
“हमारी उपभोक्तावादी संस्कृति ही इस जल संकट का कारण”: प्रो बलदेव भाई शर्मा
प्रयागराज।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय, राष्ट्रीय सेवा योजना द्वारा “जल आंदोलन : जन आंदोलन” विषय पर आयोजित वेबीनार में बोलते हुए कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, छत्तीसगढ़ के कुलपति एवं नेशनल बुक ट्रस्ट ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर बलदेव भाई शर्मा ने कहा की जल के बिना जीवन की कल्पना नहीं हो सकती। हमारी उपभोक्तावादी संस्कृति ही इस संकट का कारण है। वह शिक्षा जो व्यक्ति को शीलवान और प्रज्ञावान बनाती है अगर वह हमें केवल उपभोक्तावादी बना रही है तो यह चिंता की बात है। बीते कुछ दशकों में यूरोपीय चिंतन के भोगवाद ने आज प्रदूषण सहित जल समस्या के मुहाने पर लाकर हम सब को खड़ा कर दिया है।

उन्होंने कहा कि हम प्रकृति को देवता मानने वाले लोग हैं, धरती हमारी माता है, जल हमारा जनक है, हम प्रकृति के समस्त संसाधनों का प्रयोग केवल अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए नहीं कर सकते, यह सब संसाधन हमारी आवश्यकता की पूर्ति के लिए हैं। जब हम अपने गटर गंगा में खोल देंगे तो स्वाभाविक रूप से वह जल आचमन लायक नहीं रहेगा। ऐसे में यह विलाप कि यह जल आचमन लायक भी नहीं है, समस्या पर पर्दा डालने जैसा है। हमें यह सोचना होगा कि “माता भूमि: पुत्रोंहम पृथिव्याम” और इसी के आलोक में जल के प्रति हमें संवेदनशील बनना होगा। आज ग्लेशियरों का पिघलना, समुद्र के जलस्तर का बढ़ना, कहीं स्टीफन हॉकिंस कि वह भविष्यवाणी सच न कर दें जिसमें उन्होंने तमाम वृक्षों, वनस्पतियों और डायनोसॉर सहित यही विकास की गति रहने पर मनुष्य को भी नष्ट होने के मुहाने पर खड़े होने का खतरा बताया था। प्राकृतिक संसाधनों के दोहन का अगर यही हाल रहा तो हमें शुद्ध जल के लिए कठिनाई में पडने से कोई नहीं रोक सकता। उन्होंने कहा की उसी संविधान से जहां से हम अधिकारों की प्रेरणा ग्रहण करते हैं अपने कर्तव्य बोध की प्रेरणा क्यों नहीं ग्रहण करते? हमें कर्तव्य से पलायन की दुर्बुद्धि कौन देता है? हमारी उपभोक्ता संस्कृति वहीं तक ठीक है जहां तक वह दूसरे की स्वतंत्रता में खलल न डाले।
उन्होंने कहा कि आज कामायनी का यही संदेश संकट हरण का काम कर सकता है जिसमें प्रसाद कहते हैं “औरों को हंसते देखो मनु हसों और सुख पाओ।अपने सुख को विस्तृत कर सबको सुखी बनाओ”।

कार्यक्रम में बोलते हुए मगध विश्वविद्यालय, बिहार के कुलपति एवं प्रोफेसर राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश के पूर्व कुलपति प्रोफेसर राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि जैव विविधता पृथ्वी का स्वभाव है। जल का जीवन से अनिवार्य संबंध है। दुनिया जल के संघर्ष की तरफ न बढ़ जाए इसके लिए अभी से सजग होने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि सब प्रकार के विकास में जल संसाधन सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। चाहे वह औद्योगिक विकास हो, स्थापत्य हो, निर्माण हो, संसाधन विकास हो। जल संसाधन के बगैर हम प्रगति की कल्पना नहीं कर सकते। शस्य श्यामला धरती भी इस जल के बगैर शस्य श्यामला नहीं रह सकती। आज 7 करोड़ से अधिक घरों में पीने का जल एक संकट बनता जा रहा है। ग्रामीण और शहरी अंचलों में पेयजल का संकट, मृदा प्रदूषण, एसिड रेन, बढ़ती गर्मी से बढ़ता जल वाष्पन, पिघलते ग्लेशियर, विलुप्त होते जल स्रोत और आने वाले समय में और बड़ी होती यह विकराल समस्या हम सब के लिए चिंता का विषय है। हम सबको आने वाली पीढ़ियों के हितों की चिंता करते हुए जल संरक्षण के दायित्व का न केवल निर्वहन करना होगा बल्कि इसे जनआंदोलन बनाना होगा।

कार्यक्रम के आयोजक इलाहाबाद विश्वविद्यालय, राष्ट्रीय सेवा योजना के समन्वयक डॉ राजेश कुमार गर्ग ने जल आंदोलन को जन आंदोलन में बदलने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि इतनी बड़ी आबादी, उसके भोजन का प्रबंध और उसके लिए पेयजल का प्रबंध हम सब का सामूहिक दायित्व है। अगर हम वर्षा जल का संरक्षण नहीं कर पाएंगे तो न केवल हम भूमिगत जल को अवरुद्ध कर रहे होंगे बल्कि पेयजल के संकट की तरफ भी बढ़ रहे होंगे। भारत की पुरानी पोखर और तालाब व्यवस्था एक कारगर हथियार है। हमें प्रत्येक गांव, शहर, नगर, वन-उपवन सभी जगहों पर वर्षा जल संचय करना होगा । बिना इसके जल संकट का समाधान होना संभव नहीं है। शहरों में वाटर हार्वेस्टिंग करनी होगी, खुले स्थानों पर जल संग्रहण करना होगा, वर्षा की जल की प्रत्येक बूंद को अपने लिए उपयोगी बनाना होगा। जब तक हम उसे नदियों के माध्यम से समुद्र तक बहने देंगे यह संकट अनवरत जारी रहेगा।
कार्यक्रम का संचालन चौधरी महादेव प्रसाद महाविद्यालय के सहायक आचार्य डॉ. अरुण कुमार वर्मा जी ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन सदनलाल सांवलदास खन्ना महिला महाविद्यालय के सहायक आचार्य डॉ. शिवशंकर श्रीवास्तव जी ने किया।
कार्यक्रम में प्रतिभागिता हेतु देश के 26 राज्यों से 1324 नामांकन अनुरोध प्राप्त हुए, जिनमें 210 प्राध्यापक, 75 शोध छात्र और 1039 छात्र थे। इनमें 716 पुरुष और 606 महिलाएं थीं।
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