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“हर भारतीय विशेष है और हर भारतीय वीआईपी है”

लोकतंत्र तभी फलता-फूलता है जब सार्वजनिक पद को विशेषाधिकार नहीं, जिम्मेदारी माना जाए: उपराष्ट्रपति

(डी.पी. मिश्रा)

नई दिल्ली, 24 जून।

उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने बुधवार को कहा कि लोकतंत्र तभी फलता-फूलता है जब सार्वजनिक पद को विशेषाधिकार के बजाय जिम्मेदारी के रूप में देखा जाए। उन्होंने कहा कि वीआईपी संस्कृति का विषय अत्यंत संवेदनशील है और इस पर व्यापक बहस एवं चर्चा की आवश्यकता है।

उपराष्ट्रपति भवन में आयोजित एक समारोह में पूर्व सांसद श्री नाबाम रेबिया द्वारा लिखित तथा श्री संदीप कुमार द्वारा सह-लिखित पुस्तक “VIP Culture in India: Power, Privilege and the Distance from Democracy” का विमोचन करते हुए राधाकृष्णन ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के उस कथन को याद किया कि “हर भारतीय विशेष है और हर भारतीय वीआईपी है।”

समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि प्रत्यक्ष विशेषाधिकार और पक्षपातपूर्ण व्यवहार की धारणा, दोनों ही जनता के विश्वास को कमजोर कर सकती हैं तथा नागरिकों और संस्थाओं के बीच दूरी पैदा कर सकती हैं।

पुस्तक के विषय को “अत्यंत मार्मिक” बताते हुए उन्होंने कहा कि यह विषय सत्ता, विशेषाधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों के संबंध में सार्थक बहस और विमर्श को जन्म देगा।

इस अवसर पर लेखक नाबाम रेबिया ने स्पष्ट किया कि यह पुस्तक वीआईपी संस्कृति के विरोध में नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य यह बताना है कि सार्वजनिक पदों से जुड़े विशेषाधिकार जनता के हितों, जवाबदेही और लोकतांत्रिक मूल्यों की कीमत पर नहीं होने चाहिए।

सह-लेखक संदीप कुमार ने कहा कि लोकतंत्र में सार्वजनिक पदों का मूल उद्देश्य लोगों की सेवा करना है, न कि विशेष सुविधाओं का उपभोग करना। उन्होंने कहा कि पुस्तक इस बात की पड़ताल करती है कि नागरिकों और संस्थाओं के बीच दूरी कम कर सार्वजनिक सेवा की भावना को किस प्रकार मजबूत बनाया जा सकता है।

यह पुस्तक भारत में वीआईपी संस्कृति के विकास, शासन व्यवस्था, जनधारणा और लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली पर उसके प्रभावों का विश्लेषण प्रस्तुत करती है।

समारोह में अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री नाबाम तुकी, पूर्व सांसद श्री डब्ल्यू. आर. खारलुखी सहित विभिन्न क्षेत्रों की अनेक प्रतिष्ठित हस्तियां उपस्थित थीं।

वीरेंद्र मिश्र: दिल्ली ब्यूरो

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