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‘वैदिक धर्म का सनातन स्वरूप’ पर प्रयागराज में व्याख्यान

इलाहाबाद संग्रहालय में आज 27 अक्टूबर 2022 को संग्रहालय, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, वाराणसी और आचार्य क्षेत्रेशचन्द्र चट्टोपाध्याय भारत विद्यानुशीलन केंद्र, प्रयागराज के संयुक्त तत्वावधान में भारतीय प्राच्य विद्या के प्रतीक पुरुष पण्डित क्षेत्रेषचन्द्र चट्टोपाध्याय के 126 वीं जयंती के अवसर पर स्मृति व्याख्यान का आयोजन ‘ वैदिक धर्म का सनातन स्वरूप ‘ विषय पर प्रोफेसर हृदयरंजन शर्मा, पूर्व अध्यक्ष वेद विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी का व्याख्यान आयोजित किया गया।

सत्र की अध्यक्षता प्रोफेसर कमलेश दत्त त्रिपाठी, कुलाधिपति महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा ने किया।

दीप प्रज्जवलन, पुष्पांजलि व सौदामिनी संस्कृत महाविद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा मंगलाचरण से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। इसके पश्चात प्रोफेसर विजय शंकर शुक्ल, निदेशक आई.जी.एन.सी.ए, वाराणसी ने आयोजक संस्थाओं की तरफ से सभाध्यक्ष, मुख्य वक्ता सहित सभी उपस्थित सुधी जनों का स्वागत करते हुए उन्होंने इस स्मारक व्याख्यान श्रृंखला के आयोजन उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि 19 वीं 20 वीं शताब्दी में जिन्होंने प्राच्यविद्या के संक्रमण प्रणाली द्वारा योग्यतम शिष्यों के माध्यम से आगे बढ़ाया, ऐसे महामनीषी के सांस्कृतिक अवदानो का स्मरण ही इस आयोजन का मूल उद्देश्य है।

आचार्य चट्टोपाध्याय पर केंद्रित और आई.जी.एन.सी.ए वाराणसी केन्द्र द्वारा प्रकाशित पुस्तिका के लोकार्पण के पश्चात मुख्य वक्ता प्रो. हृदयरंजन शर्मा ने कहा कि वेद विश्व के प्राचीनतम प्रमाणिक ग्रंथ हैं जो भाषा विज्ञान के आधार पर स्पष्ट हो चुका है।

उन्होंने वेदों की अपौरुषेयता को ध्वन्यात्मक रूप में जो गुरु शिष्य परंपरा से आगे बढ़ी और मौन संवाद से संशय दूर होने की प्रक्रिया से समझाया।अलौकिक उपाय को बताने वाले वेद शब्द प्रमाण हैं। धर्म की परिभाषा को स्पष्ट करते हुए आचार्य शर्मा ने कहा कि जो हम प्राण शक्ति धारण करते हैं वह धर्म है पूजा पाठ उसके वाह्य साधन हैं और वैदिक धर्म सर्व कल्याण की कामना के साथ सनातन, शास्वत व श्रेष्ठ है।

प्रोफेसर एम.सी.चट्टोपाध्याय ने इस अवसर पर परम पूज्य पिता जी आचार्य चट्टोपाध्याय से जुड़ी सुखद स्मृतियों को साझा किया।

अध्यक्षीय संबोधन में प्रोफेसर कमलेश दत्त त्रिपाठी ने अपने गुरु आचार्य चट्टोपाध्याय को नमन करते इस सुन्दर आयोजन के लिए तीनों संस्थानों को बधाई देते हुए कहा कि मेरे गुरु जी नवीनतम पश्चिमी पांडित्य और गूढ़तम प्राच्यविद्या के अद्भुत समन्वय थे। उन्होंने कहा कि पारंपरिक वैदिक धर्म की पिछले सौ दो सौ साल में जो दुर्व्याख्या से मुर्छित है उसके उद्धार की आशा ऐसे आयोजनों में दिखाई देती है।

 संग्रहालय की तरफ से औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन संग्रहपाल डॉ ओंकार आ वानखेड़े ने और संचालन डॉ राजेश मिश्र ने किया।इस अवसर पर प्रो.मानस मुकुल दास,प्रो.गौरी चट्टोपाध्याय,प्रो.अनामिका राय,प्रो .आर.सी.त्रिपाठी,प्रो.राजेन्द्र कुमार, डॉ. श्री रंजन शुक्ल, डॉ शांति चौधरी, डॉ मधूरानी शुक्ला,प्रो.ईश्वर शरण विश्वकर्मा, प्रो.मृदुला त्रिपाठी, प्रो.एम.एन.सिंह, प्रो.एस.के.सेठ, श्री राघवेन्द्र सिंह, डॉ.अजय कुमार, डॉ वामन वानखेड़े, डॉ संजू मिश्रा सहित बड़ी संख्या में विद्यानुरागी उपस्थित रहे।

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