
सीएबी का अनुचित विरोध
डॉ दिलीप अग्निहोत्री
विश्व के किसी भी देश में अवैध घुसपैठियों का समर्थन नहीं किया जाता। इसको राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा माना जाता है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक विरोध स्वभाविक है। लेकिन राष्ट्र की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर राष्ट्रीय सहमति अपरिहार्य होती है।
अवैध घुसपैठियों का मसला भी ऐसा ही है। इस पर पार्टी लाइन से ऊपर उठ कर सहमति दिखाई देनी चाहिए। लेकिन भारत में राष्ट्रीय नागरिकता संशोधन विधेयक पर ऐसी सहमति दिखाई नहीं दी। ऐसा लगता है कि घुसपैठियों का समर्थन करने वाले दुर्लभ नेता भारत में ही मिलते है। इनके आचरण से यही लगा कि यह शरणार्थी और अवैध घुसपैठियों के बीच अंतर को ही नहीं समझना चाहते। हिंदुओं,व सिख समुदाय के साथ पाकिस्तान, बांग्लादेश में दशकों से किया हुआ, यह सब जानते है। विभाजन के समय इनकी वहां कितनी संख्या थी, अब कितनी रह गई, यह भी जगजाहिर है। ऐसे पीड़ित परिवारों को भारत में शरण शरण मिलना संभव है।

केंद्र सरकार ने इस ओर ध्यान दिया, इसकी सराहना होनी चाहिए थी। वहीं अवैध घुसपैठियों के साथ रियायत नहीं कि जा सकती। इस पर कई दशक पहले ही रोक लगनी चाहिए थी। लेकिन कम्युयनिस्ट व कांग्रेस की सरकारों ने वोटबैंक सियासत को तरजीह दी। इनके नाम मतदाता सूची में आ गए। भारतीय संसाधनों व सरकारी सुविधाओं में इनकी अवैध हिस्सेदारी हो गई। इस स्थिति को रोकने के लिए ही गृह मंत्री अमित शाह ने राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर विधयेक संसद में प्रस्तुत किया।

ऐसा लगता है कि विपक्ष ने अनुच्छेद तीन सौ सत्तर मसले पर हुई अपनी फजीहत से कोई सबक नहीं लिया। तब कांग्रेस के लोकसभा में नेता अधीर रंजन ने इसे अंतरराष्ट्रीय मसला बताया था। जम्मू कश्मीर के भारत से अलग होने की बात तक कही गई। सरकार ने मात्र दो दिन में इस समस्या का समाधान कर दिया। अब वही अधीर रंजन प्रधानमंत्री व गृह मंत्री को घुसपैठिया बता रहे है। उनका कहना है कि मोदी व शाह गुजरात से दिल्ली आ गए, इसलिए वह घुसपैठिये है। कांग्रेस को सोचना होगा कि ऐसे संवेदनशील विषयों पर उसके नेता किस प्रकार की वैचारिक लाचारी का प्रदर्शन करते है। ये विचार अमित शाह के तर्कों के समक्ष कैसे चल सकते थे। यही नजारा अनुच्छेद तीन सौ सत्तर की चर्चा के समय दिखाई दिया थी। विरोधियों के सारे तर्क खुद उन्हीं को बेनकाब कर गए। लोगों ने माना कि अनुच्छेद तीन सौ सत्तर से मात्र तीन परिवारों का भला हुआ, यह दलित व स्थानीय हितों के विरुद्ध था। ऐसे अनुच्छेद का विपक्ष बचाव कर रहा था। ऐसी ही स्थिति राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर विधेयक पर दिखाई दी। विपक्ष घुसपैठियों के समर्थन में लचर तर्क दे रहा था। मुसलमान, दलित का नाम लेकर सियासत कर रहा था। जबकि भारत के किसी भी नागरिक को इससे कोई फर्क पड़ना ही नहीं है। यह तो अवैध घुसपैठियों के लिए है, और विपक्ष इन्हीं के साथ दिखाई दिया।

लोकसभा में कांग्रेस नेता के तर्क बेहद दयनीय थे। उन्होंने कहा कि सरकार मुसलमान को भगाना चाहती है। अधीर ने गंगा जमुना तहजीब की दुहाई दी। बात सही है , लेकिन नागरिकता बिल का इससे कोई मतलब ही नहीं। यह तहजीब घुसपैठियों के लिए नहीं है। इसमें जाति मजहब का मुद्दा जोड़ना बेमानी है। विपक्ष ने यही करने का प्रयास किया है।
छह धर्म के लोगों को नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान अवैध घुसपैठ से संबंधित नहीं है। यह भारतीय वंशजो के शरणार्थी बनाने से संबंधित है। ये प्रताड़ित किये जाने के बाद अपना सब कुछ छोड़कर आये है।
अभी तक भारत की नागरिकता हासिल करने के लिए देश में ग्यारह वर्ष निवास करने वाले लोग योग्य होते हैं। नागरिकता संशोधन बिल में बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के शरणार्थियों के लिए निवास अवधि की बाध्यता को ग्यारह साल से घटाकर छह वर्ष करने का प्रावधान है। यह पीड़ित शरणार्थियों को राहत देने वाला है। इस संशोधन से बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आए हिन्दु, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाइयों के लिए बगैर वैध दस्तावेजों के भी भारतीय नागरिकता हासिल करने का रास्ता साफ हो जाएगा।
जाहिर है कि गैरकानूनी रूप से भारत में घुसपैठ करने वाले व पड़ोसी देशों में धार्मिक अत्याचारों का शिकार होकर भारत में शरण लेने वाले लोगों में स्पष्ट रूप से अंतर किया गया है। यह राष्ट्रीय हित व जिम्मेदारी के अनुकूल कदम है।
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