
प्रगतिशीलता – सच क्या है?
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राम कृपाल सिंह
देश में कुछ वर्ष पूर्व हुए सत्ता परिवर्तन के प्रभाव , उपलब्धियों या अनुपलब्धियों का आकलन तो बुद्धिजीवी लोग करें लेकिन एक अंतर तो स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि देश की प्रगतिशील प्रजाति लगभग विलुप्त हो गई।
बहुत दिन नहीं हुए जब प्रगतिशील साहित्य मंच या प्रगतिशील सामाजिक संगठन या प्रगतिशील पटरी दुकानदार संघ आदि की खबरों से अखबार भरे रहते थे। कभी इनके सम्मेलन का समाचार तो कभी इनका सेमिनार तो कभी इनके नेताओं का अखबारी बयान समाचार पत्रों में छाया रहता था लेकिन इधर वर्षों से इस समुदाय की चर्चा ही अखबारों से गायब है।
यद्यपि मैं कभी समझ नहीं पाया कि यह वामपंथी चाहते क्या है? अगर परिवर्तन ही चाहते हैं तो किस तरह का परिवर्तन चाहते हैं? इसी बीच एक बड़े वामपंथी नेता से भेंट हुई और उनकी बातचीत से मुझे लगा कि तमाम भारतीय परंपराएं, भारतीय संस्कृति, धार्मिक आस्था को नकारना ही प्रगतिशीलता है और उनमें आस्था रखना पिछड़ापन है। और इसका प्रमाण भी मिल गया।
उसी समय के आसपास हिंदी साहित्य में वामपंथ के पुरोधा और स्वनिर्मित साहित्यिक गुट के अगुआ डॉक्टर नामवर सिंह की एक उक्ति मुझे 17 नवंबर 1999 के इंडिया टुडे के अंक में पढ़ने को मिली। उन्होंने कहा था – “हिंदू धर्म के कारण ही भारतीय मध्यवर्ग निष्ठुर और आत्म केंद्रित है।”
क्या इस उक्ति को कोई भी पढ़ा- लिखा तो छोड़िए मात्र साक्षर व्यक्ति भी स्वीकार करेगा? सारी दुनिया के समाज विज्ञानी यह स्वीकार करते हैं कि हिंदू धर्म दुनिया का सबसे सहिष्णु धर्म है और भारतीय मध्यवर्ग उसका सच्चा प्रतिनिधि है।
यहां तक कि 10 वीं शताब्दी में भारत आया अरब यात्री अलबरूनी ने भी लिखा है कि हिंदू धर्म दुनिया का सबसे सहिष्णु और उदार धर्म है।
लेकिन श्री नामवर सिंह जी भी गलत नहीं थे। उन्होंने भी इसी एक वाक्य में अपनी विचारधारा को स्पष्ट कर दिया और बता दिया कि इसी संकुचित और दिग्भ्रमित सोच को वामपंथ और प्रगतिशील कहते हैं।
हां , जब हिंदी साहित्य के आलोचना सम्राट का नाम आ ही गया है तो विषय से हटकर कुछ शब्द हिंदी के आलोचना साहित्य पर।
किसी भी रचना या रचनाकार की आलोचना के लिए एक, और एकमात्र योग्यता होती है- आलोचना की निष्पक्षता। एक विशेष विचारधारा में सर से पैर तक डूबा हुआ व्यक्ति तथा लेखकों के एक गुट का निर्माता या नियंता- क्या उम्मीद की जा सकती है कि इस व्यक्ति द्वारा किसी रचना या रचनाकार की निष्पक्ष आलोचना की जा सके। सही यह है कि निष्पक्ष आलोचना हुई भी नहीं है और इस गैर ईमानदार साहित्यिक विश्लेषण से हिंदी का आलोचना साहित्य प्रदूषित हुआ है। इसी कारण मैं उन लोगों से शत-प्रतिशत सहमत हूं जो डॉ सिंह को आलोचना सम्राट क्या, एक सामान्य आलोचक भी मानने को तैयार नहीं हैं।
सिर्फ यही नहीं बल्कि इनकी विचारधारा और गुट से जुड़े हुए अन्य और भी विद्वान आलोचक हैं जो अपनी प्रतिभा के बल पर अपने गुट से जुड़े प्यारेलाल आवारा जैसे स्तर के लेखक को प्रेमचंद से भी बड़ा साबित कर दें।
लेकिन यह भी सही है कि हिंदी का आलोचना साहित्य आज भी बहुत संपन्न और स्तरीय है। वह बहुत अधिक प्रदूषित नहीं हो पाया है, यह संतोष का विषय है।
अब आते हैं मूल विषय पर। अपने को प्रगतिशील कहने वाले यह नहीं बता पाते कि प्रगतिशीलता की परिभाषा क्या है? यह उसी तरह है जैसे भारत के संविधान में अल्पसंख्यक शब्द या समाजवाद शब्द तो हैं लेकिन उन्हें व्याख्यायित नहीं किया गया है। अगर प्रगतिशीलता का तात्पर्य वामपंथ है तो मैं बताना चाहूंगा कि मैं किसी समय न केवल मार्क्सवादी पार्टी से जुड़ा रहा हूं बल्कि उसकी युवा शाखा का अध्यक्ष भी रहा हूं। वहीं मुझे बाद में वे दस्तावेज देखने को मिले कि 1962 में जब चीन- भारत युद्ध में भारत चीन से पराजित हुआ तो इस वामपंथी पार्टी ने भारत में जश्न मनाया था और चीन को बधाई दी थी।
इन्हीं वामपंथियों ने चीन के परमाणु परीक्षण करने पर जिलों- जिलों में जश्न मनाया था और उसे बहुत बड़ी उपलब्धि बताया था और भारत के परमाणु परीक्षण पर उसकी निंदा की थी और जिलों- जिलों में विरोध- प्रदर्शन किया था। यह भारत विरोधी उनकी सोच और कृत्य उस पार्टी से मेरे त्यागपत्र का कारण बना।
हर व्यक्ति अपनी सोच और विचारधारा रखने के लिए स्वतंत्र है और उसका सम्मान किया जाना चाहिए किंतु वितृष्णा तब होती है जब उसका कृत्य अमानवीयता की सीमा को पार कर जाता है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक गुरु गोवलकर की मृत्यु के बाद उनकी कटु विरोधी श्रीमती इंदिरा गांधी ने भी उन्हें महान चिंतक बताते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी थी लेकिन विद्वान लेखक रामविलास शर्मा की मृत्यु के बाद जिस प्रकार उपरोक्त आलोचक के शिष्यों ने बहुत निम्न स्तर पर उतर कर उन पर आक्रमण किया तो मुझे लगा कि अमानवीय और संस्कार हीन होना भी क्या प्रगतिशील कहलाने के लिए आवश्यक है जबकि तथ्य यह है कि रामविलास शर्मा ने भारतीय साहित्य को जितना दिया है, तमाम तथाकथित प्रगतिशील समूह मिलकर उसका एक चौथाई भी भारतीय साहित्य को नहीं दे पाया है।।
राम कृपाल सिंह
जन्म स्थान- जौनपुर, उत्तर प्रदेश शिक्षा- दीक्षा –लखनऊ, उत्तर प्रदेश राजनैतिक शुरुआत —
1966 में कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) में शामिल, लखनऊ स्टूडेंट फेडरेशन के अध्यक्ष रहे । 1970 में कांग्रेस (इंदिरा )में शामिल कांग्रेस मुखपत्र ” नया भारत ” के संपादक रहे।
साथ में – करेंट साप्ताहिक के उत्तर प्रदेश प्रतिनिधि 1973 से 75 तक
1989 में उत्तर प्रदेश कांग्रेस के महासचिव एवं प्रवक्ता।
1997 में उत्तर प्रदेश भाजपा के मीडिया सलाहकार।
तदनंतर स्वास्थ्य कारणों से विश्राम एवं स्फुट लेखन।
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