
विभूति नारायण राय, IPS
लेखक उत्तर प्रदेश में पुलिस महानिदेशक रहे हैं और महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति भी रह चुके हैं

इन आँखिन देखी ‘-36,
“पुलिस प्रशिक्षण को महत्व देने का समय”

पिछले दिनो चौबीस घंटो मे तीन अलग अलग ओहदों के पुलिस कर्मियों की अपराधियों द्वारा वाहनों से कुचल कर की गयी हत्याओं को क्या महज़ संयोग माना जाना चाहिये ? यह प्रश्न इस लिये और महत्वपूर्ण हो जाता है कि ये हत्यायें देश के तीन राज्यों मे हुयी जिनमे तीन अलग दलों की सरकारें हैं । शायद यही कारण था कि इन पर कोई राजनैतिक बयानबाज़ी नही हुयी पर यह भी नही हुआ कि इन्हे लेकर विधायी सदनों या मीडिया मे कोई गंभीर बहस ही हुई हो ।
हरियाणा मे नूह के निकट पुलिस उपाधीक्षक सुरेंद्र सिंह बिश्नोई , झारखंड की राजधानी राँची मे एक महिला सब इन्सपेक्टर संध्या टोपनो और गुजरात के आनंद ज़िले मे कांस्टेबल किरण राज ड्यूटी के दौरान मारे गये । तीनो दुर्घटनाओं की परिस्थितियाँ एक जैसी ही थीं । तीनो मे अपराधी तेज़ रफ़्तार वाहनों मे भागने की कोशिश कर रहे थे , तीनो वारदातों मे मौक़े पर मौजूद पुलिस अधिकारियों ने उन्हे रोकने का प्रयास किया और तीनो ही जगह ड्राइविंग सीट पर बैठे दुस्साहसिक चालकों ने गाड़ी की रफ़्तार बढ़ाकर उन्हे कुचल दिया। एक बात स्पष्ट है कि ज़ाहिरा तौर पर इन घटनाओं मे आपस मे कोई सम्बंध न होते हुये भी समाजशास्त्र के किसी गंभीर विद्यार्थी को इनमे बड़े दिलचस्प अंतरसम्बंध मिल सकते हैं ।
सबसे पहले तो हमे पिछले सात दशकों मे पुलिस और जन सामान्य के रिश्तों मे आये बदलाव को समझना होगा । आज़ादी के पहले पुलिस और जनता के बीच के रिश्ते कुछ वैसे ही थे जिनकी किसी औपनिवेशिक समाज मे अपेक्षा की जा सकती है । उन दिनो हिंदी भाषी इलाक़ों की लोककथाओं या लोकगीतों मे एक मुहावरा जनता की ज़ुबान पर चढ़ा हुआ मिलता है जिसके अनुसार गाँव मे एक ख़ाकी पगड़ी दिखते ही पूरा गाँव ख़ाली हो जाता था और लोग आस पास के जंगलो मे भाग जाते थे । बाद के कुछ दशकों तक भी इस स्थिति मे कोई उल्लेखनीय बुनियादी फ़र्क़ नही पड़ा । स्वाभाविक था कि एक नये नये बन रहे लोकतांत्रिक समाज मे जनता बहुत दिनो तक पुलिस से अपने ऐसे रिश्ते नही स्वीकार कर सकती थी । परिवर्तन आने शुरू हुये पर बहुत धीरे धीरे । मैंने उत्तर प्रदेश के एक मुख्यमंत्री को ऐलानिया कहते सुना है कि पुलिस का इकबाल तो उसकी हनक़ से क़ायम होता है । यह वही हनक़ है जिसके चलते जनता गाँव छोड़ कर जंगलों मे भाग जाती थी । यह अलग बात है कि लोकतंत्र के चलते सार्वजनिक रूप से इस सोच का समर्थन करने वाले कम होते गये हैं ।
इन दुर्घटनाओं के पीछे सबसे पहले हमे इसी मानसिकता को समझना होगा । हमारा औसत पुलिसकर्मी क्या अभी भी यह नही सोचता है कि उसके तन पर ख़ाकी देखते ही अपराधी जड़ हो जायेगा और अपना वाहन बंद कर देगा ? वह भूल जाता है कि अब यथार्थ बदल चुका है । वाहनों के इंजन ज़्यादा ताकतवर हैं और उन्हे चलाने वाले मनुष्य के मन से पुलिस का पारम्परिक ख़ौफ़ ख़त्म हो चुका है । तीनो घटनाओं मे अतिरिक्त आत्मविश्वास से लबरेज़ पुलिसकर्मी इसी भ्रम मे मारे गये कि उनके इशारा करते ही वाहन रुक जायेंगे ।
किसी वर्दीधारी संगठन मे , जिसे हथियार दिये गये हैं , प्रशिक्षण सबसे महत्वपूर्ण होता है । सेना मे तो एक उद्धरण हर यूनिट की दीवाल पर लिखा दिखता है जिसका संदेश है कि प्रशिक्षण क्षेत्र मे जितना पसीना बहाया जायेगा , युद्ध क्षेत्र मे उतना ही खून बचेगा । दुर्भाग्य से पुलिस मे सबसे उपेक्षित क्षेत्र प्रशिक्षण ही है । ऊपर वर्णित तीनो घटनाओं को यदि गहराई से अन्वेषण किया जाय तो सिखलाई की कमियाँ बड़ी स्पष्ट दिखेंगी और बिना सही सिखलाई के सशस्त्र बलों की कोई बड़ी या छोटी टुकड़ी किसी भीड़ से बेहतर नही होती । पुलिस और क़ानून व्यवस्था भारतीय संविधान के अनुसार राज्यों के अधिकार क्षेत्र मे आने वाला विषय है । बिना अपवाद राज्यों मे अलग अलग दलों की सरकारें आती जाती रही हैं पर यह भी बिना अपवाद कहा जा सकता है कि किसी भी दल के लिये पुलिस प्रशिक्षण महत्वपूर्ण नही रहा है । अमूमन प्रशिक्षण केंद्रो पर बतौर सज़ा नियुक्तियाँ की जाती हैं और बिना रुचि वाले अधिकांश प्रशिक्षक अपने प्रशिक्षुओं को कितना पेशेवर बना पाते होंगे , इसकी कल्पना ही की जा सकती है ।
मानक संचालन प्रक्रिया या एसओपी ( स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रसीजर ), एक दूसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र है जिसका इन तीनो घटनाओं मे उल्लंघन हुआ दीखता है । एसओपी किसी संघटित और अनुशासित समूह के लिये इस लिये भी आवश्यक है कि उसकी कोई भी कार्यवाही शून्य मे नही होती । हर क्रिया पर समूह के किसी अन्य सदस्य को भी हरकत करनी होती है और इसी लिये एक एसओपी बनाई जाती है । यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इन घटनाओं मे इसका पालन किया गया है । हरियाणा के किसी भी ज़िले मे अवैध खनन पर छापा मारने के पहले पुलिस कंट्रोल रूम या किसी उच्चाधिकारी को सूचित करना एसओपी का हिस्सा होगा ताकि आवश्यकता पड़ने पर मदद के लिये आवश्यक बल भेजे जा सकें । जितनी जानकरियाँ सार्वजनिक हुई हैं उनसे तो लगता नही है कि इस ज़रूरी प्रक्रिया का पालन किया गया होगा । खबरों के अनुसार पुलिस उपाधीक्षक सुरेंद्र सिंह बिश्नोई अवैध खनन की सूचना मिलते ही अपने कुछ सहकर्मियों के साथ घटनास्थल पर पँहूच गये । बिल्कुल ऐसे ही महिला सब इंस्पेक्टर संध्या टोपनो ने पशु तस्करी के आरोपी ट्रक को अकेले दम पर रोकने का प्रयास किया । कांस्टेबल किरण राज ने राजस्थान नम्बर प्लेट वाली ट्रक को क्यों रोकना चाहा , यह स्पष्ट नही है पर उन्होंने भी पेशेवर आचरण का उल्लंघन ही किया है । मुमकिन है कि समय की कमी या गोपनीयता की वजह से अभाग्यशाली पुलिसकर्मियों ने ज़रूरी सावधानियाँ न बरती हों पर इन सब का औचित्य तो विस्तृत जाँच से ही पता चलेगा । इतना तो प्रथम दृष्टया साफ़ है कि सामान्य सी एसओपी का पालन किसी मे नही किया गया ।
किसी भी साल के अख़बारों को छानें तो हमे थोड़े थोड़े अंतराल के बाद पुलिसकर्मियों की इन्ही परिस्थितियों मे अस्वाभाविक मृत्यु की खबरें मिलती रहती हैं, पर एक छोटी सी अवधि मे अलग अलग प्रदेशों मे तीन पुलिसकर्मियों की हत्या विचलित करने वाली है । ये घटनायें पुलिस प्रशिक्षण की ख़ामियों और पुलिस को बेहतर पेशेवर संस्था बनाने की ज़रूरत को रेखांकित करती हैं ।
अभी तक तो इन दुर्घटनाओं पर कोई गम्भीर बहस होती दिख नही रही है । क्या नागरिकों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी मे सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली संस्था पुलिस मे घटी इतनी बड़ी दुर्घटनाओं मे नागरिकों की इतनी कम दिलचस्पी चिंताजनक नही है ? या आम नागरिक पुलिस वालों की ज़िंदगी को इतना महत्व भी नही देते कि चौबीस घंटो मे अकाल काल कवलित हुई तीन बेश क़ीमती जिंदगियों के लिये कुछ देर ठहर कर सोचें कि ऐसा क्यों कर हुआ और ऐसे उपाय करें कि भविष्य मे इसकी पुनरावृत्ति न हो ।
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