोल्स रायस’ कार एक मठ के स्वामी जी को दान कर दी। चाँदी के बर्तन, चाँदी के पलंग, महंगे वस्त्र सबका त्याग कर दिया। इसकी जगह बांस की चारपाई, अल्मुनियम के नाममात्र के बर्तन, दो जोड़ी साधारण वस्त्र अपने व अपनी पत्नी के लिए रखे।

विद्या के प्रति “विद्यांत” जी का समर्पण

पांच जनवरी को विद्यान्त हिन्दू पीजी कालेज में उनकी याद में एक सौ पच्चीसवाँ संस्थापक दिवस मनाया जाएगा

डॉ दिलीप अग्निहोत्री

विक्टर नारायण विद्यान्त त्यागी महापुरुष थे। एक समय उनके परिवार की गिनती लखनऊ के शीर्ष रईसों में होती थी। ब्रिटिश काल में उनके पिता और चाचा सरकारी कान्ट्रैक्टर थे। यहाँ का चारबाग स्टेशन, पक्का पुल, हजरतगंज का इलाहाबाद बैंक, सेन्ट्रल बैंक आदि भवनों का निर्माण उनके पिताजी ने ही कराया था।

5 जनवरी, 1895 में जन्मे विक्टर नारायण विद्यांत का बचपन, युवावस्था राजसी अन्दाज में बीता। चाँदी के बर्तनों में खाने, महंगी विदेशी कारों में घूमने की सुविधा उन्हें हासिल थी। लेकिन जीवन में ऐसा पल भी आया जब इन भौतिक सुविधाओं के प्रति उनकी आसक्ति नहीं रह गयी। उन्होंने अपनी विदेशी राल्स रायस कार एक मठ के स्वामी जी को दान कर दी। चाँदी के बर्तन, चाँदी के पलंग, महंगे वस्त्र सबका त्याग कर दिया। इसकी जगह बांस की चारपाई, अल्मुनियम के नाममात्र के बर्तन, दो जोड़ी साधारण वस्त्र अपने व अपनी पत्नी के लिए रखे। शेष सम्पत्ति विद्यान्त हिन्दू कालेज की स्थापना में लगा दी।


उन्होंने बनारस में एंग्लो बंगाली कालेज तथा लखनऊ में छह शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की। विद्यान्त हिन्दू प्राथमिक विद्यालय, विद्यान्त हिन्दू इंटर कालेज, विद्यान्त हिन्दू महाविद्यालय, शशि भूषण प्राथमिक विद्यालय, शशि भूषण बालिका इंटर कालेज और शशि भूषण बालिका महाविद्यालय उनके त्याग के प्रतीक के रूप में आज विद्यमान है। इसके अलावा राँची का अस्पताल, बंगाल के कृष्ण नगर का विद्यालय, अल्मोड़ा का टी.वी. सैनीटोरियम आदि संस्थाओं का वित्त पोषण वही करते थे। वह निर्धन, अनाथों की सहायता, बालिकाओं की शिक्षा, विवाह के लिए बड़ी मात्रा में धन खर्च करते थे। ब्रिटिश शासन ने उन्हें अवैतनिक मजिस्ट्रेट के पद से नवाजा था। विद्यान्त हिन्दू स्कूल की 1938 और डिग्री की स्थापना 1954 में की गयी थी।

वह सांस्कृतिक गतिविधियों में भी रुचि रखते थे। लखनऊ के कालीबाड़ी ट्रस्ट, बंगाली क्लब, श्री हरिसभा के वह आजीवन सदस्य रहे। वह अखिल भारतीय बंग साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष चुने गए।

1938 में विद्यान्त हिन्दू महाविद्यालय प्रांगण में दुर्गापूजा समारोह की शुरुआत की। यह लखनऊ की प्राचीनतम दुर्गा पूजा में से एक है।
पांच जनवरी को विद्यान्त हिन्दू पीजी कालेज में उनकी याद में एक सौ पच्चीसवाँ संस्थापक दिवस मनाया जाएगा।

वी एन विद्यान्त ने समाज के हित में अपनी पूरी चल अचल सम्पत्ति दान कर दी थी। उनका यह जीवन समाज के लिए प्रेरणादायक है। समाज व राष्ट्र के हित को सर्वोच्च मानना चाहिए। यही विचार देश को विकसित बनाएगा। शिक्षक के हाथ में तीन पीढ़ियां होती हैं ऐसे में शिक्षकों की नियुक्ति योग्यता और पारदर्शिता से होनी चाहिए ऐसा कार्य वही कर सकता है जो अपनी जगह समाज और देश के हित को महत्व देता है। वीएन विद्यान्त जी का जीवन इसी की प्रेरणा देता है।

विक्टर नारायण विद्यांत के पिता ने लखनऊ के प्रसिद्ध चारबाग स्टेशन का निर्माण कराया था। लेकिन विद्यांत जी के जीवन का उद्देश्य अलग था। वह अपने लिए नहीं समाज के लिए समर्पित रहना चाहते थे। इन्होंने अपनी व पैतृक सम्पत्ति से लखनऊ को छह शिक्षण संस्थाओं की सौगात दी।
भौतिक सुविधाओं की लालसा सामान्य प्रवत्ति होती है। यह जानते हुए भी उन्होंने अपनी सम्पदा समाज के कल्याण हेतु समर्पित कर दी, सब कुछ दान में दे दिया, और स्वयं अभाव में ही प्रभाव का अनुभव करने लगे। लखनऊ के विक्टर नारायण विद्यांत ऐसे ही महापुरुष और समाजसेवी थे। लखनऊ की पहचान से उनके परिवार का नाम जुड़ा है। प्रसिद्ध चारबाग रेलवे स्टेशन भवन का निर्माण उनके पिता और चाचा ने किया था। ब्रिटिश काल में वह सरकारी कॉन्ट्रेक्टर थे। गोमती का भव्य पक्का पुल, आदि अनेक निर्माण कार्य किये। विक्टर नारायण का भी जीवन वैभव से पूर्ण था। विदेशी वाहन, चांदी के बर्तन, सेवक , हवेली आदि सभी सुविधाएं थी। लेकिन एक समय ऐसा भी आया कि उन्हें इस सबसे विरक्ति हो गई। उन्होंने अपनी समूर्ण सम्पत्ति विद्यांत सहित अनेक विद्यालयों के खोलने में लगा दी। अपने लिए जीनव की न्यूनतम जरूरतों के अलावा कुछ नहीं रखा।


विक्टर नारायण के पितामह राम गोपाल विद्या कोलकत्ता में रहते थे। उनकी विद्वता के लिए उन्हें अनंत वागेश्वरी विद्यांत की उपाधि से सम्मानित किया गया था, तभी से यह उनके परिवार का उपनाम हो गया था। उनके दोनों पुत्रों ने व्यवसाय के लिए लखनऊ को चुना था। फिर यहीं के होकर रह गए। बीसवीं शताब्दी के पहले भाग के दौरान चारबाग रेलवे स्टेशन, पक्का पुल, इलाहाबाद बैंक और हजरतगंज में सेंट्रल बैंक भवनों आदि के रूप में इसकी वास्तुकला को आकार दिया। राम गोपाल जी के पुत्र हरि प्रसाद विद्यांत ने अपने भाई के साथ मिलकर यह सब निर्माण कार्य किया था। उनके एकमात्र पुत्र विक्टर नारायण विद्यांत थे। पांच जनवरी अठारह सौ पच्चासी में उनका जन्म हुआ था।
उन्होंने एमएससी, एलएलबी की डिग्री उच्च श्रेणी में प्राप्त की। उन्हें शासन ने मानद मजिस्ट्रेट का पद दिया था। विक्टर नारायण ने उन्नीस सौ अड़तीस में विद्यांत हिंदू स्कूल की स्थापना की थी। उन्होंने बंगाल के बाहर एकमात्र बंगाली राजा राजा दक्षिणा रंजन मुखर्जी और नवाब वाजिद अली शाह के पिता नवाज अमजद अली शाह के उत्तराधिकारियों से परिसर को खरीदा था। इसके बाद उन्निया सौ चवालीस में हाई स्कूल में और इसके एक वर्ष बाद इंटरमीडिएट कॉलेज की स्थापना हुई। उन्नीस सौ चौवन में, उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से संबद्ध डिग्री कॉलेज के रूप में बैचलर ऑफ आर्ट्स पाठ्यक्रम शुरू किया। वर्ष उन्नीस सौ चौहत्तर में, बैचलर ऑफ कॉमर्स कोर्स शुरू किया गया था। दो हजार छह में, कॉलेज को मास्टर ऑफ आर्ट्स इतिहास और मास्टर ऑफ कॉमर्स पाठ्यक्रमों के उद्घाटन के साथ पोस्ट ग्रेजुएट स्तर पर अपग्रेड किया गया था।
विक्टर नारायण विद्यांत ने अपने मौसा शशिभूषण जी की स्मृति में उन्हीं के नाम पर विद्यालय की स्थापना की। वह बनारस एंग्लो बंगाली कालेज, अस्पताल रांची, बंगाल में कृष्णा नगर विद्यालय, अल्मोड़ा के टीबी सेनेटोरियम आदि को सतत वित्त पोषण करते रहे।
लखनऊ के कालीबाड़ी ट्रस्ट, बंगाली क्लब, हारिसभा संस्था के सहयोगी रहे। वह अखिल भारतीय बंग साहित्य सम्मेलन के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी थे। उन्नीस सौ अड़तीस में विद्यांत कालेज में उन्होंने वार्षिक दुर्गा पूजा का आयोजन शुरू किया। आज इसकी प्रसिद्धि दूर दूर तक है।

एक समय भारत विश्व गुरु था। विश्व के अन्य देशों से लोग यहाँ ज्ञान प्राप्त करने आते थे। अंग्रेजों ने हमारी शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त किया। आजादी के आन्दोलन में जहाँ अंग्रेजों को हटाने का प्रयास हो रहा था, वहीं देश के विभिन्न हिस्सों में अनेक महापुरूष शिक्षा के प्रसार में लगे थे जिससे भारतीय समाज को जागरूक बनाया जा सके। विद्यान्त जी ऐसे लोगों में थे।

भारत को पुनः विश्व गुरु बनाने का प्रयास करना होगा। आगे बढ़ने के लिए पहला कदम खुद ही उठाना पड़ता है बाद में अन्य लोगों का भी सहयोग मिलता है। सबके सहयोग से शिक्षा के स्तर को बढ़ाया जा सकता है। विद्यार्थी ही देश का भविष्य है। शिक्षित होने के साथ ही उन्हें राष्ट्रीयता व कर्तव्य पालन के विचार से ओत प्रोत होना चाहिए।

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