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“भ्रष्टाचार हमारे जीवन का अभिन्न अंग क्यों है”: विभूति नारायण राय, IPS

“इन आँखिन देखी” :32: विभूति नारायण राय IPS

अब तो जनता भी ज़बराना वसूलने वाले को भेंट चढ़ाने के पहले कहती है कि इतना तो आप का हक़ बनता है । जब ‘हक़’ से अधिक उम्मीद। की जाती है तभी कोई असंतुष्ट दिखता है । मैंने कही पढ़ा था कि हरियाणा के एक ज़मीनी यथार्थ से जुड़े मुख्यमंत्री से जब उनके चुनाव क्षेत्र के किसी कार्यकर्ता ने शिकायत की कि उसके ट्यूबवेल को बिजली का कनेक्शन देने के लिये रिश्वत माँगी जा रही है तो उन्होंने माँगी गयी रक़म शिकायत को देते हुये कहा कि जाओ अपना काम करा लो ।

“भ्रष्टाचार हमारे जीवन का अभिन्न अंग क्यों है”: विभूति नारायण राय, IPS”

विभूति नारायण राय, IPS

लेखक उत्तर प्रदेश में पुलिस महानिदेशक रहे हैं और महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति भी रह चुके हैं

भारतीय समाज की बहुत सारी कमियों कमज़ोरियों के लिये हम अक्सर अंग्रेजों को दोष देते रहते हैं और इस चक्कर मे भूल जाते हैं कि इनमे से ज़्यादातर तो उनके आने के बहुत पहले से हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुके थे । भ्रष्टाचार इन्ही मे से एक है । याद कीजिए महाकवि कालिदास की कालजयी कृति अभिज्ञान शाकुन्तलम जिसका एक पात्र मछुआरा शकुंतला की ऊँगली से फिसली अंगूठी निगल गयी मछली पकड़ कर बड़ा प्रसन्न है और उसे बेच कर धनवान बनने के सपने देख रहा है , तभी राज्य कर्मियों की नज़र उस पर पड़ जाती है । इस अप्रत्याशित धन प्राप्ति मे उनका भी हिस्सा है , यह समझाने मे उन्हे बहुत समय नही लगता । अलग बात है किकहानी मे कुछ ऐसा मोड़ आता है कि उनकी सौदेबाज़ी परवान नही चढ़ पाती और मछुआरे को राजा के सामने पेश होना पड़ता है ।

अंग्रेजों के शासक होने के बाद एक बुनियादी फ़र्क़ नौकरशाही के चरित्र मे आया कि वह क़द काठी मे बहुत बड़ी हो गयी और सरकार हर गाँव तक पहुँच गयी । पर विशालता से उसके मूल चरित्र मे कोई फ़र्क़ पड़ा हो , ऐसा नही लगता । फ़र्क़ सिर्फ़ दोनो समाजों की आंतरिक संरचना मे था । यह फ़र्क़ भाषा मे आसानी से पकड़ मे आ जाता है । नज़राना , शुकराना और जबराना ऐसे ही तीन शब्द हैं जो हमारे समय और भाषा के ज़बर्दस्त चितेरे प्रेमचंद की रचनाओं मे ग्रामीण भारत और सरकारी तंत्र के आपसी संवाद में भरपूर इस्तेमाल होते दिखते हैं । अंग्रेज कलेक्टर या कप्तान को इलाक़े के बड़े ताल्लुकेदार या ज़मींदार डालियाँ सज़ा कर पंहुचाते थे । इनमे अमूँमन मौसमी फल ,फूल और सब्ज़ियाँ होते थे और इन्हे नज़राना कहते थे । कृषि या बाग़वानी की उपज़ के अलावा बहुत अपवाद स्वरूप ही किसी डाली मे मुद्रा या आभूषण होते । नज़राने की टोकरी स्वीकारने के बाद साहब बहादुर पेश करने वालों को धन्यवाद कहता था, यह उसका सांस्कृतिक प्रशिक्षण था । वर्ण व्यवस्था मे विश्वास रखने वाले भारतीय साहब ने अधिकार के साथ भेंट वसूल करना शुरु किया । उसे लगता था कि उसने देने वाले की भेंट स्वीकार कर उस पर एहसान किया है और इस के लिये देने वाले को ही शुक्रिया अदा करना चाहिये । किसी अहसान के एवज़ मे भेंट दी गयी है इस लिये शब्द बना शुकराना ! पर जल्द ही सरकारी तंत्र ने हर काम की क़ीमत तय कर दी और उसे हासिल करना सरकारी कर्मी का हक़ बन गया और उसे उसे जबरन वसूला जा सकता है इस लिये भाषा को एक नया शब्द मिला – ज़बराना । नज़राना से ज़बराना तक का एक दिलचस्प सांस्कृतिक सफ़र है ।

परिवर्तनों को पकड़ने के लिये भाषा एक अच्छा औज़ार है। अब तो जनता भी ज़बराना वसूलने वाले को भेंट चढ़ाने के पहले कहती है कि इतना तो आप का हक़ बनता है । जब ‘हक़’ से अधिक उम्मीद। की जाती है तभी कोई असंतुष्ट दिखता है । मैंने कही पढ़ा था कि हरियाणा के एक ज़मीनी यथार्थ से जुड़े मुख्यमंत्री से जब उनके चुनाव क्षेत्र के किसी कार्यकर्ता ने शिकायत की कि उसके ट्यूबवेल को बिजली का कनेक्शन देने के लिये रिश्वत माँगी जा रही है तो उन्होंने माँगी गयी रक़म शिकायत को देते हुये कहा कि जाओ अपना काम करा लो । ज़ाहिर था कि वे किसी का हक़ नही मारना चाहते थे । आख़िर उस इंजीनियर की तैनाती भी तो उन्होंने ज़बराना वसूलने के बाद ही किया था।

एक पत्रकार मित्र आज़ कल बिहार के अपने गाँव मे गये हुये हैं , उनके लिहाज़ से भूमि राजस्व से जुड़ा उनका काम बड़ा छोटा सा है । पर बिहार की ज़मीनी भाषा में कर्मचारी ( संभवत: लेखपाल या पटवारी ) ऐसा नही सोचता । उसका कुछ हक़ बनता है जिसे पत्रकार महोदय अपने मुँह से नही बोल रहे और वह भी कुछ संकोच और कुछ भय वश नही कह पा रहा । काम तो तभी होगा जब उसका हक़ उसे मिल जायेगा ।

मुझे करोना काल मे यह देख कर एक रोचक सी अनुभूति हो रही है कि हर संकट की तरह इस आपदा मे घिरे मनुष्यों से भी ज़बर्दस्त वसूली करने मे अधिकार सम्पन्न ताक़तवरों ने कोई कसर नही छोड़ी है । फ़र्क़ इतना आया है कि अब शक्ति के ग़ैर सरकारी केंद्र बन गये हैं। राज्य ने शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों मे ख़ुद को समेटना शुरू कर दिया है । एक नयी सैद्धांतिकी विकसित हुई है जिसे बाज़ार की स्वायत्तता कहते हैं और राज्य ने कहना शुरू कर दिया है कि शिक्षा या स्वास्थ्य से उसका कोई रिश्ता नही है । अब ज़बराना बाज़ार के शक्तियों ने वसूलना शुरू कर दिया है । यह अलग बात है कि वे अधिक बेलगाम हैं और उनकी दरें भी अधिक हैं । क़ोरोना काल की शुरुआत मे ही इसका अनुभव जनता को हो गया जब किसी भी तरह से घर पहुँचने को बेताब दुख़ी जन अपनी सारी बचत स्वाहा कर ही बसों मे लटकने की जगह पा सके । जो बीमार पड़े वे इतने भाग्यशाली नही थे । सरकार ने पहले दौर मे अपनी जीत की घोषणा करने के बाद दूसरे दौर मे उन्हे पूरी तरह बाज़ार के हवाले कर दिया । फिर ऐंबुलेंस की सवारी से लेकर बेड़ हासिल करने और दवा या आक्सीजन तक जो ज़बराने का जो खेल चला वह शमशान घाट तक पंहुच कर भी ख़त्म नही हुआ ।

इस बार शायद राज्य ने ज़बराने को पूरी तरह स्वीकार कर लिया था, इसलिये उस ने किसी तरह बड़बोले पन से परहेज़ किया । पिछली बार तो पूरे देश को मज़दूर सप्लाई करने वाले उत्तर प्रदेश और बिहार ने दावे किये थे कि अब वे अपने प्रवासियों को दर दर नही भटकने देंगे और उन्हे अपने गाँवो/ शहरों मे ही रोज़गार उपलब्ध करा देंगे । उनके राजनेताओं ने इस बार ये दावे नही किये । उन्हे इस बीच अपने दावों के खोखले पन का अहसास हो गया होगा कि ज़बराना वाली उनके प्रदेशों की संस्कृति ऐसी किसी भी योजना को परवान नही चढ़ने देगी जिसके चलते स्थानीय स्तर पर रोज़गार सृजित हो सकें । एक तरह से अच्छा ही हुआ कि सरकार अपनी भद्द पिटाने से बच गयी और प्रवासी भी ग़लत उम्मीदों में नही फँसे और लाकड़ाउन मे छूट मिलते ही अपने अपने टिकट कटा कर रोज़गार स्थलों की तरफ़ निकल भागे ।

मैं अपने पत्रकार मित्र के लौटने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ । वे लौटें तो पता चलेगा कि बिना ज़बराना दिए वे अपनी पैतृक ज़मीन के काग़ज़ात ठीक करा पाये या नही । उम्मीद तो यही है कि नज़राने से शुरू होकर शुकराने होकर ज़बराने तक पंहुची परम्परा अभी उनके गाँव मे बरकरार होगी ।

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