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रावण ने सीता के साथ बल प्रयोग क्यों नहीं किया? क्या रावण अभिशप्त था?

रावण का वास्‍तविक रूप

वरिष्ठ पत्रकार रामधनी द्विवेदी

दशहरे के आस-पास हर साल रावण एक बार चर्चा में जरूर आता है। पत्र पत्रिकाओं में उसकी चर्चा होती है। उसके कार्यों की, गुणों- अवगुणों की, उसके बल और ज्ञान की, उसके वैभव की, धनसंपदा की उसके इंद्र विजय की, कुबेर को बांध कर लंका में लाने की, कैलास को उठा लेने की और उसके पांडित्‍य की। सबसे अधिक बहस चर्चा सोशल म‍ीउिया में होती है। यहां स्‍पष्‍टत: दो वर्ग बन जाते हैं, एक उसके समर्थक और दूसरे उसके विरोधी।

मुझे स्‍मरण आता है कि कानपुर में नैमिषपीठाधीश्‍वर स्‍वामी नारंदानंद ने एक वर्ष अपने गीता ज्ञान यज्ञ में आचार्य गोरे लाल त्रि‍पाठी को एक अनोखा विषय दिया बोलने के लिए- तुलसी के राक्षस और उनका सदाचार। यह अनोखा विषय था, राक्षस और सदाचार। उत्‍तर और दक्षिण का मिलन कैसे संभव है, लेकिन आचार्य त्रिपाठी ने शोध कर इस विषय पर अच्‍छी सामग्री जुटाई और सारगर्भित व्‍याख्‍यान दिया। जब वह रावण के गुणों को बताने लगे तो श्रोताओं को आश्‍चर्य हुआ कि आज रावण को इस तरह क्‍यों प्रस्‍तुत किया जा रहा है? स्‍वामी जी के पट शिष्‍य शौनक ब्रह्मचारी जी ने त्रिपाठी जी को टोंका भी कि आप क्‍या बोल रहे हैं तो स्‍वामी नारदानंद जी ने उन्‍हें रोक दिया और कहा कि मैंने उन्‍हें इस विषय पर बोलने के लिए कहा है।

जब त्रिपाठी जी का व्‍याख्‍यान खत्‍म हुआ तो स्‍वामी जी ने अपनी बात रखी कि नि:संदेह ही रावण में ये सब गुण थे। यह कहा जाए कि वह गुणों की खान था। उसके पांडित्‍य, राजनीति ज्ञान और बल की किसी से तुलना नहीं की जा सकती। लेकिन उसके एक अवगुण ने उसे जग में निंदित बना दिया और वह था परस्‍त्री अपहरण। उसके रनिवास में अनेक राजाओं की राजपुत्रियां थीं जिन्‍हें वह हरण कर लाया था लेकिन बाद में सभी उसका वैभव देख कर उसे समर्पित हो गईं। यदि उसने अपने इसी दोष के कारण सीता जी का अपहरण न किया होता तो उसका अंत न होता, क्‍योंकि वह अवध्‍य था। ब्रह्मा जी ने उसे वरदान दिया था कि मनुष्‍य को छोड उसे कोई नहीं मार सकता। वह जानता था कि जब देव दानव उसे नहीं मार सकते तो मानव के बस की बात नहीं उसे मारने की।

मैं अभी कुछ देर पहले सदगुरु जग्गी वासुदेव का एक वीडियो सुन रहा था। वह बता रहे थे कि रावण को मारने के बाद श्री राम को प्रश्‍चाताप भी हुआ। वह कहने लगे कि रावण बहुत ज्ञानी था, प्रकांड पडित था, शिव का भक्‍त था, उसे मारने के लिए प्रायश्चित करना चाहिए। मैं हिमालय पर अगस्‍त्‍य मुनि के आश्रम में जाना चाहता हूं तो लक्ष्‍मण ने कहा कि आप ऐसा क्‍यों कह रहे हैं, उसने तो आपकी पत्‍नी का अपहरण किया था?

तो श्री राम ने कहा कि वह उसके नौ सिरों का काम था जिनमें वासना, लालच, अहंकार आदि था लेकिन एक सिर ऐसा था जिसमें ज्ञान था, विवेक था और पांडित्‍य था। मैं उस सिर को नही काटना चाहता था। लेकिन ऐसा करने का कोई रास्‍ता नहीं था। इसी से उसे मारना पडा। अर्थात रावण के कुछ गुण ऐसे थे जिसकी श्री राम भी प्रशंसा करते थे।

रावण के गुणों की प्रशंसा करने वाले प्राय: कहते हैं कि वह इतना मर्यादित था कि उसने सीता जी को अपने रनिवास या महल में न रखकर अशोक वाटिका में रखा था। वह उन्‍हें धमकाता था कि वह उसकी बात मान लें और उसकी पटरानी बन जांए। लेकिन सीता ने कभी उसकी ओर देखा ही नहीं। लेकिन वह सीता को कभी छूता नहीं था और न ही बल प्रयोग करता था।

सीता को न छूने की पीछे उसका आदर्श या मर्यादा पालन नहीं है। उसके पीछे की कहानी दूसरी है जिसे लोग नहीं जानते और उसे आदर्श बताने लगते हैं। जब श्री राम के लंका तट पर आने की जानकारी उसे हुई तो उसने अपने सभी मंत्रियों और सभासदों को बुला कर उनका मंतव्‍य जानना चाहा। उसके सेनापति महापार्श्‍व ने राय दी कि आप राम और उनके वानरों से डरे नहीं और सीता के साथ बल प्रयोग कर उन्‍हें अपनी रानी बनाएं। इस पर रावण ने जो जवाब दिया, उससे पता चलता है कि वह वह सीता पर बल प्रयोग क्‍यों नहीं करना चाहता था। वाल्‍मीकि रामायण के अनुसार उसने कहा—

‘ महापार्श्‍व पहले एक घटना हुई थी जिसमें मुझे श्राप मिला था। यह गुप्‍त रहस्‍य आज आप सुनें। मैंने एक बार पुंजिकस्‍थला नाम की अप्‍सरा को पितामह ब्रह्मा के भवन की ओर जाते देखा। उसने भी मुझे देख लिया था। वह मेरे भय से भयभीत थी। मैने बल पूर्वक उसके वस्‍त्र उतार दिए और उसका उपभोग किया। वह ब्रह्मा के पास गई तो उन्‍हें यह ज्ञात हो गया था कि मैने उसके साथ क्‍या किया है। वह कुपित हो गए और मुझे श्राप दिया कि आज के बाद यदि तुमने किसी परनारी के साथ बल प्रयोग किया तो तेरे सिर के टुकड़े- टुकड़े हो जाएंगे।‘
रावण ने कहा कि इस श्राप के भय से मैं सीता क्‍या किसी भी स्‍त्री के साथ बल प्रयोग नहीं कर सकता।

इत्‍यहं तस्‍य शापस्‍य भीत: प्रसभमेव ताम्।
नारोहए बलात् सीतां वैदेहीं शयने शुभे।।

( युद्धकांड सर्ग 13 श्‍लोक 15)

यह प्रसंग वाल्‍मीकि रामायण के युद्धकांड में 13वें सर्ग में श्‍लोक संख्‍या तीन से 15 के बीच है।

तो रावण की प्रशंसा करने वालों को यह कथा जरूर जाननी चाहिए, उससे उसका असली चरित्र पता चल जाएगा।

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