
प्रयागराज।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय, राष्ट्रीय सेवा योजना द्वारा आयोजित “जल संरक्षण : चुनौतियां एवं समाधान” विषयक वेबीनार में बोलते हुए वेस्ट बंगाल यूनिवर्सिटी आफ टीचर्स ट्रेंनिंग, एजुकेशन प्लैनिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन, पश्चिम बंगाल की कुलपति प्रोफेसर सोमा बंदोपाध्याय ने कहा कि जल के सिंचन से ही पृथ्वी सुजलाम, सुफलाम होती है। जल के स्पर्श से वह धन्य होती है। बिनु पानी सब सून है। इसलिए सरकार से ज्यादा हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम जल संरक्षण के लिए अपनी व्यापक भूमिका का निर्वाह करें।

उन्होंने कहा कि 1952 के मुकाबले 35 परसेंट जल स्रोत जलहीन हो गए हैं। देश के 5723 ब्लॉकों में से 840 ब्लॉक जल की दृष्टि से डार्क जोन में है। महानगरों में 1 घंटे से अधिक आज जलापूर्ति हम नहीं कर पा रहे हैं। उसके बावजूद भी हम जगह-जगह नल खुला छोड़ देते हैं। नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी का संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि 3076 लीटर प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता आज निरंतर निम्नस्तर को प्राप्त होती जा रही है। अगले 15 वर्षों में 180 करोड़ से अधिक लोग ऐसे देशों में रह रहे होंगे जहां जल या तो खत्म हो जाएगा या समाप्तप्राय होगा। आज 100 में से 6 व्यक्ति जल संकट से जूझ रहे हैं, शीघ्र ही यहां आंकड़ा भयावह रूप ले लेगा।
उन्होंने स्टीमन की पुस्तक ‘वाटर‘ का हवाला देते हुए कहा कि इस पुस्तक में स्टीमन महोदय ने अगला विश्व युद्ध जल के लिए होने की बात कही है। अब यह सत्य प्रतीत होता दिख रहा है। उन्होंने कुछ वैयक्तिक मार्ग बताते हुए कहा कि हमें पानी का गिलास जूठा करने से बचना चाहिए ताकि उसके धोने में होने वाली जल की बर्बादी रुक सके। हमें बाल्टी और मग से स्नान करना चाहिए न कि शावर से। कपड़े धोने के लिए बार-बार पानी बाल्टी में नहीं बदलना चाहिए। लोगों को जरूरत भर का पीने का पानी देना चाहिए। मंजन नल खुला छोड़कर नहीं वरन ग्लास में जल लेकर करना चाहिए। इन छोटे-छोटे उपायों से भी हम दैनंदिन जीवन में जल की बर्बादी रोक सकते हैं।

वेबीनार में बोलते हुए महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, बिहार के कुलपति प्रोफेसर संजीव कुमार शर्मा जी ने जल को दैवत्त्व से युक्त बताते हुए कहा कि इसे बाजार के नियंत्रण से भी मुक्त करने की आवश्यकता है। उन्होंने अगला विश्वयुद्ध जल पर न हो इसके लिए अभी से तैयारी करने की आवश्यकता पर जोर दिया। पहले भारत जलाशयों का देश था, जलाशयों के अधिग्रहण और उनकी न्यूनता ने जल को घरों तक पाइप लाइन से पहुंचाना प्रारंभ किया। आज हम आर.ओ. यंत्र तक पहुंच गए हैं। जब तक हम समाज, प्रकृति, परिवेश वर्तमान और भविष्य से तादात्म्य स्थापित नहीं करेंगे, तादात्म्यवादी अपनी संस्कृति का अनुकरण नहीं करेंगे तब तक सर्वकल्याण का भाव समेटे जल निश्चित रूप से इसी प्रकार के संकट अवस्था की तरफ बढ़ता रहेगा। यह पृथ्वी, इसके पंचभूत सबके लिए कल्याणकारी हों, यही हमारी जीवन पद्धति है। इस पर पुनः विचार मंथन और इसके अनुसरण की आज आवश्यकता है।

वेबीनार के आयोजक, इलाहाबाद विश्वविद्यालय राष्ट्रीय सेवा योजना के समन्वयक डॉ राजेश कुमार गर्ग ने कहा कि आज जल को वास्तविक रूप में संसाधन मानकर विचार किए जाने की आवश्यकता है। चुनौतियां हमारे सामने हैं, इन्हीं के आलोक में बूंद बूंद से पृथ्वी में जल का संचय होगा, इस भावबोध के साथ, जल संरक्षण के छोटे से लेकर बड़े उपायों तक, व्यष्टि से लेकर समष्टि तक के उपायों पर, न केवल चिंतन किए जाने की आवश्यकता है बल्कि उन्हें अमलीजामा पहनाए जाने की भी आवश्यकता है।

कार्यक्रम में बोलते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय संघटक महाविद्यालय शिक्षक संघ के महामंत्री डॉ. उमेश प्रताप सिंह जी ने सरकारी नीतियों के इस जल संकट और इसके संरक्षण, संवर्धन में योगदान पर चर्चा की भी आवश्यकता पर बल दिया।
कार्यक्रम का संचालन यूइंग क्रिश्चियन कॉलेज के संस्कृत विभाग के सहायक आचार्य डॉ. प्रचेतस जी ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन ईश्वर शरण महाविद्यालय के डॉ अरविंद मिश्र जी ने किया।
कार्यक्रम में देश के 27 राज्यों सहित विदेशों से कुल 1525 नामांकन अनुरोध प्राप्त हुए। जिनमें 868 पुरुष और 656 स्त्रियां थीं। इनमें 1055 विद्यार्थी, 342 प्राध्यापक और 128 शोध छात्रों ने प्रतिभागिता हेतु अपने नामांकन अनुरोध प्रेषित किए थे।
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