
आने वाले समय में जब वेतन 20 लाख रुपए तक पहुंच जाएगा…!
राम कृपाल सिंह
देश की वर्तमान अर्थव्यवस्था और मुद्रा के अवमूल्यन की गति को देखते हुए क्या ऐसा नहीं लगता कि हम एक अनंत अंधकार की ओर बढ़ रहे हैं और अधिक नहीं सिर्फ 25-30 साल के बाद हमारी अगली पीढ़ी क्या झेल रही होगी?
नीचे दिए गए आंकड़ों पर गौर कीजिए और आंकलन स्वयं कीजिए।
1971 में उत्तर प्रदेश में आई.ए.एस. अफसरों के अलावा शायद ही कोई अधिकारी रहा हो जिसकी आय ₹1000 से अधिक रही हो और आज सिर्फ 50 साल बाद प्रदेश का कोई अधिकारी नहीं जिसकी आय लाख या लाखों में न हो। लेकिन यह भी सच है कि आय में इतनी वृद्धि के बाद भी उनके जीवन स्तर में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आया है।
कारण स्पष्ट है कि रुपए की कीमत इतनी गिर गई है कि तब के हजार और आज के लाख में बहुत अंतर नहीं रह गया है।
भले ही अविश्वसनीय लगे लेकिन यह सच है कि बांग्लादेश को विजय करने वाले देश के शीर्ष सेनापति, फील्ड मार्शल जनरल मानेक शॉ का 1971 में अंतिम वेतन कुल ₹4500 था और उसी वर्ष जब वे रिटायर हुए तो उनकी पेंशन कुल 12 00 रुपए थी और उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि इतने में खर्च बड़े आराम से चल रहा है। आज मात्र 50 साल बाद उसी स्तर के अधिकारी की पेंशन संभवत डेढ़ लाख के आसपास होगी। लेकिन पूछने पर वह भी कहेगा -“किसी तरह चल रहा है।” गलत वह भी नहीं है। रुपए की क्रय शक्ति ही इतनी गिर चुकी है।
उत्तर प्रदेश में 1971 में 500 से 1000 के बीच वेतन पाने वाले बिजली विभाग के इंजीनियर आज ढाई से तीन लाख के बीच वेतन पा रहे हैं।
1971 में आय एक हजार रु. और आज 50 साल बाद आय तीन लाख तो क्या यह असंभव लगता है कि आने वाले 25-30 साल में आय 15 -20 लाख तक पहुंच जाय और आलू 1500 रुपए किलो बिके और उसके बाद ———–जाने दीजिए, कल्पना भी भयावह है।
तर्क दिया जा सकता है कि महंगाई बढ़ी है। जरूर कुछ बढ़ी है लेकिन मुख्य कारण है कि रुपए की ताकत गिरी हैं। 1947 में एक रुपया एक डॉलर खरीद लेता था । आज उसी एक डॉलर के लिए ₹75 खर्च करने पड़ते हैं। रुपया कितना कमजोर हुआ, स्वयं अनुमान लगाइए।
महंगाई हर तरफ है लेकिन मैंने ऊपर सरकारी कर्मचारियों का जिक्र इसलिए किया कि राजकीय धन का बहुत बड़ा हिस्सा उनके वेतन और अन्य सरकारी खर्चों के माध्यम से ही बाजार में आता है। इसके अलावा अर्थशास्त्रियों के एक समूह ने एक सर्वेक्षण में पाया था कि सरकारी कर्मियों की वेतन – वृद्धि का बाजार मूल्यों पर तत्काल प्रभाव पड़ता है। लोकतांत्रिक सरकार है, वेतन वृद्धि का दबाव पड़ता है, मजबूरन बढ़ाना पड़ता है और इससे महंगाई बढ़ती है। महंगाई के नाम पर फिर वेतन वृद्धि की मांग होती है, फिर दाम बढ़ते हैं। यह एक सतत प्रक्रिया है। मजबूरन सरकार अधिक से अधिक नोट छाप कर मांग पूरी करती है। जब अधिक नोट बाजार में आएगी तो मुद्रास्फीति भी होगी और स्वाभाविक है कि रुपए की कीमत भी घटेगी।
(मुद्रास्फीति के अन्य भी अनेक कारण हैं किन्तु वह एक विस्तृत लेख का विषय होता। लेकिन मुख्य कारण उपरोक्त ही है)
मुद्रा का अवमूल्यन जिससे महंगाई होती है उसका एक और प्रमाण देखिए। 1960 में मूल्य सूचकांक ₹100 था जो 1988 में ₹800 हो गया यानी रुपए की कीमत 28 वर्षों में ही 8 गुनी कम हो गई। उत्तर प्रदेश सरकार का पहला बजट 1952 में मात्र 149 करोड़ों का था और 1921- 22 में यह बजट बढ़ कर 5 लाख 50 हजार करोड़ रुपए हो गया। निश्चय ही प्रदेश की अर्थव्यवस्था का इस दौरान विकास हुआ है लेकिन मात्र 70 वर्ष में बजट में इतनी बड़ी वृद्धि ,मुद्रा स्फीति के कारण करीब- करीब मूल्य विहीन हो चुके रुपए का योगदान कम है क्या?
आइए अब जरा पीछे चलते हैं- इतिहास की तरफ कि विगत में देश में महंगाई या मुद्रास्फीति की गति क्या थी?
भारत की अर्थव्यवस्था का पहला स्पष्ट चित्र मिलता है, आज से करीब 24 सौ वर्ष पूर्व लिखे गए कौटिल्य के अर्थशास्त्र में। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में वस्तुओं के दिए गए मूल्य और उससे करीब 1800 वर्ष बाद अकबर के काल में लिखित आईने अकबरी में दिए गए मूल्यों की तुलना करने पर पाएंगे कि इस 1800 साल में वस्तुओं के मूल्यों में सिर्फ चार गुने की वृद्धि हुई थी।
भारत में आर्थिक गणना का आधार मुगल बादशाह अकबर के कार्य काल से माना जाता है क्योंकि वर्तमान मुद्रा रुपया अकबर के शासन के कुछ वर्ष पूर्व 1540 में शेरशाह सूरी ने शुरू किया था। क्योंकि रुपया चांदी का था और चांदी को रूपा भी कहते हैं इसलिए इसका नाम रुपया पड़ा। रुपया मुद्रा की शीर्ष इकाई थी जैसे आजकल 2000 का नोट है। लेकिन रुपए के नीचे के डिनॉमिनेशन में विभिन्न इकाइयों थीं और उनके सिक्के थे। जैसे रुपए के नीचे आना, पैसा ,पाई ,धेला, दमड़ी और कौड़ी। कौड़ी तत्कालीन मुद्रा की सबसे छोटी इकाई थी।
अकबर के गद्दी पर बैठने और औरंगजेब की मृत्यु के बीच का अंतराल करीब 150 साल रहा। इतिहासकार लिखते हैं कि औरंगजेब के शासनकाल में उसकी बहुत अधिक लड़ाइयों के कारण जनता पर बहुत बोझ पड़ा और महंगाई बहुत अधिक बढ़ी । इसके बावजूद भी उस 150 साल में कीमतों में सिर्फ दूने की वृद्धि हुई। उदाहरण के लिए अकबर के काल में चावल 60 पैसे मन था तो औरंगजेब के कार्यकाल में वह 120 पैसे मन हो गया।
उस 150 साल में मूल्य वृद्धि या मुद्रा अवमूल्यन तथा वर्तमान के गत 50 वर्ष के मुद्रा अवमूल्यन या महंगाई की तुलना करें तो अत्यंत भयावह तस्वीर सामने आती है है।
इसमें दो राय नहीं कि अंग्रेजों ने भारत को बुरी तरह लूटा लेकिन उस समय भी महंगाई बेकाबू नहीं हुई थी। 1820 में अगर एक आदमी ₹2 में अपना पूरा महीना आराम से गुजर कर लेता था तो उसके 100 साल बाद 1920 में एक आदमी को महीना गुजारने के लिए ₹12 काफी था। यानी 100 साल में महंगाई सिर्फ 6 गुना बढ़ी।
सन 1900 के आसपास एक प्राइमरी अध्यापक 4- 5 रु महीने वेतन पाता था और आराम से परिवार चला लेता था। तब सेआज सिर्फ 120 साल हुए हैं और तब कहां 5रु और आज कहां 45000 रु। मुद्रा का यह पतन चिंताजनक ही नहीं, भयावह है।
बहुत अधिक मुद्रास्फीति देश की अर्थव्यवस्था को तो तबाह करती ही है, उसके अन्य परिणाम भी विनाशकारी होते हैं। प्रथम विश्व युद्ध के बाद 1920 में जर्मनी में विश्व इतिहास की सबसे भयानक मुद्रास्फीति थी। भले ही कुछ वर्षों बाद हुआ लेकिन वहां इस आर्थिक बदहाली से जनता के आक्रोश के कारण हिटलर सत्ता में आया और विश्व विनाश का कारण बना और 1938 -40 में चीन में भी घोर बदहाली थी। कहावत थी कि थैले में नोट ले जाओ और जेब में सामान लेकर लौटो। वहां भी जनता के आक्रोश का नतीजा माओत्से तुंग और कम्युनिस्ट शासन था जो आज भी कायम है।
और हमारे यहां भी अगर 50 साल में एक हजार का वेतन तीन लाख तक पहुंच जाय और उसके बाद भी जीवन स्तर वही रहे- इसका मतलब यह है कि हमारी अर्थव्यवस्था किसी घोर संकट की ओर बढ़ रही है और हम भी यदि कहें कि हमारी अगली पीढ़ी थैले में नोट लेकर जाएगी और जेब में सामान लेकर लौटेगी तो क्या यह अतिशयोक्ति होगी?
राम कृपाल सिंह
जन्म स्थान- जौनपुर, उत्तर प्रदेश शिक्षा- दीक्षा –लखनऊ, उत्तर प्रदेश राजनैतिक शुरुआत —
1966 में कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) में शामिल, लखनऊ स्टूडेंट फेडरेशन के अध्यक्ष रहे । 1970 में कांग्रेस (इंदिरा )में शामिल कांग्रेस मुखपत्र ” नया भारत ” के संपादक रहे।
साथ में – करेंट साप्ताहिक के उत्तर प्रदेश प्रतिनिधि 1973 से 75 तक
1989 में उत्तर प्रदेश कांग्रेस के महासचिव एवं प्रवक्ता।
1997 में उत्तर प्रदेश भाजपा के मीडिया सलाहकार।
तदनंतर स्वास्थ्य कारणों से विश्राम एवं स्फुट लेखन।
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