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मैथिली शरण गुप्त जी के राम की घोषणा है “भव में नव वैभव व्याप्त कराने आया, इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया”

 

हिन्दी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित व्याख्यानमाला के प्रथम सत्र में बोलते हुए इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, दिल्ली के हिन्दी विभाग के प्रोफेसर नरेन्द्र मिश्र ने कहा कि मैथिलीशरण गुप्त जी मानवतावादी, नैतिकता वादी, समन्वयवादी, व्यष्टि और समष्टि का समन्वय करने वाले, नर और नारायण का समन्वय करने वाले तथा नारी मुक्ति के कवि हैं। वे परम्परा और पुनरुत्थान के कवि हैं। उन्होंने उनकी “अर्जन और विसर्जन” कविता का संदर्भ उठाते हुए स्वाधीनता और देशप्रेम को उनका सबसे बड़ा मूल्य घोषित किया और समझौता को पलायनवादिता कहा। “जयद्रथ वध” काव्य का संदर्भ उठाते हुए कर्तव्यपथ दृढ़ता को मैथिलीशरण गुप्त के काव्यमूल्य के रूप में स्थापित किया। साकेत के अष्टम सर्ग को नर-नारायण समन्वय की कविता बताते हुए उन्होंने कहा कि गुप्त जी के राम की घोषणा है “भव में नव वैभव व्याप्त कराने आया, इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया।” उन्होंने मैथिलीशरण गुप्त को परिवर्तन को सहज स्वीकार करने वाला मनश्वी कवि बताया।

 

व्याख्यानमाला के दूसरे सत्र में बोलते हुए महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय, गुजरात के हिन्दी विभाग के प्रोफेसर दीपेन्द्र सिंह जाडेजा ने कहा कि पूर्व में गुजरात और राजस्थान में एक ही भाषा थी। मालवा और गुजरात का अभिन्न संबंध है। हिन्दी क्षेत्र की मध्यकालीन कविता का विस्तार गुजरात तक है। उन्होंने कहा कि हेमचंद्र का शब्दानुशासन गुजरात का गौरवशाली ग्रंथ है। नरसी मेहता गुजरात में तुलसी की तरह महान संत और भक्त कवि हैं। “दयाराम सतसई” “बिहारी सतसई” की तरह गुजरात का प्रसिद्ध सतसई महाग्रंथ है। महाकवि ब्रह्मानंद और स्वामी प्राणनाथ गुजरात के मध्यकालीन कविता के महान कवि हैं।

विभागाध्यक्ष प्रोफेसर कृपाशंकर पाण्डेय जी ने दोनों अतिथियों का स्वागत और आतिथ्य करते हुए कहा की हिन्दी की मध्यकालीन कविता और गुजरात की मध्यकालीन कविता का संवेदना के स्तर पर महत्वपूर्ण अंतर्सम्बन्ध है। उन्होंने मैथिलीशरण गुप्त को महान राष्ट्रकवि कहते हुए उनकी राष्ट्रीय कविता को आज भी प्रासंगिक और महत्वपूर्ण बताया।

व्याख्यानमाला के संयोजक हिन्दी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के डॉ. राजेश कुमार गर्ग ने कहा कि परम्परा और आधुनिकता दोनों दो पैरों की तरह हैं, उनमें आपस में कोई वैर नहीं है। दोनों के साथ चलने के भाव और निरन्तर आधुनिक होने के भाव बोध से ही कवि कर्म को पूर्णता प्राप्त होती है।

धन्यवाद ज्ञापन डॉ अंशुमान कुशवाहा जी ने किया।

 

कार्यक्रम के लिए देश के 23 राज्यों से कुल 568 नामांकन निवेदन प्राप्त हुए जिनमें 192 प्राध्यापक, 99 शोध छात्र और 277 छात्र शामिल हैं। इनमें कुल 334 पुरुष और 234 महिलाएं शामिल हैं।

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