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“सरकारी कर्मचारियों का योगदान विशिष्ट क्यों और अन्य का योगदान नगण्य क्यों?”

नागरिकों में भेदभाव क्यों?
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राम कृपाल सिंह

अभी पिछले दिनों जाने-माने पत्रकार श्री पी.के. राय का मुंबई में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। देश के तत्कालीन सबसे बड़े अखबार ‘द हिंदू ‘ के अतिरिक्त वे अनेक विदेशी समाचार एजेंसियों से भी जुड़े रहे। एक प्रतिष्ठित पत्रकार, अत्यंत नम्र और मृदु स्वभाव के व्यक्ति श्री राय सेवानिवृत्ति के बाद मुंबई में बेटे के पास थे।

एक अन्य पुराने पत्रकार मित्र नोएडा में बेटे के पास रहकर, उस पर आश्रित होकर जीवन गुजार रहे हैं।

एक निजी कंपनी में महत्वपूर्ण पद पर कार्यरत मेरे बचपन के एक सहपाठी सेवानिवृत्ति के बाद अपनी बेटी के पास रहे। सेवाकाल में एक फ्लैट लिया था। उसका किराया और कुछ बचत के सहारे जीवन यापन कर रहे थे। वे बीमार हुए। बीमारी गंभीर थी, उनका समुचित इलाज नहीं हो पाया और उनका देहावसान हो गया।

वहीं एक परिचित राजकीय अधिकारी ने 1985 में 3000₹ प्रतिमाह पर नौकरी शुरू किया था। कुछ दिन पहले रिटायर हुए हैं। लाखों का फंड मिला है और करीब डेढ़ लाख महीने पेंशन मिल रही है। रिटायरमेंट के बाद फंड से नई कार खरीदी और रहन-सहन का स्तर भी राजसी हो गया।

यह चित्र विभिन्न क्षेत्रों में सेवा कर के सेवानिवृत्त अधिकारियों का है। दोनों की प्रारंभिक आय भी लगभग समान थी, सेवाकाल भी प्राय: समान था लेकिन एक का दवा के अभाव में निधन हो गया, दूसरे का सेवानिवृत्ति के बाद जीवन स्तर बढ़ गया। दुनिया के अन्य किसी देश में शायद ही ऐसा दृश्य मिले क्योंकि समाजवाद शब्द दुनिया के बहुत कम देशों के संविधान में हैं।

बात शायद 1974 की है। देश की आर्थिक हालत चिंतनीय अवस्था में थी। उस वर्ष एक तो देश में भयंकर सूखा पड़ा था, दूसरी तरफ अमेरिका ने सहायता के रूप में दिया जाने वाला गेंहू बहुत पहले ही बंद कर दिया था। उद्योग जगत में जैसे हड़तालों की महामारी फैली थी। तमाम बड़ी- बड़ी औद्योगिक इकाइयां बंद हो गई थी। उन मिलों के खंडहर आज भी कानपुर, कोलकाता और मुंबई में परेल जैसे क्षेत्रों में मिल जाएंगे। लाखों मिल मजदूर बेरोजगार हो गए। अकाल में दसियों हजार मौतें हुई।

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी हताश हो गई थीं। उन्होंने अधिकारियों के साथ बैठक की, विशेषज्ञों की समिति बनाई और उद्योगपतियों की भी बैठक की।
उसी बैठक में देश की आमदनी और खर्च पर बोलते हुए देश के एक शीर्ष उद्योगपति (नाम देना उचित नहीं है) ने कहा था-” मैडम सरकार अपना काम चलाने के लिए एक कर्मचारी को नियुक्त करती है , हम भी अपने काम के लिए कर्मचारी नियुक्त करते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद न आपके कर्मचारी का सरकार से कोई संबंध रह जाता है,न हमारे कर्मचारी का हमारी कंपनी से कोई संबंध रह जाता है। दोनों देश के सामान्य नागरिक हो जाते हैं। लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद भी आजीवन पेंशन लेकर आपका कर्मचारी उसी सुविधा से जीवन जीता है और हमारा कर्मचारी बुढ़ापा काटने के लिए सहारा ढूंढता है। एक कर्मचारी दामाद क्यों दूसरा सौतेला बेटा क्यों? दुनिया की प्राय: हर सरकार अपने वरिष्ठ नागरिक की चिंता करती है लेकिन जिस तरह एक वर्ग विशेष को विशिष्ट बनाकर भारत सरकार पेंशन देती है, यह व्यवस्था शायद ही दुनिया के किसी देश में हो”।उक्त उद्योगपति ने कहा था किसी भी लोकप्रिय सरकार को अपने वरिष्ठ नागरिकों या निराश्रितों की सहायता करनी चाहिए लेकिन बिना किसी भेदभाव के।

उत्तर प्रदेश सरकार अपने कुल राजस्व का एक चौथाई सिर्फ कर्मचारियों के वेतन और पेंशन पर खर्च कर देती है तथा वेतन की राशि और पेंशन की राशि में थोड़ा ही अंतर रहता है। केंद्र सरकार में भी कुल कर्मचारियों की संख्या करीब 48 लाख है लेकिन पेंशन पाने वालों की संख्या लगभग 70लाख है। निश्चय ही यह राशि अरबों में होगी। जैसा पहले बताया है कि दुनिया की हर सरकार अपने वरिष्ठ नागरिक की चिंता करती है और उनके जीवन यापन की व्यवस्था करती है लेकिन सिर्फ सरकारी कर्मचारियों के सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन की व्यवस्था केवल भारत में ही है।

निश्चय ही सरकारी कर्मचारी महत्वपूर्ण कार्य करता है लेकिन निजी क्षेत्र का कर्मचारी, चाहे वह उत्पादन क्षेत्र में हो या व्यावसायिक क्षेत्र में- दोनों प्रकार से देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। पत्रकार लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का अंग है तो मजदूर भी राष्ट्र निर्माण में लगा है।तो फिर सरकारी कर्मचारियों का योगदान विशिष्ट क्यों और अन्य का योगदान नगण्य क्यों?
यह सही है कि देश की अर्थव्यवस्था अभी इतना बोझ उठाने में सक्षम नहीं है किंतु इतना तो हो सकता है कि जो भी संसाधन हैं, उनका विभाजन समान रूप से हो और यह भी यदि संभव न हो तो सुविधा आवश्यकता देख कर दी जाए, न कि चेहरा देखकर।

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