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“दल बदल” करने वाले ज्यादातर विधायक सपा की तरफ ही क्यों भाग रहे हैं?

सामाजिक न्याय का वास्तविक चेहरा

राम कृपाल सिंह
चुनाव के समय मंत्रियों या विधायकों की इधर से उधर भगदड़ एक सामान्य प्रक्रिया है। अधिकांशत: विधायक यह पहले ही सूंघ लेते हैं कि इस बार टिकट मिलने की संभावना नहीं है, या कम है तो वे कोई न कोई बहाना करके पार्टी छोड़ देते हैं।
पिछले दिनों भा.ज.पा. के भी कतिपय मंत्रियों और विधायकों ने पार्टी छोड़ी और अधिकांशतः समाजवादी पार्टी में शामिल हुए। सभी का करीब- करीब एक जैसा बयान था कि पिछड़े वर्गों के हित के लिए पार्टी छोड़ रहा हूं। सभी पिछड़ी जातियों और पिछड़े वर्ग का हित सपा ही कर सकती है।

हो सकता है ये नेता सही कह रहे हों लेकिन आंकड़े तो कुछ और ही कह रहे हैं।

समाजवादी पार्टी की सरकार थी। पुलिस विभाग में एक साथ 3151 लोगों की भर्ती हुई थी। उस में दलितों और सामान्य सीटें अलग करने के बाद बची हुई सीटों में 1298 सीट सिर्फ एक जाति को मिली थी। शेष सभी पिछड़ी जातियों के लिए कुल 64 सीटें बची थी। प्रदेश में कुल करीब 115 पिछड़ी जातियां हैं। उसमें एक अकेली जाति के लोगों को 1298 सीटें, शेष बची 114 जातियों के लिए मात्र 64 सीटें। इस बची 64 सीटों में कुछ जातियों के लोगों को दो ,चार सीटें भले ही मिल गईं लेकिन 70 से अधिक पिछड़ी जाति के लोगों को एक भी सीट नहीं मिली।

(यह आंकड़े मुझे पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय कल्याण सिंह ने दिया था और संभवत उन्होंने इसे प्रेस में भी दिया था)

उपरोक्त आंकड़ा ही बताता है कि समाजवादी पार्टी के सामाजिक न्याय की परिभाषा क्या है जिसका बहाना लेकर भाजपा से निराश विधायक वहां भाग रहे हैं ?
श्री कल्याण सिंह के ही दिए हुए एक और दस्तावेज के अनुसार स.पा. सरकार ने मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष से 1 वर्ष में ₹18करोड़़ रुपए बांटे जिसमें से ₹16 करोड़ सिर्फ एक जाति के लोगों को मिला। दूसरी किसी अन्य पिछड़ी जाति के किसी भी व्यक्ति को ₹1 भी नहीं मिला था। शेष दो करोड़ रुपए उनके विश्वसनीय अधिकारियों की सिफारिश पर बांटा गया था।
(यह विवरण अखबारों में भी छपा था।)

इसी तरह 2015 में जब श्री अखिलेश मुख्यमंत्री थे तो प्रवक्ता इलेक्ट्रॉनिक और जूनियर इंजीनियर कंप्यूटर की भर्ती में भी पक्षपात हुआ था और एक के अलावा किसी दूसरी पिछड़ी जाति के व्यक्ति को एक भी सीट नहीं मिली थी।
2015 में अखिलेश जी के ही कार्यकाल में 86 एस.डी.एम. का चयन हुआ था। उसमें कौन कितना था यह जानना जरूरी नहीं, सिर्फ यह जान लेना काफी है कि उसमें दूसरी किसी पिछड़ी जाति का एक भी व्यक्ति नहीं था।

सपा सरकार के जातिगत पक्षपात और दूसरी पिछड़ी जातियों की उपेक्षा पर प्रसिद्ध पत्रिका इंडिया टुडे ने एक सर्वेक्षण किया था जिसे उसने अपने 25 जून 2014 के अंक में प्रकाशित किया था। वह सर्वेक्षण प्रदेश में जातीय भेदभाव और दूसरी पिछड़ी जातियों के अधिकारों को भी छीन लेने का कच्चा चिट्ठा है।
पत्रिका के उस लेख में क्या रहा होगा , यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है। बस मैं उस में प्रकाशित पिछड़े वर्ग के ही एक युवक शालिग्राम बिंद की मार्मिक टिप्पणी उद्धृत करूंगा। उस पिछड़े वर्ग के युवक ने बहुत दुखी होकर कहा था कि “मैं सोचने को मजबूर हो गया हूं कि हम जैसे दबे कुचलों को अब परीक्षा में बैठना चाहिए या नहीं ।काश मैं भी उसी बिरादरी में पैदा हुआ होता।”
इस अति पिछड़े बिंद जाति के युवक की यह मार्मिक उक्ति क्या उन दलबदलू नेताओं के झूठ को विवस्त्र नहीं कर देती जो यह बहाना बनाकर सपा में जा रहे हैं कि सपा पिछड़ों के हितों की रक्षक है?
इन विधायकों के जाने के अपने कारण होंगे और जैसा मैंने शुरू में कहा कि चुनाव के समय विधायकों और टिकटार्थियों का इधर-उधर भागना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है लेकिन अपने स्वार्थ के लिए पूरे समुदाय को गुमराह करना निश्चय ही निंदनीय है।
सबके दल बदलने के अपने कारण होंगे तो सच बोलने में क्या हर्ज है? जैसा मुझे एक टीवी पत्रकार ने बताया कि स्वामी प्रसाद मौर्य अपने बेटे के लिए ऊंचाहार से टिकट मांग रहे थे, उस क्षेत्र से उनका बेटा दो बार चुनाव हार चुका है इसलिए पार्टी ने उसे टिकट देने से मना कर दिया और उन्होंने पार्टी छोड़ दी। इसी तरह उसी पत्रकार ने बताया कि दारा सिंह चौहान मंत्री बनने के बाद शायद ही कभी क्षेत्र में गए। क्षेत्र में कोई काम नहीं हुआ। जनता नाराज थी। उन्होंने पार्टी से सीट बदलने को कहा। पार्टी इसके लिए तैयार नहीं हुई और वे समाजवादी हो गए।
भागने वाले ज्यादातर स.पा. में जा रहे हैं। ऐसा नहीं कि स.पा. की ताकत से आकर्षित होकर जा रहे हैं बल्कि कारण यह है कि पिछले चुनाव में वह 350 से ज्यादा सीटें हार गई थी। स.पा.में यह सब सीटें खाली हैं ।इन टिकट के इच्छुक लोगों को न पिछड़ों का हित वहां ले जा रहा है, न कोई विचारधारा। बल्कि उन्हें वे 350 खाली सीटें आकर्षित करती हैं और वे रातों-रात समाजवादी हो जाते हैं।
राम कृपाल सिंह

जन्म स्थान- जौनपुर, उत्तर प्रदेश शिक्षा- दीक्षा –लखनऊ, उत्तर प्रदेश राजनैतिक शुरुआत —
1966 में कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) में शामिल, लखनऊ स्टूडेंट फेडरेशन के अध्यक्ष रहे । 1970 में कांग्रेस (इंदिरा )में शामिल कांग्रेस मुखपत्र ” नया भारत ” के संपादक रहे।
साथ में – करेंट साप्ताहिक के उत्तर प्रदेश प्रतिनिधि 1973 से 75 तक
1989 में उत्तर प्रदेश कांग्रेस के महासचिव एवं प्रवक्ता।
1997 में उत्तर प्रदेश भाजपा के मीडिया सलाहकार।
तदनंतर स्वास्थ्य कारणों से विश्राम एवं स्फुट लेखन।

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