
दक्षिण कभी अशुभ नहीं रहा
वरिष्ठ पत्रकार रामधनी द्विवेदी
दक्षिण और दक्षिणा की व्युत्पत्ति अलग- अलग हैं और अर्थ भी। दक्ष संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ निपुण, कुशल, प्रवीण और होशियार होता है। इसी से दक्षिण बना- दक्ष के साथ इनन् प्रत्यय जुड़ने से। इसी से दक्खिन, दक्खन और अंग्रेजी का डेक्कन बना। सबका अर्थ एक ही होता है जो दक्षिण दिशा का बोधक होने के साथ ही भारत के दक्षिणी भाग को दर्शाता है। दक्षिणी गोलार्ध से पृथ्वी के दक्षिणी हिस्से का बोध होता है। मुख्यत: यह दिशा बोधक ही है। इसे जानने का तरीका हम बचपन से याद करते आ रहे हैं।
उगता सूरज जिधर सामने उधर खड़े हो मुंह करके तुम। ठीक सामने पूरब होगा और पीठ पीछे पश्चिम। बायें हाथ दिशा उत्तर की और दाहिने होगा दक्षिण। रात में ध्रुव तारे की मदद से दिशा जानी जाती है। पहले उसे सप्तर्षिमंडल तारा समूह से पहचानना होगा फिर उसकी ओर मुंह करके खड़ा होना होगा। इस बार ठीक सामने पूरब नहीं उत्तर होगा। और अन्य दिशाएं भी बदल जाएंगी अर्थात दाहिने हाथ पूरब,बायें हाथ पश्चिम और पीठ पीछे दक्षिण।
पहले समुद्री यात्री द्वीपों पर कुतुबनुमा की अनुपस्थिति में हवा की दिशा से दिशाओं का पता करते थे। अलग अलग समुद्रों में अलग अलग दिशाओं से हवा बहती है। वृक्षों और वनस्पतियों का झुकाव हवा की दिशा बता देता है।
अब इसी का भाई लगते दक्षिणा को देखा जाए। यह दक्ष से नहीं अपतिु दक्षिण में टॉप प्रत्यय लगने से बना। दक्षिणा में यह प्रत्यय आ की मात्रा के रूप में है। इसका भी अर्थ दक्षिण की दिशा है साथ ही दूसरा अर्थ यज्ञ और पूजा आदि के बाद पुरोहितों और ब्राह्मणों को दिया जाने वाला धन है। यह सामग्री के रूप में होने के साथ ही धन के रूप में भी हो सकता है। जो दक्षिणापाने का पात्र हो उसे दक्षिणार्ह कहते हैं।
माझा प्रवास के लेखक विष्णु भट्ट दक्षिणा पाने की लालसा से ही पुणे से ग्वालियर के लिए चले थे जो गदर में फंस गए और दुनिया ने उनके अनुभव के रूप में इसके बारे में जाना।
लोगों में दक्षिण को अशुभ मानने को लेकर कई तरह की भ्रांतियां हैं।
दक्षिण कभी अशुभ नहीं माना गया। यह बस लोकाचार में मान लिया गया, वह भी इसलिए क्योंकि रावण की लंका दक्षिण में थी। उसने निंदित कार्य किए इसलिए सर्वज्ञानी होकर भी वह असुर कहा गया।
एक मान्यता यह भी है कि लंका को याद कर हनुमान जी उग्र हो उठते हैं और उनके अंदर शत्रुहंता-विघ्नहंता भाव आ जाता है। इसी से किसी अज्ञात बाधा शनि के प्रकोप को दूर करने के लिए दक्षिणामुखी हनुमान की पूजा की परंपरा है। मंदिरों में भी हनुमानजी के विग्रह को दक्षिणामुख ही स्थापित किया जाता है।
दक्षिण दिशा के स्वामी यम माने जाते हैं जो मृत्यु के देवता हैं। भय का एक कारण यह भी है। इसी तरह लोकाचार में दक्षिणामुखी भवन को ठीक नहीं मानते। ऐसे मकान पारिवारिक और आर्थिक वृद्धि के लिए शुभ नहीं माना जाता। यदि किसी मजबूरी में दक्षिणामुखी मकान बनाना पड़े या शहरों में ऐसे फ्लैट लेना पड़े तो दरवाजे पर पंचमुखी हनुमान की प्रतिमा लगाई जाती है जिससे सभी बाधा दूर हो जाए। लेकिन रावण संहिता में दक्षिण मुखी भवन या किले को शुभ माना गया है। वास्तु शास्त्र में चार मंजिल से ऊपर उत्तर दक्षिण का भाव समाप्त मान लिया जाता है। दरअसल दक्षिण मुखी मकान को इसलिए ठीक नहीं मानते क्यों कि भारत उष्ण कटिबंधीय देश है, यहां आठ महीने से अधिक सूर्य की गति दक्षिण की ओर झुकी होती है और मकान में हमेशा प्रवेश द्वार धूप में ही रहेगा। जब कि उत्तर दिशा में मकान का मुंह होने पर कभी प्रवेश द्वार धूप में नहीं होगा। सूर्य की धूप गर्मी भी देगी इसलिए इस तरह के मकान कष्टकर माने जाते हैं। सूर्य की इसी दिशा गति के कारण ही सौर पैनल दक्षिण की ओर झुका कर लगाए जाते हैं जिससे अधिक से अधिक धूप उन्हें प्राप्त हो सके। सूर्य के ताप से बचने के लिए ही दक्षिणमुखी भवन से बचा जाता है। मैंने गांवेां में तो कोई दक्षिण मुखी भवन नहीं देखा लेकिन यदि कोई सड़क पूर्व से पश्चिम जा रही है तो उसकी पटरी पर बनने वाले आधे मकान तो दक्षिण की ओर खुलने वाले द्वार के ही होंगे। शहरों में ऐसे भवनों की तो बहुतायत होती है। तो क्या वे सहते नहीं। ऐसी बात नहीं है।
यदि दक्षिण अशुभ होता तो अगस्त्य मुनि दक्षिण की ओर क्यों जाते? उन्होंने विंध्याचल को भी षाष्टांग पड़े रहने का आदेश इसलिए दिया कि वह उत्तर और दक्षिण के मार्ग में आने वाली बाधा को दूर कर दे और दोनों भागों के बीच आदान- प्रदान और आना-जाना शुरू हो जाए।
दक्षिण का एक अर्थ अनुकूल होता है। ज्योतिष में ग्रहों के अनुकूल होने पर कहा जाता है कि ग्रह दक्षिण हैं। जिसका समय अच्छा चल रहा होता है, उसके बारे में कहा जाता है कि उनका क्या कहना आज कल योगिनी दाहिने हैं। शब्दकोश में दक्षिण के बारे में कोई भी अप्रिय अर्थ नहीं है। इसका अर्थ अनुकूल, ईमानदार, प्रिय, शिष्ट और सभ्य दिया गया है।
राजनीति में दक्षिणपंथ का अर्थ प्रचलित व्यवस्था का समर्थक माना जाता है और ऐसे लोग जो उग्र उपायों से सत्ता परिवर्तन के समर्थक नहीं होते। जबकि वाममार्ग इसके ठीक विपरीत हुआ। वह परिवर्तन का आकांक्षी और हिंसक उपायों का समर्थक भी होता है। वैदिक मार्ग को दक्षिण मार्ग भी कहते हैं, जबकि तांत्रिक साधना वाले अवैदिकों को वाममार्गी कहा जाता है। तांत्रिक साधना में भी जो शुद्ध आचार को मानने वाले होते हैं और पंचमकारों का उपयोग नहीं करते, दक्षिणाचारी कहे जाते हैं जबकि वामाचारी पंचमकार मानने वाले होते हैं। भगवान शिव का एक नाम दक्षिणामूर्ति भी है जो कल्याणकारी रूप है।
देवताओं की परिक्रमा भी दक्षिणावर्त की जाती है। अर्थात परिक्रमा करते समय देव विग्रह दक्षिण की ओर होना चाहिए। इसका विपरीत वामवर्त होता है। शरीर में दक्षिण का हाथ और अन्य अंग मजबूत माने जाते हैं और शुद्ध भी। इसलिए अपवादों को छोड़कर लोग दायें हाथ से भोजन करते हैं,लिखते हैं और शस्त्र चलाते हैं। सभी प्रमुख कार्य दाहिने हाथ से ही किए जाते हैं। दाक्षिणात्य ब्राह्मण दक्षिण के ब्राह्मणों को कहा जाता है। इन्हें दखिनहा भी कहा जाता है। इनकी परंपराएं कुछ अलग होती हैं उत्तरियों से। दक्षिणावर्त शंख शुभ माना जाता है। इसमें हवा निकलने का मार्ग दक्षिण की ओर मुड़ा होता है। इस शंख को पूजा घर में रखने का विधान है जिसे विष्णु के विग्रह की मान्यता प्राप्त है।
दक्षिण को लेकर सिर्फ एक अशुभ अर्थ मेरी जानकारी में है। दक्षिणाशापति अर्थात दक्षिण दिशा के स्वामी यमराज माने जाते हैं। वह मौत के अधिपति हैं। उनका आगमन मृत्यु लाता है, इसलिए उनका कहीं भी स्वागत नहीं किया जाता। दक्षिण की दिशा यमराज की दिशा है, मृत्यु की दिशा है। लेकिन सोचिए जरा, यदि मृत्यु न हो तो विकास की गति ही रुक जाए! पृथ्वी जीर्ण लोगों से भर जाए। मृत्यु नये शरीर धारण करने का एक मार्ग है। फिर भी, कोई भी इसे नहीं चाहता। यमराज की दिशा दक्षिण की है इसलिए पितरों के लिए किया जाने वाला पिंडदान और तर्पण दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके किया जाता है।
दक्षिणाचल केरल के मलय पर्वत को कहते हैं जहां चंदन के जंगल होते हैं और उधर से आने वाली वायु सुगंधित होती है।इस वायु को दक्षिण पवन या मलय पवन कहते हैं। लेकिन उत्तर तक यह पवन पहुंचती है कि पहुंचने के पहले ही बिखर जाती है। क्योंकि दक्षिणी पवन चलने के प्रसंग कम सुनने को मिलते हैं।
दरअसल यह दिशा निर्धारण मानव ने किया है अपनी सुविधा के लिए। आप अंतरिक्ष की कल्पना कीजिए जहां न तो उत्तर दक्षिण है और न ही पूर्व पश्चिम या ऊपर नीचे जैसी कोई चीज है। हम उसी अंतरिक्ष के एक बहुत छोटे कण में हैं जिसे पृथ्वी कहते हैं। जब अंतरिक्ष दिशामुक्त है तो यह पृथ्वी भी कभी दिशा मुक्त रही होगी। जब मानव विकसित होने की प्रक्रिया में था तो उसने अपनी सुविधा के लिए दिशाएं तय कीं जिससे उसे लंबी यात्रााओं में भ्रम नहीं हो। अब ये दिशाएं हमारी गणनाओं के लिए अनिवार्य तत्व हो गई हैं। कोई भी दिशा अशुभ नहीं है। ईश्वर तो हर दिशा में है तो दक्षिण में भी होगा ही।
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