
प्रयागराज।
हिन्दी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित व्याख्यानमाला के प्रथम सत्र में “दलित विमर्श और साहित्य” विषय पर बोलते हुए दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, बिहार के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर सुरेश चंद्र ने कहा कि आज दलित सर्वाधिक चर्चित शब्द है और यह पिछले 50 वर्षों से चर्चा में है। इसे मराठी का शब्द कहकर इसकी व्याख्या की जाती है परंतु यह मध्यकालीन कविता में मौजूद शब्द है और उत्तर भारत से अन्य जगहों पर पहुंचा है।

रामचरितमानस और कवितावली में दलित शब्द का प्रयोग अन्यान्य अर्थों में स्वयं तुलसीदास ने किया है। रामचरितमानस में “दलित दसन मुख रुधिर प्रचारू” कहकर और कवितावली में “अंग अंग दलित ललित फूले” प्रयोग दृष्टव्य है।
सुरेश जी ने स्वानुभूति और सहानुभूति का प्रश्न उठाते हुए कहा कि साहित्य में खेमेबाजी को लेकर सबको चौकन्ना रहना होगा। स्वामी श्रद्धानंद, एल. आर. शिंदे और स्वामी अच्युतानंद का संदर्भ उठाते हुए उन्होंने दलितों के निर्माण में बाबू जगजीवन राम की महत्वपूर्ण भूमिका की तरफ संकेत किया। उन्होंने कहा कि आज असली दलित और नकली दलित का भी विमर्श चल पड़ा है।
उन्होंने संत रैदास से शुरू कर आधुनिक समय तक दलितों की स्थिति और उनकी निर्मिति पर प्रकाश डाला। हीन भावना से मुक्त और रचनात्मक संघर्ष चेतना से युक्त होकर ही दलित विमर्श के सृजनात्मक निष्कर्षों को प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने संपन्नता और बड़े पदों को प्राप्त दलित बंधुओं द्वारा स्त्री समाज की उपेक्षा पर चिंता व्यक्त की।

व्याख्यानमाला के दूसरे सत्र में “आधुनिकता बोध” विषय पर बोलते हुए हिन्दी विभाग, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, पंजाब की अध्यक्ष प्रोफेसर सुधा जितेंद्र ने कहा कि विचारों के धरातल पर सतत प्रगतिशील होने की प्रक्रिया ही आधुनिकता है। यह मध्यकालीन बोध की जडता से मुक्ति है, लोक विश्वासों, रूढ़ियों की अतार्किकता से मुक्ति का प्रयास है। उन्होंने एकल परिवारों, और संयुक्त परिवारों का संदर्भ उठाते हुए लोगों के लिए परस्पर समय न होने का संदर्भ उठाया। उन्होंने कहा कि आज हम संवाद की जगह मोनोलॉग के युग में जी रहे हैं। कोई किसी को सुनने के लिए तैयार नहीं है। यह स्थिति संवेदनहीनता की स्थिति है, रोबोट होने की स्थिति है।

हिन्दी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अध्यक्ष प्रोफेसर कृपाशंकर पाण्डेय ने कहा इन्हीं विमर्शों और शास्त्रार्थों से ही न केवल सम्यक निष्कर्ष प्राप्त किए जा सकते हैं बल्कि देश और समाज को दिशा भी प्रदान की जा सकती है और यह विद्वानों का अनिवार्य धर्म होना चाहिए।

वेबीनार के संयोजक डॉ राजेश कुमार गर्ग ने कहा कि आज भी हम कितना आधुनिक हो पाए हैं।आज भी हमारे गांव में 21वीं सदी का कितना प्रवेश हो पाया। वे बहुत पहले के समय में ही जी रहे हैं। सीमोन द बुआ ने जिस विमर्श को जन्म दिया था उस तरह के विमर्शों की आवश्यकता निरंतर बनी हुई है जिनसे सब प्रकार के भेदभावों का अंत हो सकता है।
कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन हिंदी विभाग के सहायक आचार्य डॉ बिजय कुमार रबिदास ने किया।
कार्यक्रम में देश के 26 राज्यों से 794 नामांकन निवेदन प्राप्त हुए। जिनमें 224 प्राध्यापक, 100 शोध छात्र और 470 छात्र सम्मिलित हैं। इनमें 504 पुरुष और 290 महिलाएं हैं। भारत के बाहर अमेरिका और नेपाल से भी नामांकन अनुरोध प्राप्त हुए।

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