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“भोजन के अनेक विकल्प हैं, पर जल का विकल्प नहीं है”

प्रयागराज :
इलाहाबाद विश्वविद्यालय, राष्ट्रीय सेवा योजना द्वारा आयोजित वेबीनार “जल और जीवन : अन्योन्याश्रितता एवं संवर्धन” विषय पर बोलते हुए हावड़ा हिंदी विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल के कुलपति प्रोफेसर दामोदर मिश्र ने कहा कि हम मानव मूल्यों को भूलते जा रहे हैं। इन्हीं मूल्यों के कारण हम पशुओं से विशिष्ट हैं। हमें अपने आप को मानव सेवा के लिए उपस्थित करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि हम परंपरा और प्रकृति के पूजक हैं, नदियां हमारे लिए देवतुल्य हैं। हम अपने प्रातः स्मरण में भी नित्य प्रार्थना करते हैं कि गंगा, जमुना, क्षिप्रा, सरस्वती, गोदावरी, नर्मदा आदि नदियां हमारे मनोरथ पूर्ण करें। जल को हमारा अथर्ववेद औषधि मानता है। कबीर जल में कुंभ, कुंभ में जल है, बाहर भीतर पानी” मानने वाले विद्वान हैं। तुलसी “क्षिति जल पावक गगन समीरा” से इस संपूर्ण सृष्टि को निर्मित कहते हैं। हम गंगा को राजा सगर के पुत्रों को तारने वाली मानते हैं। आज आवश्यकता है कि हम जल निकायों का नवीनीकरण करें, वर्षा जल का संचयन करें और अपशिष्ट जल को पुनः प्रयोग लायक बनाएं।

उन्होंने कहा कि संस्कृति का संबंध हमारे आचरण से है, हमारा आचरण जल संवर्धन और संरक्षण के अनुरूप होना चाहिए। उसे जल को अशुद्ध करने से बचाने वाला होना चाहिए अन्यथा आने वाले वर्षों में हमें जल संकट के लिए तैयार रहना होगा।

 

वेबीनार में बोलते हुए नागालैंड विश्वविद्यालय, नागालैंड के कुलपति प्रोफेसर परदेसी लाल ने कहा कि अतीत में झांके बिना, वर्तमान को आंके बिना, भविष्य की चिंता नहीं हो सकती। उन्होंने कहा जल से जीवन है, जल में जीवन है और जल ही जीवन है। पृथ्वी के समग्र जल का 97 प्रतिशत हमारे उपयोग लायक नहीं है, 3% जो उपयोग लायक है उसमें भी 2% ग्लेशियर इत्यादि हैं। बचे 1% जल से ही जीवन को सुरक्षित बनाने का मार्ग हमारे पास है। देश की 135 करोड़ आबादी बिना जल के नहीं रह सकती, भोजन के अनेक विकल्प है पर जल का विकल्प नहीं है। आज इसी जल में अशुद्धता के कारण लाखों लोग टाइफाइड से मरते हैं।

उन्होंने कहा कि 2027 तक जल संकट दिखने लगेगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि नदियां सूखने की दिशा में आगे बढ़ सकती हैं। इसलिए अब एक ही नारा हमें बचा सकता है और वह नारा है “हर हर गंगे, घर घर गंगे” यही मिशन के रूप में अपनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमारा नर्वस सिस्टम जल के बिना थोड़ी देर भी काम नहीं कर सकता। वह समय आने वाला है जब हममें से प्रत्येक व्यक्ति को अपने घर में वर्ष भर के जल का संचय करके रखना पड़ेगा और यह हमारे आसपास के प्राकृतिक जल से ही होना होगा। प्रत्येक को ऐसा करना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि आज नागालैंड में जहां रिकार्ड बारिश हुआ करती थी वहां का भी मौसम उत्तर भारत की तरह होता जा रहा है। जहां पानी होना चाहिए, वहां सूखा है। जहां सूखा होना चाहिए, जहां बाढ़ है। इन सब असंतुलनो का कारण जल के संरक्षण और संवर्धन के प्रति हमारी उदासीनता की प्रवृत्ति है।

कार्यक्रम के आयोजक, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, राष्ट्रीय सेवा योजना के समन्वयक डॉ. राजेश कुमार गर्ग ने कहा कि हमें जल आंदोलन को जन आंदोलन बनाना होगा। हम सबकी सहभागिता के बगैर यह संभव नहीं है। समाज के प्रज्ञावान व्यक्ति होने के नाते हम लोगों को अपनी भूमिका का निर्वाह सामाजिक प्रेरणा के रूप में करना शुरू कर देना चाहिए। आज जल संरक्षण का विषय है, संवर्धन का विषय है, संचयन का विषय है। वर्षा के जल को नदियों के माध्यम से समुद्र में चले जाने देना उसे निस्प्रयोज्य बनाना है। इसकी चिंता हमें करनी होगी।

कार्यक्रम का संचालन सदनलाल सावलदास खन्ना महिला महाविद्यालय की डॉ. रुचि मालवीय जी ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन श्यामा प्रसाद मुखर्जी राजकीय महाविद्यालय की डॉ प्रज्ञा सिंह ने किया।
वेबीनार में प्रतिभागिता हेतु देश के 25 राज्यों सहित अमेरिका, ओमान, यूनाइटेड किंगडम और रूस आदि देशों से कुल मिलाकर 1051 नामांकन अनुरोध प्राप्त हुए। जिनमें 208 प्राध्यापक, 84 शोध छात्र और 759 विद्यार्थी हैं। इनमें 586 पुरुष और 463 हैं।

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