
यह सम्मान संस्कृत साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने के लिए दिया जाता है और इसके तहत एक लाख रुपए, प्रशस्ति पत्र तथा प्रतीक चिन्ह प्रदान किया गया।
भोपाल।
मध्य प्रदेश की संस्कृति मंत्री डा विजय लक्ष्मी साधो
ने संस्कृत साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए प्रो भागीरथ प्रसाद त्रिपाठी ‘वागीश शास्त्री ‘ को भारत भवन, भोपाल में मध्यप्रदेश सरकार के शिखर सम्मान से सम्मानित किया । इस सम्मान के तहत एक लाख रुपये की राशि, प्रशस्ति पत्र और अंग वस्त्र दिया गया।

मध्यप्रदेश शासन ने ‘ शिखर सम्मान’ हेतु विश्वप्रसिद्ध संस्कृत विद्वान प्रो भागीरथ प्रसाद त्रिपाठी वागीश शास्त्री के नाम की घोषणा की है। यह सम्मान संस्कृत साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने के लिए दिया जाता है और इसके तहत एक लाख रुपए, प्रशस्ति पत्र तथा प्रतीक चिन्ह प्रदान किया गया।

वाग्योग चेतनापीठम के संस्थापक और संस्कृत-योग-आयुर्वेद-प्राच्यविद्या आदि के संवर्धन की सार्वभौम संस्था ‘’स्वस्तिवाचनम्’’ के ब्रांड अम्बेस्डर ‘‘वागीश शास्त्री’ के उपनाम से विख्यात संस्कृतभाषा, योग, तंत्र और भाषा शास्त्र के अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त आचार्य प्रो. भागीरथ प्रसाद त्रिपाठी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संस्कृत साहित्यकार, पाणिनीय वैयाकरण, भाषावैज्ञानिक, योगी और तंत्रवेत्ता के रूप में प्रसिद्ध हैं ।

86 वर्षीय प्रो. त्रिपाठी का जन्म मध्य प्रदेश के सागर जनपद के बिलइया गांव में हुआ था । इन्होंने १९५९ ई में वाराणसी के ‘टीकमणी संस्कृत महाविद्यालय’ में बतौर अध्यापक कार्य आरंभ किया था ।
भारत सरकार ने साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए आचार्य प्रो. भागीरथ प्रसाद त्रिपाठी ‘‘वागीश शास्त्री’’ को वर्ष २०१८ के ‘’पद्मश्री’’ सम्मान से सम्मानित किया गया था।

प्रो. त्रिपाठी को वर्ष २०१३ में भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा संस्कृत भाषा में उत्कृष्ट कार्य करने हेतु ‘’प्रेसिडेंसिअल सर्टिफिकेट ऑफ़ ऑनर” उत्तर प्रदेश शासन द्वारा यशभारती और विश्वभारती सहित देश विदेश के अनेकों सम्मानों से विभूषित किया जा चुका का है।
आपने संस्कृत की नवीन प्रणाली ‘ संस्कृत सीखने की सरल एवं वैज्ञानिक विधि की है जिसके कारण कोई भी व्यक्ति बिना रटे हुए संस्कृत 180 घंटे मैं सीख सकता है।
उन्होंने वक्तव्य देते हुए बताया कि यह अलंकरण संस्कृत जगत को और बाबा विश्वनाथ को दिया जा रहा है जिनकी प्रेरणा से मैं इस 86 वर्ष की अवस्था मैं भी लगातार रचनाएँ लिख रहा हूँ।

इस समय संस्कृत जगत को उद्धार की आवश्यकता है सरकार को चाहिए कि पुराणी पांडुलिपियों जो प्राचीन धरोहर है उनको सम्पादित कर प्रकाशित करवाए संस्कृत को द्वितीय भाषा का दर्जा दिलाने का प्रयास करे। संस्कृत के नीतिवचनों को प्रत्येक चौराहे पर लिखवाये मार्ग पट्टिका पे हिंदी इंग्लिश के अलावा संस्कृत मैं भी उल्लेख किया जाये। संस्कृत के छात्रों और शिक्षकों को आधुनिक विषयों को भी पढ़ाया जाये शास्त्रार्थ की धूमिल परंपरा को पुनर्जीवित करने का प्रयास करे।
संस्कृत भाषा का प्रभाव ईरान, लैटिन भाषाओं संग इंडो-यूरोपियन पर भी दिखता है। इस समय इतिहासकार लिखते नहीं बल्कि समितियां बनाते हैं। आर्यों की उत्पत्ति भारत मैं हुई और यहीं से विश्व के अन्य देशों मैं फैली थी परन्तु छात्रों को पाठ्यपुस्तकों के माध्यम से गलत बात पढाई जा रही है.

राजस्थान संस्कृत अकादमी की ओर से उन्हें ‘’बाणभट्ट पुरस्कार’’ से नवाजा जा चुका है । करीब ३० साल तक संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय को अपनी अप्रतिम संस्कृत सेवा देने वाले प्रो. त्रिपाठी को १९८२ में ‘’काशी पंडित परिद्’’ की ओर से ‘’महामहोपाध्याय’’ की पदवी से अलंकृत किया जा चुका है ।
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