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अपने आप में एक फिल्म संस्थान थे वी शान्ताराम

 

 वी. शांताराम और ‘दो आँखें बारह हाथ’

इसरार

इन्सान के सामने हमेशा दो रस्ते होते हैं। एक आसान, दूसरा मुश्किल। वह अक्सर आसान रास्ता चुन लेता है। वह सजा देना चुन लेता है, सुधारे जाने को नहीं चुनता। सजा देना आसान है सुधारना कठिन। सजा देने वाला अंदर से कमजोर होता है। वह समाज हो या व्यक्ति। उसमें आत्मविश्वास की कमी होती है। अपनी जिम्मेदारियों से बचने वाले ऐसा करते हैं। उन्हें लगता है कि दोषी कभी सुधर नहीं सकते हैं।

परन्तु मजबूत, दृढ़ निश्चई, कर्तव्य और समाज के प्रति इमानदार ऐसा नहीं करते हैं। वे आसान रास्ता नहीं चुनते हैं। आज जबकि लिंचिंग की घटनाएं लगातार हो रही हैं। लोग छोटी सी बात, किसी अफवाह या शक़ के आधार पर लोगो को पीट-पीटकर जान से मार दे रहे हैं। ऐसे में 1957 में एक फिल्म आई फिल्म “दो आँखे बारह हाथ” आज भी प्रासंगिक है। इसे महान फ़िल्मकार वी. शांताराम ने निर्देशित किया था।

यह फिल्म विश्व के किसी भी भाषा में बनी फिल्मों में सर्वकालिक महान फिल्म है। हांलाकि जब भी विश्व के 100 महानतम फिल्मों की सूची बनती है उसमें इसको स्थान नहीं दिया जाता है। परन्तु यह फिल्म किसी सूची का मोहताज नहीं। विश्व में कला के किसी भी रूप में इतना महान कथानक विरले ही होगा।

कोई भी कला कितनी महत्वपूर्ण है यह इस बात से तय होता है कि उसका कथानक कितना महत्वपूर्ण है। कला में कौशल जरूरी है, मगर उतनी ही जरूरी है दृष्टि। यह दृष्टि कहाँ से आती है? यह दृष्टि आती मानवता में असीम विश्वास से, खुद में भरोसे से। इस विश्वास से की हम सब के भीतर एक इंसान है। और यदि वह बहक गया है तो, सुधारा जा सकता है। उसे सही रस्ते पर लाया जा सकता है। उसके अंदर भी सभी भावनाएं इंसानों वाली ही होती हैं। उन्हें मौका दिया जाए और उन पर विश्वास किया जाए तो परिणाम सकारात्मक होगा। इसी दर्शन पर आधारित है दो आँखें बारह हाथ।

फिल्म में जेलर जिसकी भूमिका खुद वी. शांताराम ने ही निभाई है, अलग-अलग कत्ल के इल्जाम में सजा काट रहे कैदियों को सुधारने का जिम्मा इस शर्त पर उठाता है कि यदि वह असफल रहा तो उसका सरकार सबकुछ जप्त कर लेगी।

यह फिल्म मोनोक्रोम में बनी है। जेलर कैदियों को एक खुली जगह ले जाता है। पहली ही रात जब कैदी सोने जाते हैं तो जेलर उनसे कहता है कि यहाँ न कोई ताला है और न दरवाजा। उसे उन कैदियों पर भरोसा है। कैदियों के प्रति इस तरह का व्यवाहर जेलर की वह इमेज बना देता है जो फिल्म के शीर्षक में है। जिसे आंख के प्रतीकात्मक रूप में प्रयोग किया गया है। आंख यहाँ ईमानदारी, भरोसे और विश्वास का प्रतीक बन जाती है।
तमाम अंतरविरोधो के बावजूद जेलर इनको सकरात्मक दिशा देने में न सफल रहता है बल्कि आत्मनिर्भर भी बनाता है। इसके लिए वह अपनी जान तक दे देता है।
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1957 में बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में इस फ़िल्म को सिल्वर बेयर मिला था। 1958 चार्ली चैपलिन के नेतृत्व वाली जूरी ने इसे ‘बेस्ट फिल्म ऑफ़ द इयर’ का ख़िताब दिया था।

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