
गुटर्गूं ….!
रामधनी द्विवेदी

आज भी वे समय से थे। सुबह के छह बजे थे। बेटी किचन में अपने और दोनों भतीजों के नाश्ते की तैयारी कर रही थी कि वे किचन की खिड़की पर नमूदार हुए। मटकते हुए गर्दन दो- चार बार इधर उधर हिलाई, फिर खिड़की की जाली पर चोंच से कुट-कुट करने लगे। तब तक मैं भी पहुंच गया था और केतली में गर्म पानी लेकर पीने लगा। जब बार-बार उन्होंने चोंच कुट-कुटाई और गुटर्गूं-गुटर्गूं की तो मैने दिव्या से पूछा – इन्हें कुछ दिया नहीं?
उसने कहा- पापा दिया तो, लेकिन अब उनका पूरा कुनबा आने लगा है। नीचे छज्जे पर देखिए, इनके परिजन भी हैं।
कोई बात नहीं। और मैने चावल के कनस्तर से एक मुठ्ठी चावल खिड़की खोल कर किनारे पर रख दिया। जब मैं खिड़की खोलने लगा तो वे उड़ गए। बंद करते ही आ गए। अभी दो चार दाने ही चुगे होंगे कि उनका कोई साथी आ गया। डेढ फुट चौड़ी खिड़की पर दो लोगों की जगह नहीं थी और अपने चारे में हिस्सा देना भी मंजूर नहीं था। दोनों में थोड़ी देर उठा पटक हुई और दो एक ही मिनट में एक ने मैदान खाली कर दिया। दूसरे ने पूरे दाने साफ किये। जो नीचे छज्जे पर गिरे,उसपर उनके बच्चे (शायद) भिड़े हुए थे। दो चार मिनट ही लगे होंगे। दाने साफ कर वे उड़ गए। इस बीच मैदान छोड़ने वाले ने एकाध बार फिर कोशिश की लेकिन सफल नहीं हुआ।

यह कबूतर मेरे सुबह और शाम के साथी हो गए हैं। अभी दो-एक महीने से ही आने शुरू हुए हैं। कबूतरों का रूप रंग एक सा ही होता है। उनकी पहचान करनी कठिन है कि एक ही आता है कि रोज अदल-बदल कर आते हैं। चूंकि उनका आचरण एक ही तरह का है, इसलिए हम लोग मानते हैं कि एक ही कबूतर रोज आता है और साथ में उसके बच्चे और दूसरा साथी होता है। लेकिन चावल के दानों के लिए मार जरूर होती है।
दिव्या मजाक करती है कि दादी आ गई हैं। देखने कि मैने उनके बेटे को चाय दी है कि नहीं। इसी से खिड़की पर चोंच मार कर पूछती हैं कि चाय दी,भइया को।
मेरी मां को शरीर त्यागे 12 साल हो गए हैं। वैदिक मान्यता के अनुसार हो सकता है कि उनका जन्म किसी और रूप में हो गया हो। लेकिन दिव्या जब भी कबूतर देखती हैं, मुझे छेड़ने से बाज नहीं आतीं कि आपकी माई आ गईं। हम लोग भी उनका ख्याल रखते हैं। किचन में जाते ही उनका हिस्सा खिड़की खोल कर रख दिया जाता है फिर आने पर खिड़की पर उनकी चोंच कुटकुटाती जरूर है।
इन दिनों में जीवन, मृत्यु और पुनर्जन्म पर कुछ ग्रंथ पढ़ रहा हूं। उसमें बताया गया है कि प्राण छूटने के बाद कैसे सूक्ष्म शरीर अपनी इस जन्म की चेतना और कामनाओं के साथ शरीर से बाहर निकलता है और उसे कैसे पुनर्जन्म प्राप्त होता है। कभी उसे नया शरीर तत्काल और कभी कुछ रुक कर मिलता है। मांएं किसी की भी हों, उनकी कामना कभी खत्म नहीं होती, इसलिए उनकी मुक्ति शायद ही होती हो। इसलिए हम प्रकृति में अपने से प्यार दुलार करने वाले कई जीव पाते हैं। हो सकता है, वे हमारी मांएं ही हों। यह कबूतर भी तो शायद उनमें ही नहीं है।
भारतीय दर्शन में जीवों के प्रति प्रेम करने के पीछे भी शायद यही सोच है कि इनमें न जाने कौन अपना इस रूप में हो। मैं जब कानपुर में था तो हम लोगों ने गाय पाली थी। वह इतनी सीधी थी कि परिवार के सदस्य की तरह थी। उसका प्रेम देख कर भी अपना सा लगता था। इसी से हमारी संस्कृति में गाय को माता कहा गया है।
कबूतरों का यह जोड़ा भी हम लोगों को प्रिय लगने लगा है। अब सुबह की जगह शाम को भी आने लगा है। जब चाय बनने का समय आता है, उनकी भी कुटकुटाहट सुनाई देने लगती है। चलें शायद वह आ गए हैं।
Ghoomta Aina | Latest Hindi News | Breaking News घूमता आईना | News and Views Around the World
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